वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत हिन्दी व्याख्योपेतम् २६ ननु यद् युगपद्विरुद्धसंसर्गवत् तन्नाना यथा द्विशफैकशफवान् गवाश्वादिः युगपत्कत्वगत्वादिधर्मवांश्च स्फोट, तस्मान्नानेति कथं स्फोटरूपस्य शब्दब्रह्मण एकत्व- मत आह— यद्यपि जो एक समयमें अनेक परस्पर विरुद्ध वस्तुओंसे सम्बद्ध हो वह एक नहीं हो सकता। जैसे एकशफत्व और द्विशफत्व ये दोनों धर्म न तो गौमें ही हैं न अश्वमें ही। किन्तु ये दोनों धर्म अलग अलग दो पशुओं में रहते हैं। वैसे कत्व गत्व रूपी विरुद्धधर्म एक स्फोटमें नहीं रह सकते। तथापि— यत्र वाचो निमित्तानि चिह्नानीवाक्षरस्मृतेः । शब्दपूर्वेण योगेन भासन्ते प्रतिबिम्बवत् ॥ २० ॥ यत्र स्फोटाख्ये शब्दब्रह्मणि अक्षरस्मृतेश्चिह्नानीव लिपय इव वाचो वागभि- व्यञ्जकस्य प्राकृतध्वनेः निमित्तानि, वागभिव्यक्तिनिमित्तध्वनिगताः कत्वादिजातयः शब्दपूर्वेण शब्दाभिव्यक्तिपूर्वभाविध्वनिना योगेन सम्बन्धेन भेदाग्रहणेति यावत् यद्वा शब्दपूर्वेण साधुशब्दानाम्प्रयोगपूर्वेण योगेन क्रमसंहाररूपेण, प्रतिबिम्बवत् प्रतिबिम्बे इव भासन्ते इत्यर्थः । 'तत्र तस्येव' इति वतिः ॥ जैसे—जिस स्फोट शब्दब्रह्ममें अक्षरोंके स्मृति चिह्न ( लिपियाँ ) वाणी ( प्राकृतध्वनि ) का कारण मानी जाती हैं। वैसे शब्दको व्यक्त करने वाली कत्व, गत्व जातियां भी शब्दोच्चारणके पूर्वमें होने वाली ध्वनियों से अभिन्न होने के कारण प्रतिबिम्बकी तरह मानते हैं। अथवा— शब्दको व्यक्त करने वाली कत्व, गत्व जातियां साधुशब्दका ज्ञानपूर्वक अक्रम प्रयोगके रूपमें प्रतिबिम्ब की तरह प्रतीत होती हैं। जपाकुसुमादिगतलौहित्यादिव्यञ्जकोपरागवशात् लोहितः स्फटिक इतिभानवत् व्यञ्जकध्वनिगतकत्वगत्वादयः स्फोटे भासन्ते प्रतिबिम्बगतधर्मवैशिष्टयेनैव बिम्बस्य लोकेऽवधारणादिति न वस्तुतः स्फोटे कत्वादयो येन भेदः स्यादिति भावः ॥२०॥ तात्पर्य यह है कि जैसे जपाकुसुमका रक्त स्फटिकमणि पर पड़ता है और श्वेत भी स्फटिक मणि लाल मालूम पड़ने लगता है। वैसे व्यञ्जकध्वनिके ही धर्म कत्व गत्वादि स्फोटमें भासित होते हैं। वस्तुतः वे स्फोटके धर्म नहीं हैं। अतः स्फोट एक है ॥ २० ॥ स्फोटेऽव्यक्तकत्वाद्यवभासवदन्यगतवर्णांशोदात्तादेरवभासोऽतो नोदात्तादि- विरुद्धधर्मसंसर्गकृतोऽपि स्फोटभेद इत्याह— अथर्वणामङ्गिरसां साम्नामृग्यजुषस्य च । यस्मिन्नुच्चावचा वर्णा पृथक्स्थितिपरीग्रहाः ॥ २१ ॥ यस्मिन् स्फोटाख्ये शब्दब्रह्मणि अथर्वणामङ्गिरसां साम्नाम् ऋग्यजुषस्य च ऋग्यजुःसामाथर्वणाम्, उच्चावचाः उदात्तानुदात्तादयो वर्णाः-वर्णधर्माः वर्णधर्म- त्वेन भासमानाः पृथक्स्थितिपरीग्रहाः पृथक् स्फोटाद्भिन्ने तदभिव्यञ्जके ध्वनौ वायुसंयोगे वा स्थितेः परिग्रहः स्वीकारो येषां ते स्फोटाभिव्यञ्जकनिष्ठा तादृश-