वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ३१ 'वागेवार्थं पश्यति, वागेवार्थं ब्रवीति, वागेवार्थं विहितं सम्भिनोति, वाग्घैवैवं विश्वं बहुरूपं निब- द्धम्, ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वम्, ओमिति ब्रह्म, ओमितीदं सर्वम्, नान्तोऽस्त्यस्याः' इन श्रुतियों से शब्द भी जगत्-कारण कहा गया है। इन दोनों श्रुतियोंकी एक-वाक्यता तभी बनती है जब शब्द और ब्रह्म एक ही माना जाय। अतः शब्द ही ब्रह्म और जगत्का कारण है। वह शब्द- ब्रह्म 'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' श्रुतिके अनुसार स्वप्रकाश भी है। हेलाराजने एक मान्य विद्वान्के वचन का उल्लेख किया है कि 'यहाँ तीन ज्योतियाँ और तीन प्रकाश हैं जो अपने और अन्यके रूपके प्रकाशक हैं। जैसे—एक यह जातवेदा (अग्नि), दूसरा पुरुषों के अन्दर स्थित प्रकाश, तीसरा वह जो प्रकाश और अप्रकाशको प्रकाशित करता है शब्दरूप प्रकाश है उसीमें स्थावर और जङ्गम समस्त संसार अनुस्यूत है। इसलिए आगे कहेंगे कि 'जैसे ग्राह्यत्व और ग्राहकत्व दो शक्तियाँ नेत्रमें होती हैं वैसे ही समस्तशब्दोंमें ये शक्तियाँ अलग-अलग दिख रही हैं। एतदेव च वाग्व्यञ्जकत्वेन 'यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते' इति केनोपनिषदा ब्रह्मपदेन 'शृणोति य इमं स्फोटं सुप्ते श्रोत्रे च शून्यदृग्। येन वाग् व्यज्यते यस्य खं शिराकाश आत्मनः' इति भागवतेन परमात्मपदेन 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति' इति गीतया ईश्वरपदेन च प्रतिपादितम्। यत् चैतन्यमात्रसत्ताकं अक्रमं शब्दतत्त्वं वाचा सक्रमया वर्णपदवा- क्यरूपया नाभ्युद्यते। येन च अक्रमेण शब्दतत्त्वेन सक्रमा वागभ्युद्यते तद्ब्रह्म इदं यदनात्मभूतमुपाधिभेदविशिष्टमीश्वराद्युपासते तन्न ब्रह्मेति विद्धीति श्रुतेरर्थः। यः स्फोटं स्फोटाभिव्यञ्जकं ध्वनिं शृणोति, सुषुप्तौ इन्द्रियगणे विलीनेऽपि शून्यम्-अज्ञानं पश्यतीति शून्यदृग् सुप्तोत्थितस्य 'न किंचिदवेदिषम्' इति स्मरणं तदानीमज्ञानानु- भवं साधयति येन अक्रमेण प्रणवेन वागभ्युद्यते यस्य च भागेन सदृशात् हृदया- काशे प्रत्यक्षं स परमात्मेतिभागवतस्यार्थः। वाचो नित्यत्वं च 'नहि वक्तुर्वक्तेर्वि- परिलोपो दृश्यते' इतिश्रुत्या प्रतिपाद्यते। वाग्रूपेण च सुषुप्तौ आत्मनो लयः 'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति स्वमपीतो भवति' इति श्रुत्या प्रतिपाद्यते 'सा वाग् चैतन्यस्यापि प्रकाशिका वागेवेति— 'वाग्रूपता चेदुत्क्रामेदवबोधस्य शाश्वती। न प्रकाशः प्रकाशेत सा हि प्रत्यवमर्शिनी' इति वक्ष्यमाणत्वात् ॥ यही शब्दब्रह्म केनोपनिषद् में ब्रह्म शब्दसे, भागवतमें परमात्मा शब्दसे गीतामें ईश्वर शब्दसे कहा जाता है। जैसे-यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिद- मुपासते, (केनोपनिषद्) जो चैतन्यमात्रसत्तावाला अक्रम शब्द तत्त्व है वह वर्ण, पद और वाक्यरूप सक्रमा वाणीका विषय नहीं है। जिस अक्रम शब्द तत्त्वसे सक्रमा वाणी उच्चरित होती