वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ वाक्यपदीयम् कार्यकारणभावेन-कार्यकारणत्मना, शब्दैरर्थानां बुद्धौ कल्पनात् अर्थबुद्धौ च तत्प्रतिपादनाय शब्दकल्पनात् बौद्धशब्दार्थयोः कार्यकारणभाव इति भावः। यहाँ शब्द और अर्थका कार्यकारणभाव सम्बन्ध बौद्ध है। क्योंकि शब्दोंको सुनकर अर्थका भाव बुद्धिमें होता है फिर प्रयोग की इच्छापर अर्थका ध्यान रखकर शब्दोंका प्रयोग होता है। अतः शब्दों और अर्थोंका बौद्धकार्यकारणभाव बनता है। अन्यथा शब्द और अर्थ के भिन्न-भिन्न स्थानोंमें रहनेके कारण कार्यकारणभाव बनता ही नहीं। योग्यभावेन-तादात्म्येन यथेन्द्रियविषययोः प्रकाशप्रकाशकभावसम्बन्ध- स्तथा तयोः समयोपाधिस्तादात्म्यमस्तीति भावः। तदेवम् अपोद्धारपदार्थस्थितिलक्षणभेदेनार्थो द्विधा, अन्वाख्येयप्रतिपादकभेदेन शब्दो द्विधा, कार्यकारणभावयोग्यताभेदेन संबन्धो द्विधा, धर्मार्थबोधभेदेन प्रयोजनं द्विधेति अष्टविधासु शास्त्रार्थं परिसमाप्यते ॥ २४-२६ ॥ इस प्रकार अर्थ दो प्रकार का है। एक अपोद्धार पदार्थ और दूसरा स्थिति लक्षण। शब्दभी दो प्रकार का है एक अन्वाख्येय और दूसरा प्रतिपादक। सम्बन्ध भी दो प्रकार का है एक कार्यकारणभाव और दूसरा योग्यता। धर्मज्ञान तथा अर्थज्ञानके भेदसे दो प्रकारका प्रयोजन इन आठ प्रकारोंमें शब्द तत्त्व की पूर्णता है ॥ २४-२६ ॥ नन्वेषा साध्वसाधुव्यवस्था निर्मूलेत्यत आह- यह साधुशब्द और असाधु शब्दकी व्यवस्था निर्मूल नहीं कही जा सकती क्योंकि- शिष्टेभ्य आगमात् सिद्धाः साधवो धर्मसाधनम् । अर्थप्रत्यायनाभेदे विपरीतास्त्वसाधवः ॥ २७ ॥ साधूनामसाधूनां च अर्थप्रत्यायनाभेदे अर्थप्रत्यायकत्वस्य तौल्येऽपि, तदुक्तं भाष्ये 'समानायामर्थावगतौ शब्दैश्चापशब्दैश्च शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते शब्दे- नैवार्थोऽभिधेयो नापशब्देन एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवतीति', शिष्टेभ्यो लब्धाद् आगमात् व्याकरणात् सिद्धाः धर्मसाधनत्वेन बोधिताः साधवः धर्मसाधनम् विपरीता असिद्धाः अनिष्टसाधनत्वेन बोधिता इति यावत् असाधवो ऽधर्म साधनमित्यर्थः ॥ साधुशब्द और असाधु शब्दोंसे समानरूपसे अर्थज्ञान होनेपर भी शिष्टोंके द्वारा प्राप्त व्याकरणागमसे सिद्ध साधुशब्दोंके प्रयोगसे धर्म और असाधुशब्दोंके प्रयोगसे अधर्म उत्पन्न होता है। 'इको यणचि' इत्यादिभिः स्वविधेयघटिते साधुत्वं तदितरस्मिन् स्वोत्तरशास्त्रा- बोधितेऽसाधुत्वं च बोध्यते, अन्यथा समासविधायकशास्त्रेण सुधीउपास्य इत्यस्यापि साधुत्वबोधनात्तस्यापि प्रयोगापत्तिः असाधुत्वासामानाधिकरणे च साधुत्वं लोकप्रयो- गार्हत्वसम्पादकमिति तत्त्वम् ॥ 'एकः शब्दः सम्यग्ज्ञातः शास्त्रान्वितः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके कामधुग्भवति' इति श्रुत्या साधूनां धर्मसाधनत्वस्य 'तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः तस्माद्