वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
पृष्ठ 76, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header] ब्रह्मकाण्डम् ] | संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् | ४५
पदं प्रकृतिः प्रत्ययश्च न पारिभाषिकम् तस्यार्थाः अपोद्धाराश्च ते पदार्थाः अपोद्धारपदार्थाः प्रकृतिप्रत्ययार्थाः । यहां 'अपोद्धारपदार्थ' में दो पद हैं। प्रथम पद 'अपोद्धार' का अर्थ है 'विभाग' और दूसरे पदार्थ पदका पदस्यार्थः इस व्युत्पत्तिसे प्रकृति प्रत्ययार्थ अर्थ है। 'सुप्तिङन्तं पद' सूत्रसे परिभाषित पद शब्दका अर्थ नहीं है। अतः पदार्थोंसे विभक्त प्रकृत्यर्थ और प्रत्य- यार्थ अपोद्धारपदार्थ पदका अर्थ होता है । स्थितमप्रच्युतं लक्षणं स्वरूपमेषां ते स्थितलक्षणाः अर्थाः—पदार्थाः, वाक्या- र्थाश्च, प्रकृतिप्रत्ययार्थावबोधो हि पदार्थावबोधोपाय इति पदार्थे प्रकृतिप्रत्ययार्थास्ति- रोहिता भवन्ति न तु पदार्थ इति पदार्थस्य स्वरूपमप्रच्युतं भवति। एवं पदार्थावबोधो वाक्यार्थावबोधोपाय इति पदार्था वाक्यार्थे तिरोहिता भवन्ति न वाक्यार्थ इति पदार्थापेक्षयाऽपि