वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ वाक्यपदीयम् ( यद्यपि बुद्धिस्थ नाद व्यङ्ग्य स्फोट रूपी शब्द ) न पूर्व है और न तो अपर है किन्तु पूर्वापरीभावरहित है ( अतः ) अक्रम है। तथापि स्फोटको व्यक्त करनेवाले नादकी उत्पत्ति क्रमसे होती है इसलिए स्फोट भी सक्रमकी तरह भासित होता है ॥ ४८ ॥ अन्यधर्मस्यान्यत्र भानं दृष्टान्तेनोपपादयति— यद्यपि दूसरेका धर्म दूसरी वस्तुमें नहीं प्रतीत होना चाहिए यह कहा जा सकता है। तथापि ठीक नहीं। क्योंकि एक दूसरेके भी धर्म दूसरेमें प्रतीत होते हैं। प्रतिबिम्बं यथान्यत्र स्थितं तोयक्रियावशात् । तत्प्रवृत्तिमिवान्वेति स धर्मः स्फोटनादयोः ॥ ४९ ॥ यथा अन्यत्र तोये स्थितं भासमानं प्रतिबिम्बं चन्द्रप्रतिबिम्बं वस्तुतोऽ- क्रियमपि तोयक्रियावशात् तत्प्रवृत्तिं जलक्रियां चाञ्चल्यमन्वेति अनुगच्छति स स्फोटनादयोः धर्मः सादृश्यम् नादवर्तिनं क्रमं कालह्रस्वत्वदीर्घत्वादिकञ्च अतथाभूतोऽपि स्फोटोऽनुगच्छतीत्यर्थः ॥ जैसे जलमें झलकता हुआ चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब स्वयं नहीं हिलता किन्तु जलके हिलनेसे हिलता हुआ प्रतीत होता है। वैसे नादके धर्म ( सादृश्य और नादमें रहनेवाले क्रम जैसे ह्रस्वत्व, दीर्घत्व, काल, गत्व आदि ) स्फोटके धर्म न होने पर भी स्फोटके धर्मकी तरह प्रतीत होने लगते हैं। अयं भावः जलगतं हि चन्द्रबिम्बं जलवृद्धौ वर्धते, जलह्रासे ह्रसति, जलचलने चलति, जलभेदे भिद्यते इत्येवंधर्मानुयायि भवति न तु परमार्थतः चन्द्रस्य तथात्वम्। एवं परमार्थतोऽक्रमपि एकरूपमपि शब्दतत्त्वं ध्वन्युपाध्यन्तर्भावात् भजत इवोपा- धिधर्मान्क्रमवत्त्वादीनिति। अत्र दर्शनद्वयम् चन्द्रबिम्बसन्निधाने तच्छायायोपरक्तास्तोयावयवाश्चन्द्रप्रतिबिम्ब- मित्येकम् । अत्र पक्षे तोयक्रिययैव तोयावयवाश्चन्द्रप्रतिबिम्बरूपा