भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| अध्याय ९० ] | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता | ४४९ | | :--- | :--- |

| परदाराभिमर्शित्वात् परार्थहरणादपि।<br>मृतोऽस्म्युद्बन्धनेनाहं नरकं रौरवं गतः॥ ६६<br><br>तस्माद् वर्षसहस्रान्ते भुक्तशिष्टे तदागसि।<br>अरण्ये मृगहा पापः संजातोऽहं मृगाधिपः॥ ६७ | परस्त्रीके साथ संसर्ग करने एवं दूसरोंके धनका हरण करनेके कारण कर्मफलके बन्धनसे ग्रस्त होनेपर मैं मरकर (विवशताया) रौरव नरकमें गया। एक हजार वर्षके बाद नरक-भोगसे बचे उस पापके कारण मैं पशुओंकी हत्या करनेवाला पापी बाघ होकर जंगलमें उत्पन्न हुआ॥ ६०—६७॥ | | व्याघ्रत्वे संस्थितस्तात बद्धः पञ्जरगः कृतः।<br>नराधिपेन विभुना नीतश्च नगरं निजम्॥ ६८<br><br>बद्धस्य पिञ्जरस्थस्य व्याघ्रत्वेऽधिष्ठितस्य ह।<br>धर्मार्थकामशास्त्राणि प्रत्यभासन्त सर्वशः॥ ६९<br><br>ततो नृपतिशार्दूलो गदापाणिः कदाचन।<br>एकवस्त्रपरीधानो नगरान्निर्ययौ बहिः॥ ७०<br><br>तस्य भार्या जिता नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि।<br>सा निर्गते तु रमणे ममान्तिकमुपागता॥ ७१<br><br>तां दृष्ट्वा ववृधे मह्यं पूर्वाभ्यासान्मनोभवः।<br>यथैव धर्मशास्त्राणि तथाहमवदं च ताम्॥ ७२<br><br>राजपुत्रि सुकल्याणि नवयौवनशालिनि।<br>चित्तं हरसि मे भीरु कोकिला ध्वनिना यथा॥ ७३<br><br>सा मद्वचनमाकर्ण्य प्रोवाच तनुमध्यमा।<br>कथमेवावयोर्व्याघ्र रतियोगमुपेक्ष्यति॥ ७४<br><br>ततोऽहमब्रुवं तात राजपुत्रीं सुमध्यमाम्।<br>द्वारमुद्घाटयस्वाद्य निर्गमिष्यामि सत्वरम्॥ ७५ | तात! एक प्रभावशाली राजाने व्याघ्रयोनिमें उत्पन्न हुए मुझको बाँधकर पिंजड़ेमें डाल दिया और अपने नगरमें ले गया। व्याघ्रकी योनिको प्राप्त हुए बन्धनसे ग्रस्त और पिंजड़ेमें पड़े हुए मुझे धर्म, अर्थ एवं कामसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी शास्त्र मनमें स्फुरित हो रहे थे।<br>उसके कुछ समय बाद वह श्रेष्ठ राजा हाथमें गदा लिये एक वस्त्र धारणकर नगरसे बाहर चला गया। उसकी जिता नामकी भार्या मृत्युलोकमें अनुपम सुन्दरी थी। पतिके बाहर जानेपर वह मेरे पास आयी। उसे देखकर पूर्व अभ्यासके कारण धर्मशास्त्रोंके ज्ञानकी वृद्धिकी तरह मेरे मनमें कामना बढ़ने लगी। उसके बाद मैंने उससे कहा—हे नवयौवनशालिनी सुकल्याणी! राजपुत्री! तुम मेरा मन उसी प्रकार हरण करती हो जिस प्रकार कोयल अपनी कूकसे लोगोंके चित्तको। उस सुन्दरीने मेरा वचन सुनकर कहा—व्याघ्र! हम दोनोंका सम्भोग कैसे सम्भव है? तात! उसके बाद मैंने उस सुन्दरी राजपुत्रीसे कहा—तुम अभी पिंजड़ेका द्वार खोलो, मैं शीघ्र बाहर निकल आऊँगा॥ ६८—७५॥ | | साऽप्यब्रवीद् दिवा व्याघ्र लोकोऽयं परिपश्यति।<br>रात्रावुद्घाटयिष्यामि ततो रंस्याव स्वेच्छया॥ ७६<br><br>तामेवाहमवोचं वै कालक्षेपेऽहमक्षमः।<br>तस्मादुद्घाटय द्वारं मां बन्धाच्च विमोचय॥ ७७<br><br>ततः सा पीवरश्रोणी द्वारमुद्घाटयन्मुने।<br>उद्घाटिते ततो द्वारे निर्गतोऽहं बहिःक्षणात्॥ ७८<br><br>पाशानि निगदादीनि छिन्नानि हि बलान्मया।<br>सा गृहीता च नृपतेर्भार्या रमितुमिच्छता॥ ७९ | उसने कहा—व्याघ्र! दिनमें लोग देखेंगे। रात्रिमें खोलूँगी, तब इच्छानुकूल हम दोनों विहार करेंगे। मैंने पुनः उससे कहा—देर करनेमें मैं असमर्थ हूँ। इसलिये द्वार खोलो और मुझे बन्धनसे मुक्त करो। उसके बाद उस सुन्दरीने द्वार खोल दिया। द्वार खुलनेपर मैं क्षणमात्रमें बाहर निकला। मैंने बलपूर्वक बेड़ी आदि बन्धनोंको तोड़ डाला और उस राजाकी पत्नीको रमण |