वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९० |
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| ततो दृष्टोऽस्मि नृपतेर्भृत्यैरतुलविक्रमैः।<br>शस्त्रहस्तैः सर्वतश्च तैरहं परिवेष्टितः ॥ ८०<br>महापाशैः शृङ्खलाभिः समाहत्य च मुद्गरैः।<br>बध्यमानोऽब्रुवमहं मा मा हिंसध्वमाकुलाः ॥ ८१<br>ते मद्वचनमाकर्ण्य मत्वैव रजनीचरम्।<br>दृढं वृक्षे समुद्बध्य घातयन्त तपोधन ॥ ८२<br>भूयो गतश्च नरकं परदारनिषेवणात्।<br>मुक्तो वर्षसहस्रान्ते जातोऽहं श्वेतगर्दभः ॥ ८३ | करनेकी कामनासे पकड़ लिया। उसके बाद राजाके अतुल पराक्रमी अनुचरोंने मुझे देखा और हाथमें शस्त्र लेकर उन लोगोंने मुझे चारों ओरसे घेर लिया। मोटी रस्सियों और जंजीरोंसे बाँधकर उन लोगोंने मुझे मुद्गरोंसे बहुत मारा। मारे जाते समय मैंने उनसे कहा—तुमलोग मुझे मत मारो। तपोधन! मेरा वचन सुनकर उन लोगोंने मुझे राक्षस समझा और वृक्षमें कसकर बाँधकर मार डाला। परस्त्री-सेवनके कारण फिर मैं नरकमें गया और हजारों वर्षोंके बाद वहाँसे छुटकारा होनेपर मैं सफेद गदहेकी योनिमें जनमा ॥ ७६-८३ ॥ | | ब्राह्मणस्याग्निवेश्यस्य गेहे बहुकलत्रिणः।<br>तत्रापि सर्वविज्ञानं प्रत्यभासत ततो मम ॥ ८४<br>उपवाह्यः कृतश्चास्मि द्विज्योषिद्भििरादरात्।<br>एकदा नवराष्ट्रीया भार्या तस्याग्रजन्मनः ॥ ८५<br>विमतिर्नामतः ख्याता गन्तुमैच्छद् गृहं पितुः।<br>तामुवाच पतिर्गच्छ आरुह्य श्वेतगर्दभम् ॥ ८६<br>मासेनागमनं कार्यं न स्थेयं परतस्ततः।<br>इत्येवमुक्ता सा भर्त्रा तन्वी मामधिरुह्य च ॥ ८७<br>बन्धनादवमुच्याथ जगाम त्वरिता मुने।<br>ततोऽर्धपथि सा तन्वी मत्पृष्ठादवरुह्य वै ॥ ८८<br>अवतीर्णा नदीं स्नातुं स्वरूपा चार्द्रवाससा।<br>साङ्गोपाङ्गं रूपवतीं दृष्ट्वा तामहमाद्रवम् ॥ ८९<br>मया चाभिद्रुता तूर्णं पतिता पृथिवीतले।<br>तस्यामुपरि भो तात पतितोऽहं भृशातुरः ॥ ९०<br>दृष्टो भर्त्रानुसृष्टेन नृणा तदनुसारिणा।<br>प्रोत्क्षिप्य यष्टिं मां ब्रह्मन् समाधावत् त्वरान्वितः ॥ ९१ | उस योनिमें मैं अनेक स्त्रियोंवाले अग्निवेश्य नामके ब्राह्मणके घरमें रहता था। वहाँ भी पूर्वजन्ममें अर्जित सारे ज्ञानोंका आभास मुझे हो रहा था। ब्राह्मणके घरकी स्त्रियोंने मुझे प्रेमसे सवारीके काममें लगाया। एक समय उस ब्राह्मणकी नवराष्ट्रदेशकी विमति नामक पत्नी अपने पिताके घर जानेके लिये उत्सुक हुई। उसके पतिने उससे कहा—इस सफेद गदहेपर सवार होकर चली जाओ और एक महीनेके भीतर चली आना। उससे अधिक समयतक न रहना। मुने! पतिके इस प्रकार कहनेपर वह सुन्दरी मेरा बन्धन खोल तत्काल मेरे ऊपर सवार हुई और चल पड़ी। उसके बाद आधे मार्गमें वह सुन्दरी मेरी पीठसे उतरकर नदीमें नहानेके लिये उतरी। भींगे वस्त्र होनेसे उसका अङ्ग स्पष्ट दिखायी पड़ा। उस सर्वाङ्गसुन्दरीको देखकर मैं उसकी ओर झपटा। मेरे झपटनेपर वह तत्काल पृथ्वीपर गिर पड़ी। तात! मैं अत्यन्त आतुर होकर उसके ऊपर गिर गया। ब्रह्मन्! स्वामीके आदेशसे उस स्त्रीके पीछे-पीछे आनेवाले अनुचरने मुझे देख लिया और डंडा उठाकर वह वेगसे मेरी ओर दौड़ पड़ा ॥ ८४-९१ ॥ | | तद्भयात् तां परित्यज्य प्रद्रुतो दक्षिणामुखः।<br>ततोऽभिद्रवतस्तूर्णं खलीनरसना मुने ॥ ९२ | उसके आतङ्कसे उस स्त्रीको छोड़कर मैं उसी समय दक्षिण दिशाकी ओर भागा। मुने! बहुत शीघ्रतासे |