भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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| अध्याय ९० ] | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता | ४५१ | | :--- | :--- |

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ममासक्ता वंशगुल्मे दुर्मोक्षे प्राणनाशने।<br>तत्रासक्तस्य षड्रात्रान्मेऽभूज्जीवितक्षयः॥ ९३<br>गतोऽस्मि नरकं भूयस्तस्मान्मुक्तोऽभवं शुकः।<br>महारण्ये तथा बद्धः शबरेण दुरात्मना॥ ९४<br>पञ्जरे क्षिप्य विक्रीतो वणिक्पुत्राय शालिने।<br>तेनाप्यन्तःपुरवरे युवतीनां समीपतः॥ ९५<br>शब्दशास्त्रविदित्‍येवं दोषघ्नश्चेत्यवस्थितः।<br>तत्रासतस्तरुणयस्ता ओदनाम्बुफलादिभिः॥ ९६<br>भक्ष्यैश्च दाडिमफलैः पुष्णन्त्यहरहः पितः।<br>कदाचित् पद्मपत्राक्षी श्यामा पीनपयोधरा॥ ९७<br>सुश्रोणी तनुमध्या च वणिक्पुत्रप्रिया शुभा।<br>नाम्ना चन्द्रावली नाम समुद्घाट्याथ पञ्जरम्॥ ९८<br>मां जग्राह सुचार्वङ्गी कराभ्यां चारुहासिनी।<br>चकारोपरि पीनाभ्यां स्तनाभ्यां सा हि मां ततः॥ ९९दौड़ते हुए मेरी लगामकी रस्सी प्राणघातिनी बाँसकी विकट झाड़ीमें फँस गयी। वहाँ फँसा हुआ मैं छः रातके बाद मर गया। उसके बाद मुझे फिर नरकमें जाना पड़ा। वहाँसे छुटकारा पानेके बाद मैं शुक पक्षीकी योनिमें उत्पन्न हुआ। उस योनिमें विशाल वनमें दुष्टात्मा शबरने मुझे बाँध लिया। पिंजड़ेमें रखकर (उसने मुझे) एक गृहस्थ वणिक्पुत्रके हाथ बेच दिया। उसने भी उत्तम महलमें युवतियोंके पास मुझे सम्पूर्ण शास्त्रका जाननेवाला तथा दोषोंको दूर करनेवाला समझकर रख दिया। पिताजी! वहाँ रहते समय वे युवतियाँ प्रतिदिन मुझे भात, जल, अनारके फल तथा अन्य भक्ष्य पदार्थ खिलाकर पालने लगीं। एक समय वणिक्पुत्रकी कमलदलके समान नेत्रोंवाली श्यामा, विशाल स्तनों तथा सुन्दर जंघाओं एवं सूक्ष्म कटिवाली कल्याणी चन्द्रावली नामकी प्रियाने पिंजड़ेको खोला। मधुर मुसकानवाली सुन्दरीने मुझे दोनों हाथोंमें पकड़ लिया और अपने दोनों स्तनोंपर रख लिया॥ ९२—९९॥
ततोऽहं कृतवान् भावं तस्यां विलसितुं प्लवन्।<br>ततोऽनुप्लवतस्तत्र हारे मर्कटबन्धनम्॥ १००<br>बद्धोऽहं पापसंयुक्तो मृतश्च तदनन्तरम्।<br>भूयोऽपि नरकं घोरं प्रपन्नोऽस्मि सुदुर्मतिः॥ १०१<br>तस्माच्चाहं वृषत्वं वै गतश्चाण्डालपक्कणे।<br>स चैकदा मां शकटे नियोज्य स्वां विलासिनीम्॥ १०२<br>समारोप्य महातेजा गन्तुं कृतमतिर्वनम्।<br>ततोऽग्रतः स चण्डालो गतस्त्वेषास्य पृष्ठतः॥ १०३<br>गायन्ती याति तच्छ्रुत्वा जातोऽहं व्यथितेन्द्रियः।<br>पृष्ठतस्तु समालोक्य विपर्यस्तस्तथोत्प्लुतः॥ १०४<br>पतितो भूमिमगमं तदक्षे क्षणविक्रमात्।<br>योक्त्रे सुबद्ध एवाशु पञ्चत्वमगमं ततः॥ १०५<br>भूयो निमग्नो नरके दशवर्षशतान्यपि।<br>अतस्तव गृहे जातस्त्वहं जातिमनुस्मरन्॥ १०६<br>तावन्त्येवाद्य जन्मानि स्मरामि चानुपूर्वशः।<br>पूर्वाभ्यासाच्च शास्त्राणि बन्धनं चागतं मम॥ १०७उसके बाद मैंने चन्द्रावलीके साथ विहार करनेका आशय प्रकट किया। तब पापमें आसक्त होकर घूमता हुआ मैं उसके हारमें बंदरके बन्धनकी भाँति बँधकर मर गया। मैं पुनः अत्यन्त पापमय बुद्धि होनेके कारण भयंकर नरकमें पड़ गया। उसके बाद मैं बैल होकर चाण्डालके घरमें पहुँचा। उसने एक दिन मुझे गाड़ीमें जोतकर उस गाड़ीपर अपनी स्त्रीको चढ़ाया। इस प्रकार वनमें जानेकी इच्छासे वह महातेजस्वी चाण्डाल आगे चला और उसके पीछे वह गाती हुई चली। उसका गान सुनकर मेरी इन्द्रियाँ विकल हो उठीं। मैंने पीछे घूमकर देखा और कूदा तथा उलट गया। क्षणमात्रके विपरीत गतिके कारण मैं भूमिपर गिर पड़ा और रस्सीमें अत्यन्त बँध जानेसे मृत्युको प्राप्त हो गया। मैं फिर हजार वर्षतक नरकमें पड़ा रहा। वहाँसे अपने पूर्वजन्मका स्मरण करता हुआ मैं आपके गृहमें उत्पन्न हुआ हूँ। मैं आज उन्हीं जन्मोंका क्रमशः स्मरण कर रहा हूँ। पूर्व अभ्याससे मुझे शास्त्रोंका ज्ञान तथा बन्धन मिला है।