भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९०

| तदहं जातविज्ञानो नाचरिष्ये कथंचन।<br>पापानि घोररूपाणि मनसा कर्मणा गिरा॥ १०८ | अतः ज्ञानी होकर मैं मन, कर्म और वाणीसे कभी घोर पापकर्मोंका आचरण नहीं करूँगा॥ १००—१०८॥ | | शुभं वाप्यशुभं वाऽपि स्वाध्यायं शास्त्रजीविका।<br>बन्धनं वा वधो वाऽपि पूर्वाभ्यासेन जायते॥ १०९<br>जातिं यदा पौर्विकीं तु स्मरते तात मानवः।<br>तदा स तेभ्यः पापेभ्यो निवृत्तिं हि करोति वै॥ ११०<br>तस्माद् गमिष्ये शुभवर्धनाय<br>पापक्षयायाथ मुने ह्यारण्यम्।<br>भवान् दिवाकीर्तिमिमं सुपुत्रं<br>गार्हस्थ्यधर्मे विनियोजयस्व॥ १११ | मङ्गल, अमङ्गल, स्वाध्याय, शास्त्रजीविका, बन्धन या वध पूर्व अभ्यासवश ही होते हैं। तात! मनुष्यको जब अपने पूर्वजन्मका स्मरण होता है तब वह उन पापोंसे दूर रहता है। अतः मुने! शुभकी वृद्धि और पापके क्षयके लिये मैं वनमें जाऊँगा। आप इस सुपुत्र दिवाकीर्तिको गृहस्थधर्ममें लगायें॥ १०९—१११॥ | | बलिरुवाच<br>इत्येवमुक्त्वा स निशाकरस्तदा<br>प्रणम्य मातापितरौ महर्षे।<br>जगाम पुण्यं सदनं मुरारेः<br>ख्यातं बदर्याश्रममाद्यमीड्यम्॥ ११२<br>एवं पुराभ्यासरतस्य पुंसो<br>भवन्ति दानाध्ययनादिकानि।<br>तस्माच्च पूर्वं द्विजवर्य वै मया<br>अभ्यस्तमासीन्ननु ते ब्रवीमि॥ ११३<br>दानं तपो वाऽध्ययनं महर्षे<br>स्तेयं महापातकमग्निदाहम्।<br>ज्ञानानि चैवाभ्यसतां हि पूर्वं<br>भवन्ति धर्मार्थयशांसि नाथ॥ ११४ | बलिने कहा— महर्षे! इस प्रकार कहनेके बाद माता-पिताको प्रणाम कर वह निशाकर भगवान् नारायणके श्रेष्ठ सुप्रसिद्ध पवित्र निवास बदरिकाश्रममें चला गया। इसी प्रकार पूर्वके अभ्यासवश मनुष्यके दान एवं अध्ययन आदि कार्य होते हैं। द्विजवर्य! इसीसे निश्चय ही मैं आपसे अपने पूर्व अभ्यासके तथ्यको कह रहा हूँ। महर्षे! नाथ! दान, तप, अध्ययन, चोरी, महापातक, अग्निदाह, ज्ञान, धर्म, अर्थ एवं यश आदि सभी पूर्वजन्मोंके अभ्याससे उत्पन्न होते हैं॥ ११२—११४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा बलवान् स शुक्रं<br>दैत्येश्वरः स्वं गुरुमीशितारम्।<br>ध्यायंस्तदास्ते मधुकैटभघ्नं<br>नारायणं चक्रगदासिपाणिम्॥ ११५ | पुलस्त्यजी बोले— दैत्येश्वर बलवान् बलि अपने गुरु और नियमन करनेवाले शुक्राचार्यसे इस प्रकार कहकर मधुकैटभके संहारकारी चक्र-गदा तथा खड्ग धारण करनेवाले नारायणका ध्यान करने लगा॥ ११५॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नब्बेवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ९०॥