वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ९१ ] | वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर उससे तीन पग भूमिकी याचना | ४५५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इष्टापूर्तादयः सर्वाः क्रियास्तत्र तु संस्थिताः।<br>पृष्ठस्था वसवो देवाः स्कन्धौ रुद्रैरधिष्ठितौ॥ २२ | जठरमें ही इष्टापूर्त आदि समस्त क्रियाएँ भी अवस्थित थीं। उनकी पीठमें वसुगण और देवगण तथा कन्धोंमें रुद्रगण स्थित थे॥ १६—२२॥ |
| बाहवश्च दिशः सर्वा वसवोऽष्टौ करे स्मृताः।<br>हृदये संस्थितो ब्रह्मा कुलिशो हृदयास्थिषु॥ २३<br>श्रीसमुद्रा उरोमध्ये चन्द्रमा मनसि स्थितः।<br>ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यास्तद्वलयस्थिताः॥ २४<br>मुखे तु साग्नयो विप्राः संस्कारा दशनच्छदाः।<br>धर्मकामार्थमोक्षीयाः शास्त्राः शौचसमन्विताः॥ २५<br>लक्ष्म्या सह ललाटस्थाः श्रवणाभ्यामथाश्विनौ।<br>श्वासस्थो मातरिश्वा च मरुतः सर्वसंधिषु॥ २६<br>सर्वसूक्तानि दशना जिह्वा देवी सरस्वती।<br>चन्द्रादित्यौ च नयने पक्ष्मस्थाः कृत्तिकादयः॥ २७<br>शिखायां देवदेवस्य ध्रुवो राजा न्यषीदत।<br>तारका रोमकूपेभ्यो रोमाणि च महर्षयः॥ २८<br>गुणैः सर्वमयो भूत्वा भगवान् भूतभावनः।<br>क्रमेणैकेन जगतीं जहार सचराचराम्॥ २९ | सारी दिशाएँ उनके बाहुस्वरूप थीं। उनके हाथोंमें आठों वसु, हृदयमें ब्रह्मा एवं हृदयकी हड्डियोंमें कुलिश स्थित था। छातीके बीच श्री तथा समुद्र, मनमें चन्द्रमा, ग्रीवामें देवमाता अदिति तथा वलयोंमें सारी विद्याएँ व्यवस्थित थीं। मुखमें अग्निके सहित ब्राह्मण, ओष्ठमें सभी धार्मिक संस्कार, ललाटमें लक्ष्मीसहित तथा पवित्रताके साथ धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्षसम्बन्धी शास्त्र, कर्णोंमें अश्विनीकुमार, श्वासमें वायु एवं सभी जोड़के स्थानोंमें मरुद्गण स्थित थे। उनके दाँतोंमें सम्पूर्ण सूक्त, जिह्वामें सरस्वती देवी, दोनों नेत्रोंमें चन्द्र और सूर्य तथा बरौनियोंमें कृत्तिका आदि नक्षत्र स्थित थे। देवदेवकी शिखामें राजा ध्रुव, रोमकूपोंमें ताराग्र और रोमोंमें महर्षि लोग अवस्थित थे। भूतभावन भगवान्ने गुणोंद्वारा सर्वमय होकर एक पदमें ही चराचरसहित सारी पृथ्वीका हरण कर लिया॥ २३—२९॥ |
| भूमिं विक्रममाणस्य महारूपस्य तस्य वै।<br>दक्षिणोऽभूत् स्तनश्चन्द्रः सूर्योऽभूदथ चोत्तरः।<br>नभश्चाक्रमतो नाभिं सूर्येन्दू सव्यदक्षिणौ॥ ३० | भूमिको नापते हुए उन विशाल रूपधारीके चन्द्रमा और सूर्य दक्षिण तथा उत्तर स्तन हो गये। इसी प्रकार आकाशकी ओर पग बढ़ाते समय सूर्य और चन्द्रमा उनकी नाभिके वाम तथा दक्षिणभागमें अवस्थित |
| द्वितीयेन क्रमेणाथ स्वर्महर्जनतापसाः।<br>क्रान्ताधार्धेन वैराजं मध्येनापूर्यताम्बरम्॥ ३१ | हुए। इसके बाद उन्होंने द्वितीय चरणके आधेसे स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक और तपोलोक तथा पग बढ़ाकर शेष आधेसे वैराजलोक और मध्यभागसे आकाशको पूरा किया। |
| ततः प्रतापिना ब्रह्मन् बृहद्विष्ण्वङ्घ्रिणाम्बरे।<br>ब्रह्माण्डोदरमाहत्य निरालोकं जगाम ह॥ ३२ | ब्रह्मन्! इसके बाद विष्णुका प्रतापी विशाल चरण आकाशमें ब्रह्माण्डके उदरभागको भेदकर निरालोकमें चला गया। |
| विश्वाङ्घ्रिणा प्रसरता कटाहो भेदितो बलात्।<br>कुटिला विष्णुपादे तु समेत्य कुटिला ततः॥ ३३ | विष्णुके बढ़ते चरणने बलपूर्वक कटाहका भेदन कर दिया। विष्णुका चरण कुटिला नदीके निकट पहुँच गया। |
| तस्या विष्णुपदीत्येवं नामाख्यातमभून्मुने।<br>तथा सुरनदीत्येवं तामसेवन्त तापसाः।<br>भगवानप्यसम्पूर्णे तृतीये तु क्रमे विभुः॥ ३४ | मुने! इससे कुटिला विष्णुपदी नामसे प्रसिद्ध हुई। तपस्या करनेवाले लोग देवनदीके रूपमें उसकी सेवा करने लगे। सर्वसमर्थ भगवान् तीसरे चरणके पूर्ण न होनेपर |