भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 466
४५६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
समभ्येत्य बलिं प्राह ईषत् प्रस्फुरिताधरः ।<br>ऋणाद् भवति दैत्येन्द्र बन्धनं घोरदर्शनम्।<br>त्वं पूरय पदं तन्मे नो चेद् बन्धं प्रतीच्छ भोः ॥ ३५<br><br>तन्मुरारिवचः श्रुत्वा विहस्याथ बलेः सुतः ।<br>बाणः प्राहामरपतिं वचनं हेतुसंयुक्तम् ॥ ३६बलिके समीप गये और ओठको किंचित् स्फुरित करते हुए बोले—दैत्येन्द्र ! ऋण न चुकानेपर देखनेमें भयंकर बन्धन प्राप्त होता है। अतः तुम मेरे शेष पदको पूरा करो, नहीं तो बन्धन स्वीकार करो। मुरारि (भगवान्)-के उस वचनको सुनकर बलिके पुत्र बाणने अमरपतिसे हँसकर हेतुसे युक्त वचन कहा ॥ ३०—३६ ॥
बाण उवाच<br>कृत्वा महीमल्पतरां जगत्पते<br>स्वायम्भुवादिभुवनानि वै षट् ।<br>कथं बलिं प्रार्थयसे सुविस्तृतां<br>यां प्राग्भवान् नो विपुलामथाकरोत् ॥ ३७<br><br>विभो मही यावतीयं त्वयाऽद्य<br>सृष्टा समेता भुवनान्तरालैः ।<br>दत्ता च तातेन हि तावतीयं<br>किं वाक्छलेनैष निबध्यतेऽद्य ॥ ३८<br><br>या नैव शक्या भवता हि पूरितुं<br>कथं वितन्याद् दितिजेश्वरोऽसौ।<br>शक्तस्तु सम्पूजयितुं मुरारे<br>प्रसीद मा बन्धनमादिशस्व ॥ ३९<br><br>प्रोक्तं श्रुतौ भवतापीश वाक्यं<br>दानं पात्रे भवते सौख्यदायि।<br>देशे सुपुण्ये वरदे यच्च काले<br>तच्चाशेषं दृश्यते चक्रपाणे ॥ ४०बाणने कहा— जगत्पते ! आपने स्वायम्भुव आदि छः भुवनोंका ही निर्माणकर पृथ्वीको छोटा बनाया है। आपने भूमिको पहले ही विशाल नहीं बनाया, अतः आप बलिसे अत्यन्त विशाल भूमि कैसे माँगते हैं। विभो! भुवनोंके मध्यवर्ती स्थानोंके साथ जितनी पृथ्वीकी सृष्टि आपने की थी उसे मेरे पिताने आज आपको दे दिया। अतः आप कपटके द्वारा उन्हें क्यों बाँधते हैं? मुरारे! जिस पृथ्वीकी कमीको आप पूरा नहीं कर सकते, उसको ये दानवपति कैसे विस्तृत कर सकेंगे? ये आपकी पूजा करनेमें समर्थ हैं। अतः आप प्रसन्न हों और इन्हें बन्धन प्राप्त करनेका आदेश न दें। (प्रभो!) आपने ही श्रुतिमें यह कहा है कि पवित्र देश, काल एवं वर देनेके समय सत्पात्रमें दिया गया दान सुख देनेवाला होता है। चक्रपाणे ! वह सम्पूर्ण (सुयोग) दिखलायी पड़ रहा है ॥ ३७—४० ॥
दानं भूमिः सर्वकामप्रदेयं<br>भवान् पात्रं देवदेवो जितात्मा।<br>कालो ज्येष्ठामूलयोगे मृगाङ्कः<br>कुरुक्षेत्रं पुण्यदेशं प्रसिद्धम् ॥ ४१समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला भूमिका दान हो रहा है, देवोंके अधिदेव अपने-आपको नियन्त्रित रखनेवाले आप पात्र हैं, ज्येष्ठा एवं मूलके योगमें स्थित चन्द्रमासे युक्त काल है तथा प्रसिद्ध पवित्र कुरुक्षेत्रका देश है
किं वा देवोऽस्मद्विधैर्बुद्धिहीनैः<br>शिक्षानीयः साधु वाऽसाधु चैव।<br>स्वयं श्रुतीनामपि चादिकर्ता<br>व्याप्य स्थितः सदसद् यो जगद् वै ॥ ४२अथवा हम-जैसे बुद्धिहीन लोगोंके द्वारा आप भगवान्‌को उचित और अनुचित शिक्षा क्या दी जाय? आप स्वयं वेदोंके भी आदिस्रष्टा और सदसद्-विश्वको व्याप्त कर अवस्थित हैं।
कृत्वा प्रमाणं स्वयमेव हीनं<br>पदत्रयं याचितवान् भुवश्च।<br>किं त्वं न गृह्णासि जगत्त्रयं भो<br>रूपेण लोकत्रयवन्दितेन ॥ ४३आपने स्वयं अपने प्रमाण (शारीरिक आकार)-को छोटा बनाकर तीन पग भूमि माँगी थी। देव! क्या आपने तीनों लोकोंमें अपने वन्दित रूपसे तीनों लोकोंको ग्रहण नहीं कर लिये हैं?