भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| अध्याय ९१ ] | वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर उससे तीन पग भूमिकी याचना | ४५७ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नात्राश्चर्यं यज्जगद् वै समग्रं<br>क्रमत्रयं नैव पूर्णं तवाद्य।<br>क्रमेण त्वं लङ्घयितुं समर्थो<br>लीलामेतां कृतवान् लोकनाथ॥ ४४<br>प्रमाणहीनां स्वयमेव कृत्वा<br>वसुन्धरां माधव पद्मनाभ।<br>विष्णो न बध्नासि बलिं न दूरे<br>प्रभुर्यदेवेच्छति तत्करोति॥ ४५आपके तीन पगोंको सारा संसार पूरा नहीं कर सका—इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आप इसको अपने एक पगसे ही लाँघ सकते हैं। लोकनाथ! आपने तो यह लीला ही की है। माधव! पद्मनाभ! विष्णो! पृथ्वीको अपने-आप छोटे पैमानेमें बनाकर बलिको बाँधना उचित नहीं। (ठीक है, आप) प्रभु जो चाहते हैं वही करते हैं॥ ४१—४५॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने बाणेन बलिसूनुना।<br>प्रोवाच भगवान् वाक्यमादिकर्ता जनार्दनः॥ ४६पुलस्त्यजी बोले— बलिपुत्र बाणके इस प्रकार कहनेपर आदिस्रष्टा भगवान् जनार्दनने यह वचन कहा॥ ४६॥
त्रिविक्रम उवाच<br>यान्युक्तानि वचांसीत्थं त्वया बालेय साम्प्रतम्।<br>तेषां वै हेतुसंयुक्तं शृणु प्रत्युत्तरं मम॥ ४७<br>पूर्वमुक्तस्तव पिता मया राजन् पदत्रयम्।<br>देहि मह्यं प्रमाणेन तदेतत् समनुष्ठितम्॥ ४८<br>किं न वेत्ति प्रमाणं मे बलिस्तव पितासुर।<br>प्रायच्छद् येन निःशङ्कं ममानन्तं क्रमत्रयम्॥ ४९<br>सत्यं क्रमेण चैकेन क्रमेयं भूर्भुवादिकम्।<br>बलेरपि हितार्थाय कृतमेतत् क्रमत्रयम्॥ ५०<br>तस्माद् यन्मम बालेय त्वत्पित्राम्बु करे महत्।<br>दत्तं तेनायुरेतस्य कल्पं यावद् भविष्यति॥ ५१<br>गते मन्वन्तरे बाण श्राद्धदेवस्य साम्प्रतम्।<br>सावर्णिके च सम्प्राप्ते बलिरिन्द्रो भविष्यति॥ ५२<br>इत्थं प्रोक्त्वा बलिसुतं बाणं देवस्त्रिविक्रमः।<br>प्रोवाच बलिमभ्येत्य वचनं मधुराक्षरम्॥ ५३त्रिविक्रमने कहा— बलिनन्दन! तुमने इस समय इस प्रकार जिन वचनोंको कहा है उनका कारण-सहित प्रत्युत्तर मुझसे सुनो। मैंने पहले ही तुम्हारे पितासे यह कहा था कि ‘राजन्! मेरे प्रमाणके अनुसार मुझे तीन पग भूमि दो।' उन्होंने भलीभाँति उसका सम्मान किया। असुर! क्या तुम्हारे पिता बलि मेरा प्रमाण नहीं जानते थे, जो उन्होंने निःशङ्क होकर मेरे अनन्त तीन पगोंका दान किया। सचमुच ही मैं अपने एक पैरसे समस्त भूः, भुवः आदि जगत्‌को नाप सकता हूँ। बलिके कल्याणके लिये ही मैंने ये तीन पग किये हैं। अतः बलिपुत्र! तुम्हारे पिताने मेरे हाथमें शुद्ध जल दिया है, इससे उनकी आयु एक कल्पकी होगी। बाण! श्राद्धदेवका वर्तमान मन्वन्तर बीत जानेके बाद सावर्णिक मन्वन्तरके आनेपर बलि इन्द्र बनेंगे। बलिके पुत्र बाणसे इस प्रकार कहनेके बाद त्रिविक्रम देव बलिके निकट गये और उससे मधुर वचन कहे—॥ ४७—५३॥
श्रीभगवानुवाच<br>आपूरणाद् दक्षिणाया गच्छ राजन् महाफलम्।<br>सुतलं नाम पातालं वस तत्र निरामयः॥ ५४श्रीभगवान्‌ने कहा— राजन्! दक्षिणाकी सम्पन्नता होनेतक तुम्हें यह महान् फल प्राप्त करना होगा। तुम सुतल नामक पातालमें नीरोग—स्वस्थ होकर निवास करो॥ ५४॥
बलिरुवाच<br>सुतले वसतो नाथ मम भोगाः कुतोऽव्ययाः।<br>भविष्यन्ति तु येनाहं निवत्स्यामि निरामयः॥ ५५बलिने कहा— नाथ! सुतलमें निवास करते समय नीरोग—स्वस्थरूपसे रहनेके लिये अक्षय अविनाशी-स्वास्थ्यप्रद भोग कहाँसे प्राप्त होंगे?॥ ५५॥