भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ११
संस्कृतहिन्दी
त्रिविक्रम उवाच<br>सुतलस्थस्य दैत्येन्द्र यानि भोगानि तेऽधुना।<br>भविष्यन्ति महार्हाणि तानि वक्ष्यामि सर्वशः॥ ५६<br>दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च।<br>तथाधीतान्यव्रतिभिर्दास्यन्ति भवतः फलम्॥ ५७<br>तथान्यमुत्सवं पुण्यं वृत्ते शक्रमहोत्सवे।<br>द्वारप्रतिपदा नाम तव भावी महोत्सवः॥ ५८<br>तत्र त्वां नरशार्दूला हृष्टाः पुष्टाः स्वलंकृताः।<br>पुष्पदीपप्रदानेन अर्चयिष्यन्ति यत्नतः॥ ५९<br>तत्रोत्सवो मुख्यतमो भविष्यति<br>दिवानिशं हृष्टजनाभिरामम्।<br>यथैव राज्ये भवतस्तु साम्प्रतं<br>तथैव सा भाव्यथ कौमुदी च॥ ६०त्रिविक्रमने कहा— दैत्येन्द्र! मैं इस समय तुम्हारे सामने उन सम्पूर्ण बहुमूल्य भोगोंका वर्णन करता हूँ जो पृथ्वीके तलमें निवास करते समय तुम्हें प्राप्त होंगे। अविधिपूर्वक किये गये दान, अश्रोत्रियद्वारा किये गये श्राद्ध एवं ब्रह्मचर्यव्रतरहित अध्ययन आपको फल प्रदान करेंगे। इन्द्र-पूजनके बाद आनेवाली प्रतिपदाको तुम्हारे पूजनके निमित्त दूसरा उत्सव मनाया जायगा, जिसका नाम होगा—'द्वारप्रतिपदा'। उस उत्सवके समय हृष्ट-पुष्ट, नरश्रेष्ठ लोग सुन्दर रूपसे सज-धजकर पुष्प और दीप देकर प्रयत्नपूर्वक आपकी अर्चना करेंगे। आपके राज्यमें इस समय जिस प्रकार दिन-रात जनसमुदायके प्रसन्न रहनेके कारण सुन्दर महोत्सव बना रहता है, उसी प्रकार उत्सवोंमें श्रेष्ठ वह 'कौमुदी' नामका उत्सव होगा॥ ५६—६०॥
इत्येवमुक्त्वा मधुहा दितीश्वरं<br>विसर्जयित्वा सुतलं सभार्यम्।<br>यज्ञं समादाय जगाम तूर्णं<br>स शक्रसद्मामरसङ्घजुष्टम्॥ ६१<br>दत्त्वा मघोने च विभुस्त्रिविष्टपं<br>कृत्वा च देवान् मखभागभोक्तॄन्।<br>अन्तर्दधे विश्वपतिर्महर्षे<br>सम्पश्यतामेव सुराधिपानाम्॥ ६२<br>स्वर्गं गते धातरि वासुदेवे<br>शाल्वोऽसुराणां महता बलेन।<br>कृत्वा पुरं सौभमिति प्रसिद्धं<br>तदान्तरिक्षे विचचार कामात्॥ ६३<br>मयस्तु कृत्वा त्रिपुरं महात्मा<br>सुवर्णताम्रायससमग्रसौख्यम् ।<br>स तारकाक्षः सह वैद्युतेन<br>संतिष्ठते भृत्यकलत्रवान् सः॥ ६४मधुसूदनने दानवेश्वर बलिसे इस प्रकार कहकर उसे पत्नीके साथ सुतल लोकमें भेज दिया। इसके बाद वे शीघ्र यज्ञको—अग्निदेवको साथ ले देव-समूहसे सेवित इन्द्रभवन चले गये। महर्षे! उसके बाद सबका पालन-पोषण करनेवाले व्यापक भगवान् विष्णु, इन्द्रको स्वर्ग देकर और देवताओंको यज्ञ-भागका अधिकारी बनाकर देवताओंके देखते-ही-देखते अन्तर्धान हो गये। ब्रह्मा, वासुदेवके स्वर्ग चले जानेपर दानव शाल्व दैत्यकी बड़ी सेना लेकर सौभ नामका प्रसिद्ध नगर बनाकर इच्छानुसार आकाशमें घूमने लगा। नौकरों और अपनी पत्नीके साथ महात्मा मय सोने, ताँबे एवं लोहेके तीन नगरोंका निर्माण करके तारकाक्ष तथा वैद्युतके साथ अत्यन्त सुखपूर्वक उनमें रहने लगा॥ ६१—६४॥
बाणोऽपि देवेन हृते त्रिविष्टपे<br>बद्धे बलौ चापि रसातलस्थे।<br>कृत्वा सुगुप्तं भुवि शोणिताख्यं<br>पुरं स चास्ते सह दानवेन्द्रैः॥ ६५बाणासुर भी विष्णुके द्वारा स्वर्ग छीन लिये जानेपर और बलिके बँधने तथा रसातलमें रहनेपर अत्यन्त सुरक्षित शोणित नामके पुरका निर्माण कर दानवेन्द्रोंके