वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ९२ ] ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति ४५९
| एवं पुरा चक्रधरेण विष्णुना<br>बद्धो बलिर्वामनरूपधारिणा।<br>शक्रप्रियार्थं सुरकार्यसिद्धये<br>हिताय विप्रर्षभगोद्विजानाम्॥ ६६<br><br>प्रादुर्भावस्ते कथितो महर्षे<br>पुण्यः शुचिर्वामनस्याघहारी।<br>श्रुते यस्मिन् संस्मृते कीर्तिते च<br>पापं याति प्रक्षयं पुण्यमेति॥ ६७<br><br>एतत् प्रोक्तं भवतः पुण्यकीर्तेः<br>प्रादुर्भावो बलिबन्धोऽव्ययस्य।<br>यच्चाप्यन्यच्छ्रोतुकामोऽसि विप्र<br>तत्प्रोच्यतां कथयिष्याम्यशेषम्॥ ६८ | साथ रहने लगा। इस प्रकार प्राचीन कालमें चक्र धारण करनेवाले विष्णुने वामनरूप धारण कर इन्द्रकी भलाई, देवताओंकी कार्यसिद्धि तथा ब्राह्मणों, ऋषियों (गायोंके समूह) और द्विजोंके हितके लिये बलिको बाँधा था। महर्षे! मैंने आपसे वामनके पापहारी, पुण्ययुक्त एवं पवित्र प्रादुर्भावका वर्णन किया। इसके सुनने और कीर्तनसे पापका नाश एवं पुण्यकी प्राप्ति होती है। विप्र! मैंने अक्षय पुण्यकीर्तिवाले वामनदेवके आविर्भाव तथा बलिको बाँधनेकी कथाका आपसे वर्णन किया। अब आप अन्य जो कुछ सुनना चाहते हों, उसे कहिये। मैं पूर्णतया उसका वर्णन करूँगा॥ ६५–६८॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९१ ॥
बानबेवाँ अध्याय
ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति और वामनरूपमें विष्णुका स्वर्गमें निवास
| नारद उवाच<br><br>श्रुतं यथा भगवता बलिर्बद्धो महात्मना।<br>किंत्वस्त्यन्यत्तु प्रष्टव्यं तच्छ्रुत्वा कथयाद्य मे॥ १<br><br>भगवान् देवराजाय दत्त्वा विष्णुस्त्रिविष्टपम्।<br>अन्तर्धानं गतः क्वासौ सर्वात्मा तात कथ्यताम्॥ २<br><br>सुतलस्थश्च दैत्येन्द्रः किमकार्षीत् तथा वद।<br>का चेष्टा तस्य विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ३ | नारदजीने कहा—महात्मा भगवान्ने जिस प्रकार बलिको बाँधा था उसे मैंने सुना। परंतु प्रभो! आपसे और अन्य विषय भी मुझे पूछना है। उसे सुनकर आप मुझे उसके सम्बन्धमें बतलाइये। तात! आप यह बतलाइये कि देवराज इन्द्रको स्वर्ग देनेके बाद वे सर्वात्मस्वरूप भगवान् विष्णु अन्तर्हित होकर कहाँ चले गये। इसके सिवाय यह भी बतलाइये कि सुतलमें रहनेवाले दैत्यश्रेष्ठने क्या किया और विप्रवर! आप मुझे विशेषरूपसे यह बतायें कि उसके बाद उसकी कौन-सी चेष्टा रही?॥ १–३॥ |