भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४६०श्रीवामनपुराण[ अध्याय १२

| पुलस्त्य उवाच<br>अन्तर्धाय सुरावासं वामनोऽभूदवामनः।<br>जगाम ब्रह्मसदनमधिरुह्योरगाशनम्॥ ४<br>वासुदेवं समायान्तं ज्ञात्वा ब्रह्माऽव्ययात्मकः।<br>समुत्थायाथ सौहार्दात् सस्वजे कमलासनः॥ ५<br>परिष्वज्यार्च्य विधिना वेधाः पूजादिना हरिम्।<br>पप्रच्छ किं चिरेणेह भवतागमनं कृतम्॥ ६<br>अथोवाच जगत्स्वामी मया कार्यं महत्कृतम्।<br>सुराणां क्रतुभागार्थं स्वयंभो बलिबन्धनम्॥ ७<br>पितामहस्तद् वचनं श्रुत्वा मुदितमानसः।<br>कथं कथमिति प्राह त्वं मां दर्शितुमर्हसि॥ ८<br>इत्येवमुक्ते वचने भगवान् गरुडध्वजः।<br>दर्शयामास तद्रूपं सर्वदेवमयं लघु॥ ९<br>तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं योजनायुतविस्तृतम्।<br>तावानेवोर्ध्वमानेन ततोऽजः प्रणतोऽभवत्॥ १०<br>ततः प्रणम्य सुचिरं साधु साध्वित्युदीर्य च।<br>भक्तिनम्रो महादेवं पद्मजः स्तोत्रमीरयत्॥ ११ | पुलस्त्यजी बोले— वामनदेवने अन्तर्धान होनेके बाद अपना वामनस्वरूप छोड़ दिया एवं गरुडपर चढ़कर वे देवोंके स्थान ब्रह्मलोकको चले गये। वासुदेवको आया हुआ जानकर कमलके आसनपर बैठे हुए नित्य-स्वरूपवाले ब्रह्मा (अपने आसनसे) उठे और सौहार्द्रभावसे विष्णुको गले लगा लिये। आलिङ्गनके बाद विधिपूर्वक अर्चा आदिद्वारा हरिकी पूजा कर ब्रह्माने पूछा—(भगवन्) 'बहुत समयके बाद आपके यहाँ आनेका क्या कारण है?' उसके बाद जगत्पतिने कहा—ब्रह्मन्! 'मैंने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। एक—देवोंके यज्ञभागके लिये मैंने बलिको बाँधा है।' यह वचन सुनकर ब्रह्माने प्रसन्न होकर कहा—यह कैसे! यह कैसे! आप उस (बाँधनेके लिये धृत) रूपको मुझे दिखलाइये। ऐसा वचन कहे जानेपर भगवान् गरुडध्वज (विष्णु)-ने शीघ्रतासे वह सर्वदेव-स्वरूप अपना रूप दिखला दिया। कमलनयन भगवान्‌के दस हजार योजन विस्तृत तथा उतने ही ऊँचे उस रूपको देखकर पितामहने प्रणाम किया। उसके बाद देरतक प्रणाम कर ब्रह्माने साधु, साधु कहा और श्रद्धापूर्वक नम्रतासे (उन) महादेवकी स्तुति करने लगे—॥ ४–११॥ | | ॐ नमस्ते देवाधिदेव वासुदेव एकशृङ्ग बहुरूप<br>वृषाकपे भूतभावन सुरासुरवृष सुरासुरमथन पीतवासः<br>श्रीनिवास असुरनिर्मितान्त अमितनिर्मित कपिल<br>महाकपिल विष्वक्सेन नारायण। ध्रुवध्वज सत्यध्वज<br>खड्गध्वज तालध्वज वैकुण्ठ पुरुषोत्तम वरेण्य विष्णो<br>अपराजित जय जयन्त विजय कृतावर्त महादेव<br>अनादे अनन्त आद्यन्तमध्यनिधन पुरञ्जय धनञ्जय<br>शुचिश्रव पृश्निगर्भ। कमलगर्भ कमलायताक्ष श्रीपते<br>विष्णुमूल मूलाधिवास धर्माधिवास धर्मवास<br>धर्माध्यक्ष प्रजाध्यक्ष गदाधर श्रीधर श्रुतिधर<br>वनमालाधर लक्ष्मीधर धरणीधर पद्मनाभ। विरिञ्चे | हे देवोंके देव! वासुदेव! एकशृङ्ग! बहुरूप!<br>वृषाकपे! भूतभावन! सुरों और असुरोंमें श्रेष्ठ! देवताओं<br>और असुरोंका मथन करनेवाले पीतवस्त्रधारी! श्रीनिवास!<br>असुरनिर्मितान्त! अमितनिर्मित! कपिल! महाकपिल!<br>विष्वक्सेन! नारायण! आपको नमस्कार है। ध्रुवध्वज!<br>सत्यध्वज! खड्गध्वज! तालध्वज! वैकुण्ठ! पुरुषोत्तम!<br>वरेण्य! विष्णो! अपराजित! जय! जयन्त! विजय!<br>कृतावर्त! महादेव! अनादे! अनन्त! आद्यन्त! मध्यनिधन!<br>पुरञ्जय! धनञ्जय! शुचिश्रव! पृश्निगर्भ! (आपको नमस्कार<br>है।) कमलगर्भ! कमलायताक्ष! श्रीपते! विष्णुमूल!<br>मूलाधिवास! धर्माधिवास! धर्मवास! धर्माध्यक्ष! प्रजाध्यक्ष!<br>गदाधर! श्रीधर! श्रुतिधर! वनमालाधर! लक्ष्मीधर!<br>धरणीधर! पद्मनाभ! (आपको नमस्कार है।) विरिञ्चे! |