भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ९२ ]ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्‌की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति४६१
संस्कृतहिन्दी अर्थ
आर्ष्टिषेण महासेन सेनाध्यक्ष पुरुष्टुत बहुकल्प महाकल्प कल्पनामुख अनिरुद्ध सर्वग सर्वात्मन् द्वादशात्मक सूर्यात्मक सोमात्मक कालात्मक व्योमात्मक भूतात्मक। रसात्मक परमात्मन् सनातन मुञ्जकेश हरिकेश गुडाकेश केशव नील सूक्ष्म स्थूल पीत रक्त श्वेत श्वेताधिवास रक्ताम्बरप्रिय प्रीतिकर प्रीतिवास हंस नीलवास सीरध्वज सर्वलोकाधिवास। कुशेशय अधोक्षज गोविन्द जनार्दन मधुसूदन वामन नमस्ते। सहस्रशीर्षोऽसि सहस्रदृगसि सहस्रपादोऽसि त्वं कमलोऽसि महापुरुषोऽसि सहस्रबाहुरसि सहस्रमूर्तिरसि त्वां देवाः प्राहुः सहस्रवदनं ते नमस्ते। ॐ नमस्ते विश्वदेवेश विश्वभूः विश्वात्मक विश्वरूप विश्वसम्भव त्वत्तो विश्वमिदमभवद् ब्राह्मणास्त्वन्मुखेभ्योऽभवन् क्षत्रिया दोःसम्भूताः ऊरुयुग्माद् विशोऽभवन् शूद्राश्चरणकमलेभ्यः। नाभ्या भवतोऽन्तरिक्षमजायत इन्द्राग्नी वक्त्रतो नेत्राद् भानुरभून्मनसः शशाङ्कः अहं प्रसादजस्तव क्रोधात् त्र्यम्बकः प्राणाज्जातो भवतो मातरिश्वा शिरसो द्यौरजायत श्रोत्राद् दिशो भूरियं चरणादभूत् श्रोत्रोद्भवा दिशो भवतः स्वयंभो नक्षत्रास्तेजोद्भवाः। मूर्त्तयश्चामूर्त्तयश्च सर्वे त्वत्तः समुद्भूताः। अतो विश्वात्मकोऽसि ॐ नमस्ते पुष्पहासोऽसि महाहासोऽसि परमोऽसि ॐकारोऽसि वषट्कारोऽसि स्वाहाकारोऽसि वौषट्कारोऽसि स्वधाकारोऽसि वेदमयोऽसि तीर्थमयोऽसि यजमानमयोऽसि। यज्ञमयोऽसि सर्वधाताऽसि यज्ञभोक्ताऽसि शुक्रधाताऽसि भूर्द भुवर्द स्वर्द् स्वर्णद गोद अमृतदोऽसीति। ॐ ब्रह्मादिरसि ब्रह्ममयोऽसि यज्ञोऽसि वेदकामोऽसि वेद्योऽसि यज्ञधारोऽसि महामीनोऽसि महासेनोऽसि महाशिरा असि। नृकेसर्यसि होताऽसि होम्योऽसि हव्योऽसि हूयमानोऽसि हयमेधोऽसि पोताऽसि पावयिताऽसि पूतोऽसिआर्ष्टिषेण ! महासेन ! सेनाध्यक्ष ! पुरुष्टुत ! बहुकल्प ! महाकल्प ! कल्पनामुख ! अनिरुद्ध ! सर्वग ! सर्वात्मन् ! द्वादशात्मक ! सूर्यात्मक ! सोमात्मक ! कालात्मक ! व्योमात्मक ! भूतात्मक ! (आपको नमस्कार है।) रसात्मक ! परमात्मन् ! सनातन ! मुञ्जकेश ! हरिकेश ! गुडाकेश ! केशव ! नील ! सूक्ष्म ! स्थूल ! पीत ! रक्त ! श्वेत ! श्वेताधिवास ! रक्ताम्बरप्रिय ! प्रीतिकर ! प्रीतिवास ! हंस ! नीलवास ! सीरध्वज ! सर्वलोकाधिवास ! कुशेशय ! अधोक्षज ! गोविन्द ! जनार्दन ! मधुसूदन ! वामन ! आपको नमस्कार है। आप सहस्रशीर्ष, सहस्रनेत्र, सहस्रपाद, कमल, महापुरुष, सहस्रबाहु एवं सहस्रमूर्ति हैं। आपको देवगण सहस्रवदन कहते हैं। आपको नमस्कार है। ॐ विश्वदेवेश ! विश्वभू ! विश्वात्मक ! विश्वरूप ! विश्वसम्भव ! आपको नमस्कार है। आपसे यह विश्व उत्पन्न हुआ है। आपके मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, दोनों जाँघोंसे वैश्य एवं चरणकमलोंसे शूद्र उत्पन्न हुए हैं! स्वयम्भो! आपकी नाभिसे अन्तरिक्ष, मुखसे इन्द्र एवं अग्नि, नेत्रसे सूर्य, मनसे चन्द्रमा और आपके प्रसादसे मैं हुआ हूँ, आपके क्रोधसे त्रिनेत्र (शंकरजी), प्राणसे वायु, सिरसे स्वर्गलोक, कर्णसे दिशाएँ, चरणोंसे यह पृथ्वी, कानसे दिशाएँ एवं तेजसे नक्षत्र उत्पन्न हुए हैं। सम्पूर्ण मूर्त और अमूर्त पदार्थ आपसे उत्पन्न हुए हैं, अतः आप विश्वात्मक हैं। ॐ आपको नमस्कार है; आप पुष्पहास, महाहास, परम, ॐकार, वषट्कार, स्वाहाकार, वौषट्कार, स्वधाकार, वेदमय, तीर्थमय, यजमानमय, यज्ञमय, सर्वधाता, यज्ञभोक्ता, शुक्रधाता, भूर्द, भुवर्द, स्वर्द्, स्वर्णद, गोद एवं अमृतद हैं। ॐ आप ब्रह्मादि, ब्रह्ममय, यज्ञ, वेदकाम, वेद्य, यज्ञधार, महामीन, महासेन, महाशिरा, नृकेसरी, होता, होम्य, हव्य, हूयमान, हयमेध, पोता, पावयिता, पूत,