भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 489 में से

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४६२श्रीवामनपुराण[ अध्याय १२

| पूज्योऽसि दाताऽसि हन्यमानोऽसि ह्रियमाणोऽसि हर्त्तासीति। ॐ नीतिरसि नेताऽसि अग्योऽसि विश्वधामाऽसि शुभाण्डोऽसि ध्रुवोऽसि आरण्योऽसि। ध्यानोऽसि ध्येयोऽसि श्रेयोऽसि ज्ञानोऽसि यष्टाऽसि दानोऽसि भूमाऽसि ईक्ष्योऽसि ब्रह्माऽसि होताऽसि उद्गाताऽसि गतिमतां गतिरसि ज्ञानिनां ज्ञानमसि योगिनां योगोऽसि मोक्षगामिनां मोक्षोऽसि श्रीमतां श्रीरसि गृहोऽसि पाताऽसि परमसि। सोमोऽसि सूर्योऽसि दीक्षाऽसि दक्षिणाऽसि नरोऽसि त्रिनयनोऽसि महानयनोऽसि आदित्यप्रभवोऽसि सुरोत्तमोऽसि शुचिरसि शुक्लोऽसि नभोऽसि नभस्योऽसि इषोऽसि ऊर्जोऽसि सहोऽसि सहस्योऽसि तपोऽसि तपस्योऽसि मधुरसि। माधवोऽसि कालोऽसि संक्रमोऽसि विक्रमोऽसि पराक्रमोऽसि अश्वग्रीवोऽसि महामेधोऽसि शङ्करोऽसि हरीश्वरोऽसि शम्भुरसि ब्रह्मोशोऽसि सूर्योऽसि मित्रावरुणोऽसि प्राग्वंशकायोऽसि भूतादिरसि महाभूतोऽसि ऊर्ध्वकर्माऽसि कर्त्ताऽसि। सर्वपापविमोचनोऽसि त्रिविक्रमोऽसि ॐ नमस्ते। | पूज्य, दाता, हन्यमान, ह्रियमाण एवं हर्ता हैं। ॐ आप नीति, नेता, अग्य, विश्वधाम, शुभाण्ड, ध्रुव, आरणेय, ध्यान, ध्येय, ज्ञेय, ज्ञान, यष्टा, दान, भूमा, ईक्ष्य, ब्रह्मा, होता, उद्गाता, गतिमानोंकी गति, ज्ञानियोंके ज्ञान, योगियोंके योग, मोक्षार्थियोंके मोक्ष, श्रीमानोंकी श्री, गृह, पाता एवं परम हैं। आप सोम, सूर्य, दीक्षा, दक्षिणा, नर, त्रिनयन, महानयन, आदित्यप्रभव, सुरोत्तम, शुचि, शुक्र, नभ, नभस्य, इष ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्य, मधु, माधव, काल, संक्रम, विक्रम, पराक्रम, अश्वग्रीव, महामेध, शंकर, हरीश्वर, शम्भु, ब्रह्मोश, सूर्य, मित्रावरुण, प्राग्वंशकाय, भूतादि, महाभूत, ऊर्ध्वकर्मा, कर्त्ता, सर्वपापविमोचन एवं त्रिविक्रम हैं। आपको ॐ नमस्कार है। | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्थं स्तुतः पद्मभवेन विष्णु-<br>स्तपस्विभिश्चाद्भुतकर्मकारी ।<br>प्रोवाच देवं प्रपितामहं तु<br>वरं वृणीष्वामलसत्त्ववृत्ते ॥ १२ | पुलस्त्यजी बोले—ब्रह्मा एवं तपस्वियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर अद्भुत कर्म करनेवाले विष्णुने प्रपितामह देवसे कहा—अमलसत्त्ववृत्ते! (निर्मल सत्स्वरूपवाले) आप वर माँगिये। | | तमब्रवीत् प्रीतियुतः पितामहो<br>वरं ममेहाद्य विभो प्रयच्छ ।<br>रूपेण पुण्‍येन विभो ह्यनेन<br>संस्थीयतां मद्भवने मुरारे ॥ १३ | पितामहने प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा—विभो! मुरारे! 'आप इस पवित्र रूपसे मेरे भवनमें स्थित रहें। मुझे यही वर प्रदान करें। | | इत्थं वृते देववरेण प्रादात्<br>प्रभुस्तथास्त्विति तमव्ययात्मा।<br>तस्थौ हि रूपेण हि वामनेन<br>सम्पूज्यमानः सदने स्वयम्भोः ॥ १४ | इस प्रकार देवश्रेष्ठके वर माँगनेपर अव्ययात्मा प्रभुने उनसे कहा—ऐसा ही होगा। उसके बाद वे स्वयम्भूके भवनमें वामनरूपसे पूजित होते हुए रहने लगे। | | नृत्यन्ति तत्राप्सरसां समूहा<br>गायन्ति गीतानि सुरेन्द्रगायनाः ।<br>विद्याधरास्तूर्यवरांश्च वादयन्<br>स्तुवन्ति देवासुरसिद्धसङ्घाः ॥ १५ | वहाँ अप्सराओंका समूह नृत्य करने लगा, सुरेन्द्रके गायक गान करने लगे, विद्याधर श्रेष्ठ तूर्य बजाने लगे एवं देव, असुर तथा सिद्धोंके समूह स्तुति करने लगे। | | ततः समाराध्य विभुं सुराधिपः<br>पितामहो धौतमलः स शुद्धः ।<br>स्वर्गे विरिञ्चिः सदनात् सुपुष्पा-<br>ण्यानीय पूजां प्रचकार विष्णोः ॥ १६ | विभुकी समाराधनाके पश्चात् देवेश पितामह ब्रह्मा पापरहित एवं शुद्ध हो गये। स्वर्गमें ब्रह्माने घरमेंसे सुन्दर पुष्पोंको लाकर उनसे विष्णुका पूजन किया। |

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