वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| अध्याय ९१ ] | वामनकी बलिके यज्ञमें जाकर उससे तीन पग भूमिकी याचना | ४५७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नात्राश्चर्यं यज्जगद् वै समग्रं<br>क्रमत्रयं नैव पूर्णं तवाद्य।<br>क्रमेण त्वं लङ्घयितुं समर्थो<br>लीलामेतां कृतवान् लोकनाथ॥ ४४<br>प्रमाणहीनां स्वयमेव कृत्वा<br>वसुन्धरां माधव पद्मनाभ।<br>विष्णो न बध्नासि बलिं न दूरे<br>प्रभुर्यदेवेच्छति तत्करोति॥ ४५ | आपके तीन पगोंको सारा संसार पूरा नहीं कर सका—इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आप इसको अपने एक पगसे ही लाँघ सकते हैं। लोकनाथ! आपने तो यह लीला ही की है। माधव! पद्मनाभ! विष्णो! पृथ्वीको अपने-आप छोटे पैमानेमें बनाकर बलिको बाँधना उचित नहीं। (ठीक है, आप) प्रभु जो चाहते हैं वही करते हैं॥ ४१—४५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने बाणेन बलिसूनुना।<br>प्रोवाच भगवान् वाक्यमादिकर्ता जनार्दनः॥ ४६ | पुलस्त्यजी बोले— बलिपुत्र बाणके इस प्रकार कहनेपर आदिस्रष्टा भगवान् जनार्दनने यह वचन कहा॥ ४६॥ |
| त्रिविक्रम उवाच<br>यान्युक्तानि वचांसीत्थं त्वया बालेय साम्प्रतम्।<br>तेषां वै हेतुसंयुक्तं शृणु प्रत्युत्तरं मम॥ ४७<br>पूर्वमुक्तस्तव पिता मया राजन् पदत्रयम्।<br>देहि मह्यं प्रमाणेन तदेतत् समनुष्ठितम्॥ ४८<br>किं न वेत्ति प्रमाणं मे बलिस्तव पितासुर।<br>प्रायच्छद् येन निःशङ्कं ममानन्तं क्रमत्रयम्॥ ४९<br>सत्यं क्रमेण चैकेन क्रमेयं भूर्भुवादिकम्।<br>बलेरपि हितार्थाय कृतमेतत् क्रमत्रयम्॥ ५०<br>तस्माद् यन्मम बालेय त्वत्पित्राम्बु करे महत्।<br>दत्तं तेनायुरेतस्य कल्पं यावद् भविष्यति॥ ५१<br>गते मन्वन्तरे बाण श्राद्धदेवस्य साम्प्रतम्।<br>सावर्णिके च सम्प्राप्ते बलिरिन्द्रो भविष्यति॥ ५२<br>इत्थं प्रोक्त्वा बलिसुतं बाणं देवस्त्रिविक्रमः।<br>प्रोवाच बलिमभ्येत्य वचनं मधुराक्षरम्॥ ५३ | त्रिविक्रमने कहा— बलिनन्दन! तुमने इस समय इस प्रकार जिन वचनोंको कहा है उनका कारण-सहित प्रत्युत्तर मुझसे सुनो। मैंने पहले ही तुम्हारे पितासे यह कहा था कि ‘राजन्! मेरे प्रमाणके अनुसार मुझे तीन पग भूमि दो।' उन्होंने भलीभाँति उसका सम्मान किया। असुर! क्या तुम्हारे पिता बलि मेरा प्रमाण नहीं जानते थे, जो उन्होंने निःशङ्क होकर मेरे अनन्त तीन पगोंका दान किया। सचमुच ही मैं अपने एक पैरसे समस्त भूः, भुवः आदि जगत्को नाप सकता हूँ। बलिके कल्याणके लिये ही मैंने ये तीन पग किये हैं। अतः बलिपुत्र! तुम्हारे पिताने मेरे हाथमें शुद्ध जल दिया है, इससे उनकी आयु एक कल्पकी होगी। बाण! श्राद्धदेवका वर्तमान मन्वन्तर बीत जानेके बाद सावर्णिक मन्वन्तरके आनेपर बलि इन्द्र बनेंगे। बलिके पुत्र बाणसे इस प्रकार कहनेके बाद त्रिविक्रम देव बलिके निकट गये और उससे मधुर वचन कहे—॥ ४७—५३॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>आपूरणाद् दक्षिणाया गच्छ राजन् महाफलम्।<br>सुतलं नाम पातालं वस तत्र निरामयः॥ ५४ | श्रीभगवान्ने कहा— राजन्! दक्षिणाकी सम्पन्नता होनेतक तुम्हें यह महान् फल प्राप्त करना होगा। तुम सुतल नामक पातालमें नीरोग—स्वस्थ होकर निवास करो॥ ५४॥ |
| बलिरुवाच<br>सुतले वसतो नाथ मम भोगाः कुतोऽव्ययाः।<br>भविष्यन्ति तु येनाहं निवत्स्यामि निरामयः॥ ५५ | बलिने कहा— नाथ! सुतलमें निवास करते समय नीरोग—स्वस्थरूपसे रहनेके लिये अक्षय अविनाशी-स्वास्थ्यप्रद भोग कहाँसे प्राप्त होंगे?॥ ५५॥ |
| ४५८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ११ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| त्रिविक्रम उवाच<br>सुतलस्थस्य दैत्येन्द्र यानि भोगानि तेऽधुना।<br>भविष्यन्ति महार्हाणि तानि वक्ष्यामि सर्वशः॥ ५६<br>दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च।<br>तथाधीतान्यव्रतिभिर्दास्यन्ति भवतः फलम्॥ ५७<br>तथान्यमुत्सवं पुण्यं वृत्ते शक्रमहोत्सवे।<br>द्वारप्रतिपदा नाम तव भावी महोत्सवः॥ ५८<br>तत्र त्वां नरशार्दूला हृष्टाः पुष्टाः स्वलंकृताः।<br>पुष्पदीपप्रदानेन अर्चयिष्यन्ति यत्नतः॥ ५९<br>तत्रोत्सवो मुख्यतमो भविष्यति<br>दिवानिशं हृष्टजनाभिरामम्।<br>यथैव राज्ये भवतस्तु साम्प्रतं<br>तथैव सा भाव्यथ कौमुदी च॥ ६० | त्रिविक्रमने कहा— दैत्येन्द्र! मैं इस समय तुम्हारे सामने उन सम्पूर्ण बहुमूल्य भोगोंका वर्णन करता हूँ जो पृथ्वीके तलमें निवास करते समय तुम्हें प्राप्त होंगे। अविधिपूर्वक किये गये दान, अश्रोत्रियद्वारा किये गये श्राद्ध एवं ब्रह्मचर्यव्रतरहित अध्ययन आपको फल प्रदान करेंगे। इन्द्र-पूजनके बाद आनेवाली प्रतिपदाको तुम्हारे पूजनके निमित्त दूसरा उत्सव मनाया जायगा, जिसका नाम होगा—'द्वारप्रतिपदा'। उस उत्सवके समय हृष्ट-पुष्ट, नरश्रेष्ठ लोग सुन्दर रूपसे सज-धजकर पुष्प और दीप देकर प्रयत्नपूर्वक आपकी अर्चना करेंगे। आपके राज्यमें इस समय जिस प्रकार दिन-रात जनसमुदायके प्रसन्न रहनेके कारण सुन्दर महोत्सव बना रहता है, उसी प्रकार उत्सवोंमें श्रेष्ठ वह 'कौमुदी' नामका उत्सव होगा॥ ५६—६०॥ |
| इत्येवमुक्त्वा मधुहा दितीश्वरं<br>विसर्जयित्वा सुतलं सभार्यम्।<br>यज्ञं समादाय जगाम तूर्णं<br>स शक्रसद्मामरसङ्घजुष्टम्॥ ६१<br>दत्त्वा मघोने च विभुस्त्रिविष्टपं<br>कृत्वा च देवान् मखभागभोक्तॄन्।<br>अन्तर्दधे विश्वपतिर्महर्षे<br>सम्पश्यतामेव सुराधिपानाम्॥ ६२<br>स्वर्गं गते धातरि वासुदेवे<br>शाल्वोऽसुराणां महता बलेन।<br>कृत्वा पुरं सौभमिति प्रसिद्धं<br>तदान्तरिक्षे विचचार कामात्॥ ६३<br>मयस्तु कृत्वा त्रिपुरं महात्मा<br>सुवर्णताम्रायससमग्रसौख्यम् ।<br>स तारकाक्षः सह वैद्युतेन<br>संतिष्ठते भृत्यकलत्रवान् सः॥ ६४ | मधुसूदनने दानवेश्वर बलिसे इस प्रकार कहकर उसे पत्नीके साथ सुतल लोकमें भेज दिया। इसके बाद वे शीघ्र यज्ञको—अग्निदेवको साथ ले देव-समूहसे सेवित इन्द्रभवन चले गये। महर्षे! उसके बाद सबका पालन-पोषण करनेवाले व्यापक भगवान् विष्णु, इन्द्रको स्वर्ग देकर और देवताओंको यज्ञ-भागका अधिकारी बनाकर देवताओंके देखते-ही-देखते अन्तर्धान हो गये। ब्रह्मा, वासुदेवके स्वर्ग चले जानेपर दानव शाल्व दैत्यकी बड़ी सेना लेकर सौभ नामका प्रसिद्ध नगर बनाकर इच्छानुसार आकाशमें घूमने लगा। नौकरों और अपनी पत्नीके साथ महात्मा मय सोने, ताँबे एवं लोहेके तीन नगरोंका निर्माण करके तारकाक्ष तथा वैद्युतके साथ अत्यन्त सुखपूर्वक उनमें रहने लगा॥ ६१—६४॥ |
| बाणोऽपि देवेन हृते त्रिविष्टपे<br>बद्धे बलौ चापि रसातलस्थे।<br>कृत्वा सुगुप्तं भुवि शोणिताख्यं<br>पुरं स चास्ते सह दानवेन्द्रैः॥ ६५ | बाणासुर भी विष्णुके द्वारा स्वर्ग छीन लिये जानेपर और बलिके बँधने तथा रसातलमें रहनेपर अत्यन्त सुरक्षित शोणित नामके पुरका निर्माण कर दानवेन्द्रोंके |
अध्याय ९२ ] ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति ४५९
| एवं पुरा चक्रधरेण विष्णुना<br>बद्धो बलिर्वामनरूपधारिणा।<br>शक्रप्रियार्थं सुरकार्यसिद्धये<br>हिताय विप्रर्षभगोद्विजानाम्॥ ६६<br><br>प्रादुर्भावस्ते कथितो महर्षे<br>पुण्यः शुचिर्वामनस्याघहारी।<br>श्रुते यस्मिन् संस्मृते कीर्तिते च<br>पापं याति प्रक्षयं पुण्यमेति॥ ६७<br><br>एतत् प्रोक्तं भवतः पुण्यकीर्तेः<br>प्रादुर्भावो बलिबन्धोऽव्ययस्य।<br>यच्चाप्यन्यच्छ्रोतुकामोऽसि विप्र<br>तत्प्रोच्यतां कथयिष्याम्यशेषम्॥ ६८ | साथ रहने लगा। इस प्रकार प्राचीन कालमें चक्र धारण करनेवाले विष्णुने वामनरूप धारण कर इन्द्रकी भलाई, देवताओंकी कार्यसिद्धि तथा ब्राह्मणों, ऋषियों (गायोंके समूह) और द्विजोंके हितके लिये बलिको बाँधा था। महर्षे! मैंने आपसे वामनके पापहारी, पुण्ययुक्त एवं पवित्र प्रादुर्भावका वर्णन किया। इसके सुनने और कीर्तनसे पापका नाश एवं पुण्यकी प्राप्ति होती है। विप्र! मैंने अक्षय पुण्यकीर्तिवाले वामनदेवके आविर्भाव तथा बलिको बाँधनेकी कथाका आपसे वर्णन किया। अब आप अन्य जो कुछ सुनना चाहते हों, उसे कहिये। मैं पूर्णतया उसका वर्णन करूँगा॥ ६५–६८॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९१ ॥
बानबेवाँ अध्याय
ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति और वामनरूपमें विष्णुका स्वर्गमें निवास
| नारद उवाच<br><br>श्रुतं यथा भगवता बलिर्बद्धो महात्मना।<br>किंत्वस्त्यन्यत्तु प्रष्टव्यं तच्छ्रुत्वा कथयाद्य मे॥ १<br><br>भगवान् देवराजाय दत्त्वा विष्णुस्त्रिविष्टपम्।<br>अन्तर्धानं गतः क्वासौ सर्वात्मा तात कथ्यताम्॥ २<br><br>सुतलस्थश्च दैत्येन्द्रः किमकार्षीत् तथा वद।<br>का चेष्टा तस्य विप्रर्षे तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ३ | नारदजीने कहा—महात्मा भगवान्ने जिस प्रकार बलिको बाँधा था उसे मैंने सुना। परंतु प्रभो! आपसे और अन्य विषय भी मुझे पूछना है। उसे सुनकर आप मुझे उसके सम्बन्धमें बतलाइये। तात! आप यह बतलाइये कि देवराज इन्द्रको स्वर्ग देनेके बाद वे सर्वात्मस्वरूप भगवान् विष्णु अन्तर्हित होकर कहाँ चले गये। इसके सिवाय यह भी बतलाइये कि सुतलमें रहनेवाले दैत्यश्रेष्ठने क्या किया और विप्रवर! आप मुझे विशेषरूपसे यह बतायें कि उसके बाद उसकी कौन-सी चेष्टा रही?॥ १–३॥ |
| ४६० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १२ |
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| पुलस्त्य उवाच<br>अन्तर्धाय सुरावासं वामनोऽभूदवामनः।<br>जगाम ब्रह्मसदनमधिरुह्योरगाशनम्॥ ४<br>वासुदेवं समायान्तं ज्ञात्वा ब्रह्माऽव्ययात्मकः।<br>समुत्थायाथ सौहार्दात् सस्वजे कमलासनः॥ ५<br>परिष्वज्यार्च्य विधिना वेधाः पूजादिना हरिम्।<br>पप्रच्छ किं चिरेणेह भवतागमनं कृतम्॥ ६<br>अथोवाच जगत्स्वामी मया कार्यं महत्कृतम्।<br>सुराणां क्रतुभागार्थं स्वयंभो बलिबन्धनम्॥ ७<br>पितामहस्तद् वचनं श्रुत्वा मुदितमानसः।<br>कथं कथमिति प्राह त्वं मां दर्शितुमर्हसि॥ ८<br>इत्येवमुक्ते वचने भगवान् गरुडध्वजः।<br>दर्शयामास तद्रूपं सर्वदेवमयं लघु॥ ९<br>तं दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्षं योजनायुतविस्तृतम्।<br>तावानेवोर्ध्वमानेन ततोऽजः प्रणतोऽभवत्॥ १०<br>ततः प्रणम्य सुचिरं साधु साध्वित्युदीर्य च।<br>भक्तिनम्रो महादेवं पद्मजः स्तोत्रमीरयत्॥ ११ | पुलस्त्यजी बोले— वामनदेवने अन्तर्धान होनेके बाद अपना वामनस्वरूप छोड़ दिया एवं गरुडपर चढ़कर वे देवोंके स्थान ब्रह्मलोकको चले गये। वासुदेवको आया हुआ जानकर कमलके आसनपर बैठे हुए नित्य-स्वरूपवाले ब्रह्मा (अपने आसनसे) उठे और सौहार्द्रभावसे विष्णुको गले लगा लिये। आलिङ्गनके बाद विधिपूर्वक अर्चा आदिद्वारा हरिकी पूजा कर ब्रह्माने पूछा—(भगवन्) 'बहुत समयके बाद आपके यहाँ आनेका क्या कारण है?' उसके बाद जगत्पतिने कहा—ब्रह्मन्! 'मैंने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। एक—देवोंके यज्ञभागके लिये मैंने बलिको बाँधा है।' यह वचन सुनकर ब्रह्माने प्रसन्न होकर कहा—यह कैसे! यह कैसे! आप उस (बाँधनेके लिये धृत) रूपको मुझे दिखलाइये। ऐसा वचन कहे जानेपर भगवान् गरुडध्वज (विष्णु)-ने शीघ्रतासे वह सर्वदेव-स्वरूप अपना रूप दिखला दिया। कमलनयन भगवान्के दस हजार योजन विस्तृत तथा उतने ही ऊँचे उस रूपको देखकर पितामहने प्रणाम किया। उसके बाद देरतक प्रणाम कर ब्रह्माने साधु, साधु कहा और श्रद्धापूर्वक नम्रतासे (उन) महादेवकी स्तुति करने लगे—॥ ४–११॥ | | ॐ नमस्ते देवाधिदेव वासुदेव एकशृङ्ग बहुरूप<br>वृषाकपे भूतभावन सुरासुरवृष सुरासुरमथन पीतवासः<br>श्रीनिवास असुरनिर्मितान्त अमितनिर्मित कपिल<br>महाकपिल विष्वक्सेन नारायण। ध्रुवध्वज सत्यध्वज<br>खड्गध्वज तालध्वज वैकुण्ठ पुरुषोत्तम वरेण्य विष्णो<br>अपराजित जय जयन्त विजय कृतावर्त महादेव<br>अनादे अनन्त आद्यन्तमध्यनिधन पुरञ्जय धनञ्जय<br>शुचिश्रव पृश्निगर्भ। कमलगर्भ कमलायताक्ष श्रीपते<br>विष्णुमूल मूलाधिवास धर्माधिवास धर्मवास<br>धर्माध्यक्ष प्रजाध्यक्ष गदाधर श्रीधर श्रुतिधर<br>वनमालाधर लक्ष्मीधर धरणीधर पद्मनाभ। विरिञ्चे | हे देवोंके देव! वासुदेव! एकशृङ्ग! बहुरूप!<br>वृषाकपे! भूतभावन! सुरों और असुरोंमें श्रेष्ठ! देवताओं<br>और असुरोंका मथन करनेवाले पीतवस्त्रधारी! श्रीनिवास!<br>असुरनिर्मितान्त! अमितनिर्मित! कपिल! महाकपिल!<br>विष्वक्सेन! नारायण! आपको नमस्कार है। ध्रुवध्वज!<br>सत्यध्वज! खड्गध्वज! तालध्वज! वैकुण्ठ! पुरुषोत्तम!<br>वरेण्य! विष्णो! अपराजित! जय! जयन्त! विजय!<br>कृतावर्त! महादेव! अनादे! अनन्त! आद्यन्त! मध्यनिधन!<br>पुरञ्जय! धनञ्जय! शुचिश्रव! पृश्निगर्भ! (आपको नमस्कार<br>है।) कमलगर्भ! कमलायताक्ष! श्रीपते! विष्णुमूल!<br>मूलाधिवास! धर्माधिवास! धर्मवास! धर्माध्यक्ष! प्रजाध्यक्ष!<br>गदाधर! श्रीधर! श्रुतिधर! वनमालाधर! लक्ष्मीधर!<br>धरणीधर! पद्मनाभ! (आपको नमस्कार है।) विरिञ्चे! |
| अध्याय ९२ ] | ब्रह्मलोकमें वामनभगवान्की पूजा, ब्रह्मकृत वामनकी स्तुति | ४६१ |
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| संस्कृत | हिन्दी अर्थ |
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| आर्ष्टिषेण महासेन सेनाध्यक्ष पुरुष्टुत बहुकल्प महाकल्प कल्पनामुख अनिरुद्ध सर्वग सर्वात्मन् द्वादशात्मक सूर्यात्मक सोमात्मक कालात्मक व्योमात्मक भूतात्मक। रसात्मक परमात्मन् सनातन मुञ्जकेश हरिकेश गुडाकेश केशव नील सूक्ष्म स्थूल पीत रक्त श्वेत श्वेताधिवास रक्ताम्बरप्रिय प्रीतिकर प्रीतिवास हंस नीलवास सीरध्वज सर्वलोकाधिवास। कुशेशय अधोक्षज गोविन्द जनार्दन मधुसूदन वामन नमस्ते। सहस्रशीर्षोऽसि सहस्रदृगसि सहस्रपादोऽसि त्वं कमलोऽसि महापुरुषोऽसि सहस्रबाहुरसि सहस्रमूर्तिरसि त्वां देवाः प्राहुः सहस्रवदनं ते नमस्ते। ॐ नमस्ते विश्वदेवेश विश्वभूः विश्वात्मक विश्वरूप विश्वसम्भव त्वत्तो विश्वमिदमभवद् ब्राह्मणास्त्वन्मुखेभ्योऽभवन् क्षत्रिया दोःसम्भूताः ऊरुयुग्माद् विशोऽभवन् शूद्राश्चरणकमलेभ्यः। नाभ्या भवतोऽन्तरिक्षमजायत इन्द्राग्नी वक्त्रतो नेत्राद् भानुरभून्मनसः शशाङ्कः अहं प्रसादजस्तव क्रोधात् त्र्यम्बकः प्राणाज्जातो भवतो मातरिश्वा शिरसो द्यौरजायत श्रोत्राद् दिशो भूरियं चरणादभूत् श्रोत्रोद्भवा दिशो भवतः स्वयंभो नक्षत्रास्तेजोद्भवाः। मूर्त्तयश्चामूर्त्तयश्च सर्वे त्वत्तः समुद्भूताः। अतो विश्वात्मकोऽसि ॐ नमस्ते पुष्पहासोऽसि महाहासोऽसि परमोऽसि ॐकारोऽसि वषट्कारोऽसि स्वाहाकारोऽसि वौषट्कारोऽसि स्वधाकारोऽसि वेदमयोऽसि तीर्थमयोऽसि यजमानमयोऽसि। यज्ञमयोऽसि सर्वधाताऽसि यज्ञभोक्ताऽसि शुक्रधाताऽसि भूर्द भुवर्द स्वर्द् स्वर्णद गोद अमृतदोऽसीति। ॐ ब्रह्मादिरसि ब्रह्ममयोऽसि यज्ञोऽसि वेदकामोऽसि वेद्योऽसि यज्ञधारोऽसि महामीनोऽसि महासेनोऽसि महाशिरा असि। नृकेसर्यसि होताऽसि होम्योऽसि हव्योऽसि हूयमानोऽसि हयमेधोऽसि पोताऽसि पावयिताऽसि पूतोऽसि | आर्ष्टिषेण ! महासेन ! सेनाध्यक्ष ! पुरुष्टुत ! बहुकल्प ! महाकल्प ! कल्पनामुख ! अनिरुद्ध ! सर्वग ! सर्वात्मन् ! द्वादशात्मक ! सूर्यात्मक ! सोमात्मक ! कालात्मक ! व्योमात्मक ! भूतात्मक ! (आपको नमस्कार है।) रसात्मक ! परमात्मन् ! सनातन ! मुञ्जकेश ! हरिकेश ! गुडाकेश ! केशव ! नील ! सूक्ष्म ! स्थूल ! पीत ! रक्त ! श्वेत ! श्वेताधिवास ! रक्ताम्बरप्रिय ! प्रीतिकर ! प्रीतिवास ! हंस ! नीलवास ! सीरध्वज ! सर्वलोकाधिवास ! कुशेशय ! अधोक्षज ! गोविन्द ! जनार्दन ! मधुसूदन ! वामन ! आपको नमस्कार है। आप सहस्रशीर्ष, सहस्रनेत्र, सहस्रपाद, कमल, महापुरुष, सहस्रबाहु एवं सहस्रमूर्ति हैं। आपको देवगण सहस्रवदन कहते हैं। आपको नमस्कार है। ॐ विश्वदेवेश ! विश्वभू ! विश्वात्मक ! विश्वरूप ! विश्वसम्भव ! आपको नमस्कार है। आपसे यह विश्व उत्पन्न हुआ है। आपके मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, दोनों जाँघोंसे वैश्य एवं चरणकमलोंसे शूद्र उत्पन्न हुए हैं! स्वयम्भो! आपकी नाभिसे अन्तरिक्ष, मुखसे इन्द्र एवं अग्नि, नेत्रसे सूर्य, मनसे चन्द्रमा और आपके प्रसादसे मैं हुआ हूँ, आपके क्रोधसे त्रिनेत्र (शंकरजी), प्राणसे वायु, सिरसे स्वर्गलोक, कर्णसे दिशाएँ, चरणोंसे यह पृथ्वी, कानसे दिशाएँ एवं तेजसे नक्षत्र उत्पन्न हुए हैं। सम्पूर्ण मूर्त और अमूर्त पदार्थ आपसे उत्पन्न हुए हैं, अतः आप विश्वात्मक हैं। ॐ आपको नमस्कार है; आप पुष्पहास, महाहास, परम, ॐकार, वषट्कार, स्वाहाकार, वौषट्कार, स्वधाकार, वेदमय, तीर्थमय, यजमानमय, यज्ञमय, सर्वधाता, यज्ञभोक्ता, शुक्रधाता, भूर्द, भुवर्द, स्वर्द्, स्वर्णद, गोद एवं अमृतद हैं। ॐ आप ब्रह्मादि, ब्रह्ममय, यज्ञ, वेदकाम, वेद्य, यज्ञधार, महामीन, महासेन, महाशिरा, नृकेसरी, होता, होम्य, हव्य, हूयमान, हयमेध, पोता, पावयिता, पूत, |
| ४६२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १२ |
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| पूज्योऽसि दाताऽसि हन्यमानोऽसि ह्रियमाणोऽसि हर्त्तासीति। ॐ नीतिरसि नेताऽसि अग्योऽसि विश्वधामाऽसि शुभाण्डोऽसि ध्रुवोऽसि आरण्योऽसि। ध्यानोऽसि ध्येयोऽसि श्रेयोऽसि ज्ञानोऽसि यष्टाऽसि दानोऽसि भूमाऽसि ईक्ष्योऽसि ब्रह्माऽसि होताऽसि उद्गाताऽसि गतिमतां गतिरसि ज्ञानिनां ज्ञानमसि योगिनां योगोऽसि मोक्षगामिनां मोक्षोऽसि श्रीमतां श्रीरसि गृहोऽसि पाताऽसि परमसि। सोमोऽसि सूर्योऽसि दीक्षाऽसि दक्षिणाऽसि नरोऽसि त्रिनयनोऽसि महानयनोऽसि आदित्यप्रभवोऽसि सुरोत्तमोऽसि शुचिरसि शुक्लोऽसि नभोऽसि नभस्योऽसि इषोऽसि ऊर्जोऽसि सहोऽसि सहस्योऽसि तपोऽसि तपस्योऽसि मधुरसि। माधवोऽसि कालोऽसि संक्रमोऽसि विक्रमोऽसि पराक्रमोऽसि अश्वग्रीवोऽसि महामेधोऽसि शङ्करोऽसि हरीश्वरोऽसि शम्भुरसि ब्रह्मोशोऽसि सूर्योऽसि मित्रावरुणोऽसि प्राग्वंशकायोऽसि भूतादिरसि महाभूतोऽसि ऊर्ध्वकर्माऽसि कर्त्ताऽसि। सर्वपापविमोचनोऽसि त्रिविक्रमोऽसि ॐ नमस्ते। | पूज्य, दाता, हन्यमान, ह्रियमाण एवं हर्ता हैं। ॐ आप नीति, नेता, अग्य, विश्वधाम, शुभाण्ड, ध्रुव, आरणेय, ध्यान, ध्येय, ज्ञेय, ज्ञान, यष्टा, दान, भूमा, ईक्ष्य, ब्रह्मा, होता, उद्गाता, गतिमानोंकी गति, ज्ञानियोंके ज्ञान, योगियोंके योग, मोक्षार्थियोंके मोक्ष, श्रीमानोंकी श्री, गृह, पाता एवं परम हैं। आप सोम, सूर्य, दीक्षा, दक्षिणा, नर, त्रिनयन, महानयन, आदित्यप्रभव, सुरोत्तम, शुचि, शुक्र, नभ, नभस्य, इष ऊर्ज, सह, सहस्य, तप, तपस्य, मधु, माधव, काल, संक्रम, विक्रम, पराक्रम, अश्वग्रीव, महामेध, शंकर, हरीश्वर, शम्भु, ब्रह्मोश, सूर्य, मित्रावरुण, प्राग्वंशकाय, भूतादि, महाभूत, ऊर्ध्वकर्मा, कर्त्ता, सर्वपापविमोचन एवं त्रिविक्रम हैं। आपको ॐ नमस्कार है। | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्थं स्तुतः पद्मभवेन विष्णु-<br>स्तपस्विभिश्चाद्भुतकर्मकारी ।<br>प्रोवाच देवं प्रपितामहं तु<br>वरं वृणीष्वामलसत्त्ववृत्ते ॥ १२ | पुलस्त्यजी बोले—ब्रह्मा एवं तपस्वियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर अद्भुत कर्म करनेवाले विष्णुने प्रपितामह देवसे कहा—अमलसत्त्ववृत्ते! (निर्मल सत्स्वरूपवाले) आप वर माँगिये। | | तमब्रवीत् प्रीतियुतः पितामहो<br>वरं ममेहाद्य विभो प्रयच्छ ।<br>रूपेण पुण्येन विभो ह्यनेन<br>संस्थीयतां मद्भवने मुरारे ॥ १३ | पितामहने प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा—विभो! मुरारे! 'आप इस पवित्र रूपसे मेरे भवनमें स्थित रहें। मुझे यही वर प्रदान करें। | | इत्थं वृते देववरेण प्रादात्<br>प्रभुस्तथास्त्विति तमव्ययात्मा।<br>तस्थौ हि रूपेण हि वामनेन<br>सम्पूज्यमानः सदने स्वयम्भोः ॥ १४ | इस प्रकार देवश्रेष्ठके वर माँगनेपर अव्ययात्मा प्रभुने उनसे कहा—ऐसा ही होगा। उसके बाद वे स्वयम्भूके भवनमें वामनरूपसे पूजित होते हुए रहने लगे। | | नृत्यन्ति तत्राप्सरसां समूहा<br>गायन्ति गीतानि सुरेन्द्रगायनाः ।<br>विद्याधरास्तूर्यवरांश्च वादयन्<br>स्तुवन्ति देवासुरसिद्धसङ्घाः ॥ १५ | वहाँ अप्सराओंका समूह नृत्य करने लगा, सुरेन्द्रके गायक गान करने लगे, विद्याधर श्रेष्ठ तूर्य बजाने लगे एवं देव, असुर तथा सिद्धोंके समूह स्तुति करने लगे। | | ततः समाराध्य विभुं सुराधिपः<br>पितामहो धौतमलः स शुद्धः ।<br>स्वर्गे विरिञ्चिः सदनात् सुपुष्पा-<br>ण्यानीय पूजां प्रचकार विष्णोः ॥ १६ | विभुकी समाराधनाके पश्चात् देवेश पितामह ब्रह्मा पापरहित एवं शुद्ध हो गये। स्वर्गमें ब्रह्माने घरमेंसे सुन्दर पुष्पोंको लाकर उनसे विष्णुका पूजन किया। |
| अध्याय ९३ ] | बलिका पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति | ४६३ |
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| स्वर्गे सहस्रं स तु योजनानां<br> विष्णोः प्रमाणेन हि वामनोऽभूत्।<br>तत्रास्य शक्रः प्रचकार पूजां<br> स्वयम्भुवस्तुत्यगुणां महर्षे ॥ १७<br>एतत् तवोक्तं भगवांस्त्रिविक्रम-<br> श्चकार यद् देवहितं महात्मा।<br>रसातलस्थो दितिजश्चकार<br> यत्तच्छृणुष्वाद्य वदामि विप्र ॥ १८ | विष्णु स्वर्गमें वामन-रूपसे (बढ़कर) हजार योजन विस्तृत हो गये। महर्षे! वहाँ इन्द्रने ब्रह्माके समान गुणोंसे युक्त पदार्थोंसे उनकी पूजा की। विप्र! महात्मा भगवान् त्रिविक्रमने बलिको रसातलमें भेजकर देवताओंका जो कल्याण-साधन किया था, वह मैंने आपसे कहा। दैत्यने रसातलमें रहते हुए जो कार्य किया उसका वर्णन मैं अब कर रहा हूँ, उसे सुनिये—॥ १२-१८॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९२ ॥
तिरानबेवाँ अध्याय
बलिका पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति, प्रह्लादद्वारा विष्णुभक्तिकी प्रशंसा
| पुलस्त्य उवाच<br>गत्वा रसातलं दैत्यो महार्हमणिचित्रितम्।<br>शुद्धस्फटिकसोपानं कारयामास वै पुरम् ॥ १<br>तत्र मध्ये सुविस्तीर्णः प्रासादो वज्रवेदिकः।<br>मुक्ताजालान्तरद्वारो निर्मितो विश्वकर्मणा ॥ २<br>तत्रास्ते विविधान् भोगान् भुञ्जन् दिव्यान् स मानुषान्।<br>नाम्ना विन्ध्यावलीत्येवं भार्याऽस्य दयिताऽभवत् ॥ ३<br>युवतीनां सहस्रस्य प्रधाना शीलमण्डिता।<br>तया सह महातेजा रेमे वैरोचनिर्मुने ॥ ४<br>भोगासक्तस्य दैत्यस्य वसतः सुतले तदा।<br>दैत्यतेजोहरः प्राप्तः पाताले वै सुदर्शनः ॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले—(नारदजी!) रसातलमें जाकर दैत्यने बहुमूल्य मणियोंसे चित्रित शुद्ध स्फटिकके सोपानसे विभूषित नगर बनाया। विश्वकर्माने उसके बीचमें अत्यन्त विस्तृत वज्रमय वेदी बनायी तथा मोतीजड़ी खिड़कियोंके मध्य फाटकवाला महल बनाया। बलि भाँति-भाँतिके स्वर्गीय तथा मनुष्योंके योग्य भोगोंका उपभोग करते हुए वहाँ निवास करने लगा। विन्ध्यावली नामकी उसकी प्रिय पत्नी थी। मुने! वह हजारों युवतियोंमें प्रधान तथा एक शीलवती स्त्री थी। महातेजस्वी विरोचन-पुत्र बलि उसके साथ सुख करने लगा। एक दिन भोग भोगनेमें आसक्त दैत्यके सुतल लोकमें रहते समय दैत्योंके तेजका हरण करनेवाला सुदर्शनचक्र पातालमें प्रवेश किया॥ १-५॥ |
| चक्रे प्रविष्टे पातालं दानवानां पुरे महान्।<br>बभौ हलहलाशब्दः क्षुभितार्णवसंनिभः ॥ ६<br>तं च श्रुत्वा महाशब्दं बलिः खड्गं समाददे।<br>आः किमेतदितीत्थं च पप्रच्छासुरपुङ्गवः ॥ ७ | पातालमें सुदर्शनचक्रके प्रवेश करनेपर दानवोंके पुरमें क्षुब्ध हुए सागरके समान महान् हलहला शब्द उत्पन्न हुआ। उस महान् शब्दको सुनकर असुरश्रेष्ठ बलिने हाथमें एक तलवार ले ली और इस प्रकार पूछा—'अरे! यह क्या है'? |
| ४६४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १३ ] |
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| ततो विन्ध्यावली प्राह सान्त्वयन्ती निजं पतिम्।<br>कोशे खड्गं समावेश्य धर्मपत्नी शुचिव्रता॥ ८<br>एतद् भगवतश्चक्रं दैत्यचक्रक्षयंकरम्।<br>सम्पूजनीयं दैत्येन्द्र वामनस्य महात्मनः।<br>इत्येवमुक्त्वा चार्वङ्गी सार्घपात्रा विनिर्ययौ॥ ९<br>अथाभ्यागात् सहस्रारं विष्णोश्चक्रं सुदर्शनम्।<br>ततोऽसुरपतिः प्रह्रः कृताञ्जलिपुटो मुने।<br>सम्पूज्य विधिवच्चक्रमिदं स्तोत्रमुदीरयत्॥ १०<br><br>बलिरुवाच<br><br>नमस्यामि हरेश्चक्रं दैत्यचक्रविदारणम्।<br>सहस्रांशुं सहस्राभं सहस्रारं सुनिर्मलम्॥ ११<br>नमस्यामि हरेश्चक्रं यस्य नाभ्यां पितामहः।<br>तुण्डे त्रिशूलधृक् शर्व आरामूले महाद्रयः॥ १२<br>आरेषु संस्थिता देवाः सेन्द्राः सार्काः सपावकाः।<br>जवे यस्य स्थितो वायुरापोऽग्निः पृथिवी नभः॥ १३<br>आरप्रान्तेषु जीमूताः सौदामिन्यृक्षतारकाः।<br>बाह्यतो मुनयो यस्य बालखिल्यादयस्तथा॥ १४<br>तमायुधवरं वन्दे वासुदेवस्य भक्तितः।<br>यन्मे पापं शरीरोत्थं वाग्जं मानसमेव च॥ १५<br>तन्मे दहस्व दीप्तांशो विष्णोश्चक्र सुदर्शन।<br>यन्मे कुलोद्भवं पापं पैतृकं मातृकं तथा॥ १६<br>तन्मे हरस्व तरसा नमस्ते अच्युतायुध।<br>आधयो मम नश्यन्तु व्याधयो यान्तु संक्षयम्॥<br>त्वन्नामकीर्तनाच्चक्र दुरितं यातु संक्षयम्॥ १७<br>इत्येवमुक्त्वा मतिमान् समभ्यर्च्यथ भक्तितः।<br>संस्मरन् पुण्डरीकाक्षं सर्वपापप्रणाशनम्॥ १८<br>पूजितं बलिना चक्रं कृत्वा निस्तेजसोऽसुरान्।<br>निष्क्रमाथ पातालाद् विषुवे दक्षिणे मुने॥ १९<br>सुदर्शने निर्गते तु बलिर्विक्लवतां गतः।<br>परमामापदं प्राप्य सस्मार स्वपितामहम्॥ २० | उसके बाद पवित्रताका व्रत करनेवाली धर्मपत्नी विन्ध्यावलीने अपने पतिको सान्त्वना देकर तथा तलवारको म्यानमें रखवाकर यह कहा—ऐश्वर्य आदि छः विभूतियोंवाले महान् आत्मा वामनका दैत्यसमूहका संहार करनेवाला यह आराधनीय चक्र है। इस प्रकार कहकर वह सुन्दरी अर्घ्यपात्रके साथ बाहर गयी। उसी समय विष्णुका हजारों अरोंवाला सुदर्शनचक्र आ पहुँचा। मुने! असुरपतिने विनयपूर्वक हाथ जोड़कर विधिवत् चक्रका पूजन किया तथा यह स्तुति की॥ ६—१०॥<br><br>बलिने स्तुति की—दैत्य-समूहका संहार करनेवाले, अनन्त किरणोंसे युक्त हजारों प्रकारकी आभावाले, हजारों अरोंसे युक्त विष्णुके निर्मल सुदर्शनचक्रको मैं नमस्कार करता हूँ। विष्णुके उस चक्रको मैं नमस्कार करता हूँ, जिसकी नाभिमें पितामह, चोटीपर त्रिशूल धारण करनेवाले महादेव, अरोंके मूलमें महान् पर्वत, अरोंमें इन्द्र, सूर्य, अग्नि आदि देवता, वेगमें वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी और आकाश, अरोंके किनारोंमें मेघ, विद्युत्, नक्षत्र एवं ताराओंके समूह तथा बाह्यभागमें बालखिल्य आदि मुनि स्थित हैं। मैं श्रद्धापूर्वक वासुदेवके उस श्रेष्ठ आयुधको नमस्कार करता हूँ। विष्णुके प्रदीप्त किरणवाले सुदर्शनचक्र! मेरे शारीरिक, वाचिक एवं मानसिक पापोंका आप विनाश करें। अच्युतायुध! मेरे कुलमें हुए पैतृक एवं मातृक पापोंका शीघ्रतापूर्वक आप हरण करें। आपको नमस्कार है। मेरी सारी आधि-व्याधियोंका नाश हो जाय। चक्र! आपके नामका कीर्तन करनेसे पापोंका नाश हो जाय। इस प्रकार बुद्धिमान् (बलि)-ने श्रद्धापूर्वक चक्रकी पूजा की तथा समस्त पापोंका विनाश करनेवाले पुण्डरीकाक्ष भगवान्का स्मरण किया॥ ११—१८॥<br><br>मुने! बलिसे अर्चित हुआ चक्र असुरोंको तेजरहित करके पातालसे निकला और दक्षिण दिशाकी ओर चला गया। सुदर्शनके निकल जानेपर बलि अत्यन्त बेचैन हो गया। घोर संकट आनेपर उसने अपने पितामहको याद किया। |
| अध्याय ९३ ] | बलिका पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति | ४६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स चापि संस्मृतः प्राप्तः सुतलं दानवेश्वरः।<br>दृष्ट्वा तस्थौ महातेजाः सार्घपात्रो बलिस्तदा॥ २१<br>तमर्च्य विधिना ब्रह्मन् पितुः पितरमीश्वरम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ २२<br>संस्मृतोऽसि मया तात सुविषण्णेन चेतसा।<br>तन्मे हितं च पथ्यं च श्रेयोऽद्यं वद तात मे॥ २३<br>किं कार्यं तात संसारे वसता पुरुषेण हि।<br>कृतेन येन वै नास्य बन्धः समुपजायते॥ २४<br>संसारार्णवमग्नानां नराणामल्पचेतसाम्।<br>तरणे यो भवेत् पोतस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ २५ | स्मरण करते ही दैत्येश्वर (प्रह्लाद) सुतलमें आ गये। (उन्हें) देखते ही महातेजस्वी बलि तुरंत हाथमें अर्घ्य लिये उठ खड़ा हुआ। ब्रह्मन्! अपने समर्थ पितामहकी विधिपूर्वक पूजा करनेके बाद बलिने हाथ जोड़कर यह वचन कहा—तात! अत्यन्त शोकमग्न-चित्तसे मैंने आपका स्मरण किया है। अतः तात! मुझे हितकर, पथ्य एवं कल्याणकारी उत्तम उपदेश दें। तात! मनुष्योंको संसारमें रहते हुए क्या करना चाहिये, जिसके करनेसे उसे बन्धन न हो। संसार-समुद्रमें निमग्न हुए अल्पमति मनुष्योंको तरनेके लिये पोतस्वरूप क्या है, आप मुझसे इसे बतावें॥ १९—२५॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>एतद्वचनमाकर्ण्य तत्पौत्राद् दानवेश्वरः।<br>विचिन्त्य प्राह वचनं संसारे यद्धितं परम्॥ २६ | **पुलस्त्यजी बोले—**अपने उस पौत्रके वचनको सुननेके बाद दानवेश्वर (प्रह्लाद)-ने विचारकर संसारमें कल्याणकर श्रेष्ठ वचन कहा—॥ २६॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>साधु दानवशार्दूल यत्ते जाता मतिस्त्वियम्।<br>प्रवक्ष्यामि हितं तेऽद्य तथाऽन्येषां हितं बले॥ २७<br>भवजलधिगतानां द्वन्द्ववाताहतानां<br>सुतदुहितृकलत्रत्राणभारार्दितानाम् ।<br>विषमविषयतोये मज्जतामप्लवानां<br>भवति शरणमेको विष्णुपोतो नराणाम्॥ २८<br>ये संश्रिता हरिमनन्तमनादिमध्यं<br>नारायणं सुरगुरुं शुभदं वरेण्यम्।<br>शुद्धं खगेन्द्रगमनं कमलालयेशं<br>ते धर्मराजकरणं न विशन्ति धीराः॥ २९<br>स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं<br>वदति यमः किल तस्य कर्णमूले।<br>परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्<br>प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम्॥ ३० | **प्रह्लादने कहा—**दानवश्रेष्ठ! तुम धन्य हो, जो तुम्हें ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई। बले! अब मैं तुम्हारे और दूसरोंके लिये कल्याणकारी वचन कहता हूँ। संसाररूपी अगाध समुद्रमें डूबे हुए, द्वन्द्वरूपी वायुसे आहत, पुत्र, कन्या, पत्नी आदिकी रक्षाके भारसे दुःखी, नौकाके बिना भयंकर विषयरूपी जलमें डूबते हुए मनुष्योंके लिये विष्णुरूप नौका ही एकमात्र सहारा होता है। आदि, मध्य और अन्तसे रहित कल्याणप्रद, वरणीय, गरुड़वाहन, लक्ष्मीकान्त, पवित्र, देवगुरु, नारायण हरिका आश्रय ग्रहण करनेवाले धैर्यशाली मनुष्य यमराजके शासनमें नहीं पड़ते। यमराज हाथमें पाश लिये खड़े अपने दूतको देखकर उसके कानमें कहते हैं कि मधुसूदनकी शरणमें गये हुए मनुष्योंको छोड़ देना; क्योंकि मैं अन्य मनुष्योंका ही शासक हूँ, वैष्णवोंका नहीं॥ २७—३०॥ |
| तथाऽन्यदुक्तं नरसत्तमेन<br>इक्ष्वाकुणा भक्तियुतेन नूनम्।<br>ये विष्णुभक्ताः पुरुषाः पृथिव्यां<br>यमस्य ते निर्विषया भवन्ति॥ ३१ | इसके सिवा श्रद्धायुक्त नरश्रेष्ठ इक्ष्वाकुने कहा था कि मृत्युलोकमें विष्णुभक्त व्यक्ति यमके शासन-विषयसे बाहर हैं। |
| ४६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पितम्।<br>तावेव केवलं श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ ॥ ३२<br><br>नूनं न तौ करौ प्रोक्तौ वृक्षशाखाग्रपल्लवौ।<br>न यौ पूजयितुं शक्तौ हरिपादाम्बुजद्वयम् ॥ ३३<br><br>नूनं तत्कण्ठशालूकमथवा प्रतिजिह्विका।<br>रोगो वाऽन्यो न सा जिह्वा या न वक्ति हरेर्गुणान् ॥ ३४<br><br>शोचनीयः स बन्धूनां जीवन्नपि मृतो नरः।<br>यः पादपङ्कजं विष्णोर्न पूजयति भक्तितः ॥ ३५<br><br>ये नरा वासुदेवस्य सततं पूजने रताः।<br>मृता अपि न शोच्यास्ते सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ३६<br><br>शारीरं मानसं वाग्जं मूर्तामूर्तं चराचरम्।<br>दृश्यं स्पृश्यमदृश्यं च तत्सर्वं केशवात्मकम् ॥ ३७ | वही जिह्वा है जो हरिका गुणगान करती है, वही चित्त है जो उनमें लीन है, वे ही हाथ प्रशंसाके योग्य हैं जो उनकी अर्चना करते हैं। जो हाथ श्रीहरिके दोनों चरण-कमलोंकी अर्चना नहीं करते, वे हाथ नहीं हैं, अपितु वृक्षकी शाखामें लगे हुए आगेके पल्लव हैं। जो जिह्वा हरिके गुणोंका वर्णन नहीं करती, वह जिह्वा नहीं, अपितु कण्ठशालूक—जिह्वासे युक्त मेढकका कण्ठ (केवल दिखावेके लिये लगी हुई निकम्मी जीभ) अथवा अन्य कोई रोग है। श्रद्धापूर्वक विष्णुके चरण-कमलका अर्चन न करनेवाला मनुष्य जीता हुआ ही मरे हुएके समान है और बन्धुजनोंके लिये शोचनीय है। मैं यह सत्य कहता हूँ कि वासुदेवके पूजनमें सर्वदा रत रहनेवाले मनुष्य मरनेपर भी शोचनीय नहीं होते। समस्त शारीरिक, मानसिक, वाचिक, मूर्त, अमूर्त, जङ्गम, स्थावर, दृश्य, स्पृश्य एवं अदृश्य समस्त पदार्थ विष्णु-स्वरूप हैं॥ ३१—३७॥ |
| येनार्चितो हि भगवान् चतुर्धा वै त्रिविक्रमः।<br>तेनार्चिता न संदेहो लोकाः सामरदानवाः ॥ ३८<br><br>यथा रत्नानि जलधेरसंख्येयानि पुत्रक।<br>तथा गुणा हि देवस्य त्वसंख्यातास्तु चक्रिणः ॥ ३९<br><br>ये शङ्खचक्राब्जकरं सशार्ङ्गिणं<br>खगेन्द्रकेतुं वरदं श्रियः पतिम्।<br>समाश्रयन्ते भवभीतिनाशनं<br>संसारगर्ते न पतन्ति ते पुनः ॥ ४०<br><br>येषां मनसि गोविन्दो निवासी सततं बले।<br>न ते परिभवं यान्ति न मृत्योरुद्विजन्ति च ॥ ४१<br><br>देवं शार्ङ्गधरं विष्णुं ये प्रपन्नाः परायणम्।<br>न तेषां यमसालोक्यं न च ते नरकौकसः ॥ ४२<br><br>न तां गतिं प्राप्नुवन्ति श्रुतिशास्त्रविशारदाः।<br>विप्रा दानवशार्दूल विष्णुभक्ता व्रजन्ति याम् ॥ ४३<br><br>या गतिर्दैत्यशार्दूल हतानां तु महाहवे।<br>ततोऽधिकां गतिं यान्ति विष्णुभक्ता नरोत्तमाः ॥ ४४ | त्रिविक्रम भगवान्की चार प्रकारसे अर्चना करनेवाले मनुष्योंने निःसन्देह सुर और असुरसहित सम्पूर्ण लोकोंका पूजन कर लिया है। पुत्र! जिस प्रकार समुद्रके रत्न अनगिनत हैं, उसी प्रकार चक्र धारण करनेवाले विष्णुके गुण भी असंख्य हैं। हाथोंमें शङ्ख, चक्र, कमल एवं शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले गरुडध्वज, भवभीतिके नाश करनेवाले वरदानी लक्ष्मीपतिका आश्रय ग्रहण करनेवाले मनुष्य फिर संसाररूपी गड्ढेमें नहीं पड़ते। बले! जिनके मनमें गोविन्द निरन्तर निवास करते हैं, उनका अनादर नहीं होता और वे मृत्युसे आतङ्कित नहीं होते। मोक्ष-प्राप्ति करनेके श्रेष्ठ शरणस्थान शार्ङ्गधरदेव विष्णुकी शरणमें पहुँचे मनुष्योंको यमलोक या नरकमें नहीं जाना पड़ता। दानवश्रेष्ठ! वेदशास्त्रमें कुशल ब्राह्मणोंको वह गति नहीं प्राप्त होती जो गति विष्णुभक्त प्राप्त करते हैं। दैत्यश्रेष्ठ! महान् युद्धमें मारे गये व्यक्ति जो गति प्राप्त करते हैं, उस नरश्रेष्ठ विष्णुभक्तको उससे भी उत्तम गति प्राप्त होती है॥ ३८—४४॥ |
अध्याय ९३ ] बलिको पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति ४६७
| या गतिर्धर्मशीलानां सात्त्विकानां महात्मनाम् ।<br>सा गतिर्गदिता दैत्य भगवत्सेविनामपि ॥ ४५<br><br>सर्वावासं वासुदेवं सूक्ष्ममव्यक्तविग्रहम् ।<br>प्रविशन्ति महात्मानं तद्भक्ता नान्यचेतसः ॥ ४६<br><br>अनन्यमनसो भक्त्या ये नमस्यन्ति केशवम् ।<br>शुचयस्ते महात्मानस्तीर्थभूता भवन्ति ते ॥ ४७<br><br>गच्छंस्तिष्ठन् स्वपञ् जाग्रत् पिबन्नश्नन्नभीक्ष्णशः ।<br>ध्यायन् नारायणं यस्तु न ततोऽन्योऽस्ति पुण्यभाक् ।<br>वैकुण्ठं खड्गपरशुं भवबन्धसमुच्छिदम् ॥ ४८<br><br>प्रणिपत्य यथान्यायं संसारे न पुनर्भवत् ।<br>क्षेत्रेषु वसते नित्यं क्रीडन्नास्तेऽमितद्युतिः ॥ ४९<br><br>आसीनः सर्वदेहेषु कर्मभिर्न स बध्यते ।<br>येषां विष्णुः प्रियो नित्यं ते विष्णोः सततं प्रियाः ॥ ५०<br><br>न ते पुनः सम्भवन्ति तद्भक्तास्तत्परायणाः ।<br>ध्यायेद् दामोदरं यस्तु भक्तिनम्रोऽर्चयेत वा ॥ ५१<br><br>न स संसारपङ्केऽस्मिन् मज्जते दानवेश्वर ।<br>कल्यमुत्थाय ये भक्त्या स्मरन्ति मधुसूदनम् ।<br>स्तुवन्त्यप्यभिशृण्वन्ति दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ५२<br><br>हरिवाक्यामृतं पीत्वा विमलैः श्रोत्रभाजनैः ।<br>प्रहृष्यति मनो येषां दुर्गाण्यतितरन्ति ते ॥ ५३<br><br>येषां चक्रगदापाणौ भक्तिरव्यभिचारिणी ।<br>ते यान्ति नियतं स्थानं यत्र योगेश्वरो हरिः ॥ ५४<br><br>विष्णुकर्मप्रसक्तानां भक्तानां या परा गतिः ।<br>सा तु जन्मसहस्रेण न तपोभिरवाप्यते ॥ ५५<br><br>किं जप्यैस्तस्य मन्त्रैर्वा किं तपोभिः किमाश्रमैः ।<br>यस्य नास्ति परा भक्तिः सततं मधुसूदने ॥ ५६<br><br>वृथा यज्ञा वृथा वेदा वृथा दानं वृथा श्रुतम् ।<br>वृथा तपश्च कीर्तिश्च यो द्वेष्टि मधुसूदनम् ॥ ५७ | दैत्य! धर्मशील, सात्त्विक महात्माओंको जो गति प्राप्त होती है, भगवद्भक्तोंकी भी वही गति कही गयी है। अनन्यश्रद्धासे भगवान्की भक्ति करनेवाले सर्वावास, सूक्ष्म, अव्यक्त शरीरवाले महात्मा वासुदेवमें प्रवेश करते हैं। अनन्यमनसे श्रद्धापूर्वक केशवको नमन करनेवाले मनुष्य पवित्र एवं तीर्थस्वरूप होते हैं। चलते, खड़े, सोते, जागते एवं खाते-पीते हुए निरन्तर नारायणका ध्यान करनेवालेसे अधिक पुण्यका योग्य अधिकारी कोई नहीं होता। विधानानुकूल संसार-बन्धनका समुच्छेद करनेवाले खड्ग और परशु धारण करनेवाले वैकुण्ठदेवको नमस्कार करनेसे संसारमें पुनर्जन्म नहीं लेना पड़ता। क्षेत्रमें निवास करते हुए सर्वदा क्रीडा करनेवाला अमितकान्तिमान् कृष्णभक्त समस्त शरीरोंमें रहनेपर भी उनके कर्मोंके बन्धनमें नहीं पड़ता। विष्णु जिन्हें नित्य प्रिय हैं, वे सर्वदा विष्णुके प्रिय होते हैं। दामोदरका चिन्तन करनेवाले उनके भक्त, उनके शरणागत अथवा श्रद्धापूर्वक उनका अर्चन करनेवाले मनुष्य फिर जन्म ग्रहण नहीं करते। दानवेश्वर ! प्रातःकाल उठकर श्रद्धापूर्वक मधुसूदनका चिन्तन करनेवाले मनुष्य इस संसाररूपी कीचड़में नहीं फँसते। उनका गुणगान करनेवाले एवं गुणोंको श्रवण करनेवाले मनुष्य कठिनाइयोंको पार कर जाते हैं॥ ४५-५२॥<br><br>विमल कर्णरूपी पात्रोंसे अमृतरूपी हरिके वचनोंका पान कर (श्रवण कर) जिनका मन अत्यन्त आह्लादित होता है वे कठिनाइयोंको पार कर जाते हैं। चक्र-गदाधारी विष्णुमें स्थिर श्रद्धा रखनेवाले मनुष्य निःसंदेह योगेश्वर हरिके स्थानमें जाते हैं। विष्णुकी सेवामें तत्पर रहनेवाले भक्तोंको जो श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है वह हजारों जन्मोंके भी तपसे नहीं प्राप्त हो सकती। मधुसूदनमें निरन्तर पराभक्तिसे रहित मनुष्योंके जप, मन्त्र, तप एवं आश्रमोंसे क्या लाभ? मधुसूदनसे द्वेष करनेवाले मनुष्योंके यज्ञ, वेद, दान, ज्ञान, तप एवं कीर्ति व्यर्थ हैं। |
| ४६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने।<br>नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः॥ ५८<br><br>विष्णुरेव गतिर्येषां कुतस्तेषां पराजयः।<br>येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥ ५९<br><br>सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम्।<br>नारायणं नमस्कृत्य सर्वकर्माणि कारयेत्॥ ६० | जनार्दनमें श्रद्धा रखनेवालोंको बहुत-से मन्त्रोंसे क्या लाभ? 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्र सभी अर्थोंका सिद्ध करनेवाला है। जिनकी गति विष्णु हैं एवं जिनके हृदयमें नील कमलके समान श्याम वर्णवाले जनार्दन अवस्थित हैं, उनकी हार कहाँ सम्भव है? सभी मङ्गलोंके मङ्गलमूर्ति, वरेण्य, वरदानी प्रभु नारायणको नमस्कार कर समस्त कर्म करना चाहिये॥ ५३-६०॥ |
| विष्टयो व्यतिपाताश्च येऽन्ये दुर्नीति सम्भवाः।<br>ते नामस्मरणाद्विष्णोर्नाशं यान्ति महासुर॥ ६१<br><br>तीर्थकोटिसहस्त्राणि तीर्थकोटिशतानि च।<br>नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ६२<br><br>पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।<br>तानि सर्वाण्यवाप्नोति विष्णोर्नामानुकीर्तनात्॥ ६३<br><br>प्राप्नुवन्ति न तांल्लोकान् व्रतिनो वा तपस्विनः।<br>प्राप्यन्ते ये तु कृष्णस्य नमस्कारपरैर्नरैः॥ ६४<br><br>योऽप्यन्यदेवताभक्तो मिथ्यार्चयति केशवम्।<br>सोऽपि गच्छति साधूनां स्थानं पुण्यकृतां महत्॥ ६५<br><br>सातत्येन हृषीकेशं पूजयित्वा तु यत्फलम्।<br>सुचीर्णतपसां नृणां तत् फलं न कदाचन॥ ६६<br><br>त्रिसन्ध्यं पद्मनाभं तु ये स्मरन्ति सुमेधसः।<br>ते लभन्त्युपवासस्य फलं नास्त्यत्र संशयः॥ ६७ | महासुर! विष्टियाँ, व्यतिपात एवं दुर्नीतिसे उत्पन्न हुई अन्य सभी आपत्तियाँ विष्णुके नामका स्मरण करनेसे विनष्ट हो जाती हैं। सौ करोड़ एवं हजारों करोड़ तीर्थ भी नारायणको प्रणाम करनेकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। मृत्युलोकमें जितने तीर्थ और पवित्र स्थान—देवस्थान हैं, वे सभी विष्णुके नामके संकीर्तनसे प्राप्त होते हैं। श्रीकृष्णको नमन करनेवाले मनुष्य जिन लोकोंको प्राप्त करते हैं, उन्हें व्रत करनेवाले या तपस्या करनेवाले लोग नहीं प्राप्त करते। अन्य देवताका भक्त होते हुए केशवकी आडम्बरपूर्ण अर्चना करनेवाला मनुष्य भी पुण्यकर्म करनेवाले साधुओंके महान् स्थानको प्राप्त करता है। हृषीकेशके निरन्तर पूजनसे जो फल प्राप्त होता है घोर तप करनेवाले मनुष्योंको वह फल कभी नहीं प्राप्त होता। तीनों संध्याओंके समयमें पद्मनाभका स्मरण करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषोंको निस्संदेह उपवासका फल प्राप्त होता है॥ ६१-६७॥ |
| सततं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा हरिमर्चय।<br>तत्प्रसादात् परां सिद्धिं बले प्राप्स्यसि शाश्वतीम्॥ ६८ | बले! शास्त्रोंमें वर्णित कर्मद्वारा निरन्तर हरिका अर्चन करो। उनके प्रसादसे निरन्तर स्थिर रहनेवाली उत्तम सिद्धि प्राप्त करोगे। |
| तन्मना भव तद्भक्तस्तद्याजी तं नमस्कुरु।<br>तमेवाश्रित्य देवेशं सुखं प्राप्स्यसि पुत्रक॥ ६९ | पुत्र! तुम तन्मना, तद्भक्त एवं उनका भजन करनेवाला होकर उन्हें नमन करो; उन देवेशका ही आश्रय ग्रहण कर तुम सुख प्राप्त करोगे। |
| आद्यं ह्यनन्तमजरं हरिमव्ययं च<br>ये वै स्मरन्त्यहरहर्नृवरा भुविस्थाः।<br>सर्वत्रगं शुभदं ब्रह्ममयं पुराणं<br>ते यान्ति वैष्णवपदं ध्रुवमक्षयञ्च॥ ७० | आद्य, अनन्त, अजर, सर्वत्रगामी, शुभदाता, ब्रह्ममय, पुराण, अव्यय हरिका दिन-रात स्मरण करनेवाले मृत्युलोकके वासी श्रेष्ठ मनुष्य ध्रुव एवं अक्षय वैष्णव पदको प्राप्त करते हैं। |
| अध्याय ९३ ] | बलि का पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति | ४६९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा<br>नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति।<br>ते धौतपाण्डुरपुटा इव राजहंसाः<br>संसारसागरजलस्य तरन्ति पारम्॥ ७१<br><br>ध्यायन्ति ये सततमच्युतमीशितारं<br>निष्कल्मषं प्रवरपद्मदलायताक्षम्।<br>ध्यानेन तेन हतकिल्बिषवेदनास्ते<br>मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ७२ | जो आसक्तिहीन एवं पर और अपरके ज्ञाता मनुष्य निरन्तर गुरुदेव नारायणका चिन्तन करते हैं वे धुले हुए श्वेत पंखोंवाले राजहंसोंके समान विषय-रूपी जलसे भरे संसार-सागरको पार कर जाते हैं। जो मनुष्य उत्तम कमलदलके समान विस्तृत नेत्रोंवाले निर्दोष, नियमन करनेवाले अच्युतका निरन्तर चिन्तन करते हैं, वे उस ध्यानसे पाप-कष्टका नाश हो जानेपर फिर माताके पयोधरका रस नहीं पान करते (उनका पुनर्जन्म नहीं होता।)॥ ६८—७२॥ |
| ये कीर्तयन्ति वरदं वरपद्मनाभं<br>शङ्खाब्जचक्रवरचापगदासिहस्तम्।<br>पद्मालयावदनपङ्कजषट्पदाख्यं<br>नूनं प्रयान्ति सदनं मधुघातिनस्ते॥ ७३<br><br>शृण्वन्ति ये भक्तिपरा मनुष्याः<br>संकीर्त्यमानं भगवन्तमाद्यम्।<br>ते मुक्तपापाः सुखिनो भवन्ति<br>यथाऽमृतप्राशनतर्पितास्तु ॥ ७४<br><br>तस्माद् ध्यानं स्मरणं कीर्तनं वा<br>नाम्नां श्रवणं पठतां सज्जनानाम्।<br>कार्यं विष्णोः श्रद्दधानैर्मनुष्यैः<br>पूजातुल्यं तत् प्रशंसन्ति देवाः॥ ७५<br><br>बाह्यैस्तथाऽन्तःकरणैरविकल्र्वै-<br>र्यो नार्चयेत् केशवमीशितारम्।<br>पुष्पैश्च पत्रैर्जलपल्लवादिभि-<br>र्नूनं स मुष्टो विधितस्करेण॥ ७६ | हाथोंमें शङ्ख, कमल, चक्र, श्रेष्ठ धनुष, गदा तथा तलवार धारण करनेवाले, लक्ष्मीके मुखकमलके भ्रमर, वर देनेवाले पद्मनाभका कीर्तन करनेवाले मनुष्य निश्चय ही मधुसूदनका लोक प्राप्त करते हैं। अमृत पीनेसे तृप्त होनेवाले प्राणीके समान भक्तिपरायण मनुष्य आद्य भगवान्का कीर्तन सुनकर पापसे मुक्त एवं सुखी होते हैं। अतः श्रद्धाशील मनुष्यको विष्णुका ध्यान, स्मरण, कीर्तन अथवा पाठ करनेवाले मनुष्योंसे विष्णुके नामोंका श्रवण करना चाहिये। देवगण पूजाके समान उसकी प्रशंसा करते हैं। स्वस्थ, बाह्य तथा आन्तरिक इन्द्रियोंसे जो मनुष्य पुष्प, पत्र, जल एवं पल्लवादिद्वारा शासन करनेवाले केशवका अर्चन नहीं करता, निश्चय ही विधिरूपी तस्करने उसे लूट लिया है॥ ७३—७६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ९३
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| ४७० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९४ |
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चौरानबेवाँ अध्याय
बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान, विष्णु-मन्दिर-निर्माण और विष्णुभक्त एवं वृद्धवाक्यकी महिमाका वर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बलिरुवाच<br><br>भवता कथितं सर्वं समाराध्य जनार्दनम्।<br>या गतिः प्राप्यते लोके तां मे वक्तुमिहार्हसि ॥ १<br><br>केणार्चनेन देवस्य प्रीतिः समुपजायते।<br>कानि दानानि शस्तानि प्रीणनाय जगद्गुरोः॥ २<br><br>उपवासादिकं कार्यं कस्यां तिथ्यां महोदयम्।<br>कानि पुण्यानि शस्तानि विष्णोस्तुष्टिप्रदानि वै ॥ ३<br><br>यच्चान्यदपि कर्तव्यं हृष्टरूपैरनालसैः।<br>तदप्यशेषं दैत्येन्द्र ममाख्यातुमिहार्हसि ॥ ४ | बलिने कहा—(तात!) आपने सब कुछ कह दिया। अब आप जनार्दनकी पूजा करनेसे प्राप्त होनेवाली गतिका कथन करें। किस प्रकारकी आराधना करनेसे वासुदेवको प्रसन्नता होती है? (उन) जगद्गुरुको प्रसन्न करनेके लिये किस प्रकारके दान करने चाहिये (कौन-सी वस्तुएँ प्रशंसित हैं)? किस तिथिमें उपवास आदि करनेसे महान् उन्नति होती है? विष्णुकी प्रीति उत्पन्न करनेवाले कौन-से पवित्र कार्य कहे गये हैं? दैत्येन्द्र! आलस्यसे रहित होकर प्रीतिपूर्वक करने योग्य अन्य कार्योंका भी वर्णन आप भलीभाँति मुझसे कीजिये ॥ १–४ ॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br><br>श्रद्धानैर्भक्तिपरैर्यान्युद्दिश्य जनार्दनम्।<br>बले दानानि दीयन्ते तान्यूचुर्मुनयोऽक्षयान्॥ ५<br><br>ता एव तिथयः शस्ता यास्वभ्यर्च्य जगत्पतिम्।<br>तच्चित्तस्तन्मयो भूत्वा उपवासी नरो भवेत्॥ ६<br><br>पूजितेषु द्विजेन्द्रेषु पूजितः स्याज्जनार्दनः।<br>एतान् द्विषन्ति ये मूढास्ते यान्ति नरकं ध्रुवम्॥ ७<br><br>तानर्चयेन्नरो भक्त्या ब्राह्मणान् विष्णुतत्परः।<br>एवमाह हरिः पूर्वं ब्राह्मणा मामकी तनुः॥ ८<br><br>ब्राह्मणो नावमन्तव्यो बुधो वाप्यबुधोऽपि वा।<br>सोऽपि दिव्या तनुर्विष्णोस्तस्मात् तामर्चयेन्नरः॥ ९<br><br>तान्येव च प्रशस्तानि कुसुमानि महासुर।<br>यानि स्युर्वर्णयुक्तानि रसगन्धयुतानि च॥ १० | **प्रह्लादने कहा—**बले! श्रद्धासे भरे और भक्तिसे युक्त होकर जनार्दनके उद्देश्यसे जो दान दिये जाते हैं, उन्हें मुनियोंने कभी भी विनाश न होनेवाला (दान) कहा है। वे ही तिथियाँ प्रशंसनीय होती हैं, जिनमें मनुष्य विष्णुकी पूजा करनेके बाद उनमें चित्त एवं मन लगाकर उपवास करता है। ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे जनार्दनकी (ही) पूजा होती है। उनसे वैर करनेवाले मूढ़ व्यक्ति निश्चय ही नरकमें जाते हैं। विष्णुमें अनुराग रखनेवाले भक्तिमान् मनुष्यको श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वकालमें विष्णुने यह कहा था कि ब्राह्मण मेरे शरीर हैं। ज्ञानी (हो) अथवा अज्ञानी, (पर) ब्राह्मणका तिरस्कार (कभी) नहीं करना चाहिये। वह विष्णुका शरीर होता है। अतः उसकी पूजा करनी चाहिये। (जहाँतक विष्णुपूजाके लिये पुष्पका प्रश्न है,) |
अध्याय ९४ ] बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान ४७१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| विशेषतः प्रवक्ष्यामि पुष्पाणि तिथयस्तथा।<br>दानानि च प्रशस्तानि माधवप्रीणनाय तु॥ ११ | महासुर! वर्ण, रस एवं गन्धसे युक्त पुष्प ही उत्तम होते हैं। अब मैं माधवकी प्रसन्नताके लिये कहे गये विशेष पुष्पों, तिथियों एवं दानोंका (स्पष्टतासे) वर्णन करता हूँ॥ ५—११॥ |
| जाती शताह्वा सुमनाः कुन्दं बहुपुटं तथा।<br>बाणं च चम्पकाशोकं करवीरं च यूथिका॥ १२<br>पारिभद्रं पाटला च बकुलं गिरिशालिनी।<br>तिलकं च जपाकुसुमं पीतकं नागरं त्वपि॥ १३<br>एतानि हि प्रशस्तानि कुसुमान्यच्युतार्चने।<br>सुरभीणि तथान्यानि वर्जयित्वा तु केतकीम्॥ १४<br>बिल्वपत्रं शमीपत्रं पत्रं भृङ्गमृगाङ्कयोः।<br>तमालामलकीपत्रं शस्तं केशवपूजने॥ १५<br>येषामपि हि पुष्पाणि प्रशस्तान्यच्युतार्चने।<br>पल्लवान्यपि तेषां स्युः पत्राण्यर्चाविधौ हरेः॥ १६<br>वीरूधां च प्रवालेन बर्हिषा चार्चयेत्तथा।<br>नानारूपैश्चाम्बुभवैः कमलेन्दीवरादिभिः॥ १७<br>प्रवालैः शुचिभिः श्लक्ष्णैर्जलप्रक्षालितैर्बले।<br>वनस्पतीनामर्च्येत तथा दूर्वाग्रपल्लवैः॥ १८<br>चन्दनेनानुलिम्पेत कुङ्कुमेन प्रयत्नतः।<br>उशीरपद्मकाभ्यां च तथा कालीयकादिना॥ १९<br>महिषाख्यं कणं दारु सिह्नकं सागरुं सिता।<br>शङ्खं जातीफलं श्रीशे धूपानि स्युः प्रियाणि वै॥ २० | अच्युत (श्रीविष्णु)-की अर्चनाके लिये—मालती, शतावरी, चमेली, कुन्द, गुलाब, बहुपुट, बाण, चम्पा, अशोक, कनेर, जूही, पारिभद्र, पाटल, मौलसिरी, गिरिशालिनी, तिलक, अड़हुल, पीतक एवं नागर नामक पुष्प उत्तम हैं। इनके सिवा केतकीको छोड़कर अन्य सुगन्धित पुष्प भी श्रेष्ठ हैं। केशवके पूजनमें बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृङ्ग एवं मृगाङ्कके पत्र, तमाल तथा आमलकीके पत्र प्रशंसनीय हैं। अच्युतके अर्चनमें जिन वृक्षोंके पुष्पोंका प्रयोग होता है उनके पल्लव एवं पत्र भी विष्णुके पूजनके लिये प्रशंसनीय होते हैं। वीरुधोंके किसलय एवं कुश तथा जलमें उत्पन्न होनेवाले अनेक प्रकारके कमल एवं इन्दीवरादिसे विष्णुका पूजन करना चाहिये। बले! वनस्पतियोंके चिकने, पवित्र एवं जलसे धोये हुए कोपलोंसे तथा दूबके अङ्कुरसे (विष्णुका) पूजन करना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक चन्दन, कुङ्कुम, उशीर (खश) पद्मक एवं कालीयक आदिसे विष्णुका अनुलेपन करना चाहिये। श्रीविष्णुको महिष नामक कण, दारु, सिह्नक, अगरु, सिता, शङ्ख एवं जातीफलका धूप प्रिय होता है॥ १२—२०॥ |
| हविषा संस्कृता ये तु यवगोधूमशालयः।<br>तिलमुद्गादयो माषा व्रीहयश्च प्रिया हरेः॥ २१<br>गोदानानि पवित्राणि भूमिदानानि चानघ।<br>वस्त्रान्नस्वर्णदानानि प्रीतये मधुघातिनः॥ २२<br>माघमासे तिला देयास्तिलधेनुश्च दानव।<br>इन्धनादीनि च तथा माधवप्रीणनाय तु॥ २३<br>फाल्गुने व्रीहयो मुद्गा वस्त्रकृष्णाजिनादिकम्।<br>गोविन्दप्रीणनार्थाय दातव्यं पुरुषर्षभैः॥ २४<br>चैत्रे चित्राणि वस्त्राणि शयनान्यासनानि च।<br>विष्णोः प्रीत्यर्थमेतानि देयानि ब्राह्मणेध्वथ॥ २५ | घृतसे संस्कृत जौ, गेहूँ, शालिधान्य, तिल, मूँग, उड़द और अन्न हरिको प्रिय हैं। हे निष्पाप! मधुसूदनको गौ, पवित्र भूमि, वस्त्र, अन्न और सोनेके दान प्रिय होते हैं। दानव! माघमासमें माधवकी प्रसन्नताके लिये तिल, तिलधेनु एवं इन्धनादिका दान करना चाहिये। महान् पुरुषोंको गोविन्दकी प्रीतिके लिये फाल्गुनमासमें चावल, मूँग, वस्त्र तथा कृष्णमृगचर्म दान करना चाहिये। चैत्रमासमें विष्णुकी प्रीतिके लिये ब्राह्मणोंकी भाँति-भाँतिके वस्त्र, शय्या एवं आसनोंका दान करना चाहिये। |
| ४७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गन्धमाल्यानि देयानि वैशाखे सुरभीणि वै।<br>देयानि द्विजमुख्येभ्यो मधुसूदनतुष्टये॥ २६<br><br>उदकुम्भाम्बुधेनुं च तालवृन्तं सुचन्दनम्।<br>त्रिविक्रमस्य प्रीत्यर्थं दातव्यं साधुभिः सदा॥ २७<br><br>उपानद्युगलं छत्रं लवणामलकादिकम्।<br>आषाढे वामनप्रीतै दातव्यानि तु भक्तितः॥ २८ | मधुसूदनकी प्रीतिके लिये वैशाखमासमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुगन्धित गन्ध एवं माल्योंका दान करना चाहिये। त्रिविक्रमकी प्रीतिके लिये सज्जन व्यक्तिको ज्येष्ठमासमें जलका घड़ा, जलधेनु, ताड़का पंखा तथा सुन्दर चन्दनका दान करना चाहिये। भगवान् वामनकी प्रीतिके लिये आषाढ़मासमें भक्तिपूर्वक जूतेका जोड़ा, छत्र, लवण एवं आँवले आदिका दान करना चाहिये॥ २१—२८॥ |
| घृतं च क्षीरकुम्भाश्च घृतधेनुफलानि च।<br>श्रावणे श्रीधरप्रीत्यै दातव्यानि विपश्चिता॥ २९<br><br>मासि भाद्रपदे दद्यात् पायसं मधुसर्पिषी।<br>हृषीकेशप्रीणनार्थं लवणं सगुडोदनम्॥ ३०<br><br>तिलास्तुरङ्गं वृषभं दधि ताम्रायसादिकम्।<br>प्रीत्यर्थं पद्मनाभस्य देयमाश्वयुजे नरैः॥ ३१<br><br>रजतं कनकं दीपान् मणिमुक्ताफलादिकम्।<br>दामोदरस्य तुष्ट्यर्थं प्रदद्यात् कार्तिके नरः॥ ३२<br><br>खरोष्ट्राश्वतरान् नागान् यानयुग्ममजाविकम्।<br>दातव्यं केशवप्रीत्यै मासि मार्गशिरे नरैः॥ ३३<br><br>प्रासादनगरादीनि गृहप्रावरणादिकम्।<br>नारायणस्य तुष्ट्यर्थं पौषे देयानि भक्तितः॥ ३४<br><br>दासीदासमलङ्कारमन्नं षड्रससंयुतम्।<br>पुरुषोत्तमस्य तुष्ट्यर्थं प्रदेयं सार्वकालिकम्॥ ३५<br><br>यद्यदिष्टतमं किंचिद्यद्वाप्यस्ति शुचि गृहे।<br>तत्तद्धि देयं प्रीत्यर्थं देवदेवाय चक्रिणे॥ ३६ | बुद्धिमान् मनुष्यको श्रीधरकी प्रसन्नताके लिये श्रावणमासमें घी और दूधसे भरे घड़े, घृत, धेनु एवं फलोंका दान करना चाहिये। भाद्रपदमासमें हृषीकेशकी प्रसन्नताके लिये पायस, मधु, घी, नमक और गुड़से बनाये गये मीठे भातका दान करना चाहिये। मनुष्योंको पद्मनाभकी प्रसन्नताके लिये आश्विनमासमें तिल, घोड़ा, बैल, दही, ताँबा और लोहे आदिका दान करना चाहिये। मनुष्योंको दामोदरकी संतुष्टिके लिये कार्तिक-मासमें चाँदी, सोना, दीप, मणि, मुक्ता और फल आदिका दान करना चाहिये। मनुष्योंको केशवकी प्रीतिके लिये मार्गशीर्ष (अगहन)-मासमें खर, उष्ट्र, खच्चर, हाथी, सामान ढोनेवाला बकरा एवं भेड़्का दान करना चाहिये। नारायणकी संतुष्टिके लिये पौषमासमें श्रद्धापूर्वक प्रासाद, नगर, गृह एवं ओढ़नेके वस्त्र आदिका दान करना चाहिये। पुरुषोत्तमकी संतुष्टिके लिये सभी समय दासी, दास, आभूषण एवं मधुर आदि षट् रसोंसे युक्त अन्नका दान करना चाहिये। चक्र धारण करनेवाले देवाधिदेवकी प्रसन्नताके लिये अपनी जो सबसे अधिक इच्छित वस्तु हो अथवा घरमें जो वस्तु पवित्र हो उसका दान करना चाहिये॥ २९—३६॥ |
| यः कारयेन्मन्दिरं केशवस्य<br>पुण्याँल्लोकान् स जयेच्छाश्वतान् वै।<br>दत्त्वारामान् पुष्पफलाभिपन्नान्<br>भोगान् भुङ्क्ते कामतः श्लाघनीयान्॥ ३७ | केशवभगवान्का मन्दिर-निर्माण करानेवाला मनुष्य सतत स्थायी पुण्यलोकोंको प्राप्त करता है। फूल-फलवाले वाटिकाओंका दान करनेवाला इच्छानुसार प्रशंसनीय भोगोंका उपभोग करता है। |
| पितामहस्य पुरतः कुलान्यष्टौ तु यानि च।<br>तारयेदात्मना सार्धं विष्णोर्मन्दिरकारकः॥ ३८ | विष्णुभगवान्के मन्दिरका निर्माण करानेवाला पुरुष अपने पितामहसे आगेके आठ कुलपुरुषोंका उद्धार करता है। |
| अध्याय ९४ ] | बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान | ४७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इमाश्च पितरो दैत्य गाथा गायन्ति योगिनः।<br>पुरतो यदुसिंहस्य ज्यामघस्य तपस्विनः॥ ३९<br><br>अपि नः स कुले कश्चिद् विष्णुभक्तो भविष्यति।<br>हरिमन्दिरकर्ता यो भविष्यति शुचिव्रतः॥ ४०<br><br>अपि नः सन्ततौ जायेद् विष्ण्वालयविलेपनम्।<br>सम्मार्जनं च धर्मात्मा करिष्यति च भक्तितः॥ ४१<br><br>अपि नः सन्ततौ जातो ध्वजं केशवमन्दिरे।<br>दास्यते देवदेवाय दीपं पुष्पानुलेपनम्॥ ४२<br><br>महापातकयुक्तो वा पातकी चोपपातकी।<br>विमुक्तपापो भवति विष्ण्वायतनचित्रकृत्॥ ४३ | दैत्य! पितरोंने यदुश्रेष्ठ योगी एवं तपस्वी ज्यामघके सामने इस गाथाका वर्णन किया था। क्या हमारे कुलमें पवित्र व्रत धारण करनेवाला इस प्रकारका कोई विष्णुभक्त उत्पन्न होगा जो हरिका मन्दिर बनवायेगा ? क्या हमारी सन्ततिमें कोई विष्णुमन्दिरमें श्रद्धापूर्वक चूने आदिसे सफाई करानेवाला और झाड़ू देनेवाला धार्मिक उत्पन्न होगा ? क्या हमारी सन्ततियोंमें ऐसा कोई होगा जो केशवके मन्दिरमें ध्वजाका दान करेगा और देवदेवेश्वरको दीप, पुष्प और सुगन्धित चन्दन आदि प्रदान करेगा ? महापातकी, पातकी अथवा उपपातकी व्यक्ति विष्णुमन्दिरको भाँति-भाँतिके रंगोंसे सजाकर अथवा दिव्य चित्र बनाकर पापसे मुक्त हो जाता है॥ ३७—४३॥ |
| इत्थं पितॄणां वचनं श्रुत्वा नृपतिसत्तमः।<br>चकारायतनं भूम्यां स्वयं च लिम्पतासुर॥ ४४<br><br>विभूतिभिः केशवस्य केशवाराधने रतः।<br>नानाधातुविकारैश्च पञ्चवर्णैश्च चित्रकैः॥ ४५<br><br>ददौ दीपानि विधिवद् वासुदेवालये वले।<br>सुगन्धितैलपूर्णानि घृतपूर्णानि च स्वयम्॥ ४६<br><br>नानावर्णा वैजयन्त्यो महारजनरञ्जिताः।<br>मञ्जिष्ठा नवरङ्गीयाः श्वेतपाटलिकाश्रिताः॥ ४७<br><br>आरामा विविधा हृद्याः पुष्पाढ्याः फलशालिनः।<br>लतापल्लवसंछन्ना देवदारुभिरावृताः॥ ४८<br><br>कारिताश्च महामञ्चाधिष्ठिताः कुशलैर्जनैः।<br>पौरोगवविधानज्ञै रत्नसंस्कारिभिर्दृढैः॥ ४९<br><br>तेषु नित्यं प्रपूज्यन्ते यतयो ब्रह्मचारिणः।<br>श्रोत्रिया ज्ञानसम्पन्ना दीनान्धविकलादयः॥ ५०<br><br>इत्थं स नृपतिः कृत्वा श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>ज्यामघो विष्णुनिलयं गत इत्यनुशुश्रुमः॥ ५१ | असुर! पितृगणके इस प्रकारके वचनको सुनकर उस नृपश्रेष्ठने पृथ्वीपर मन्दिरका निर्माण करवाया। वह स्वयं उसमें चूने आदिसे सफाई तथा धोना-पोंछना आदि करता था। वह केशवकी विभूतियों, नाना प्रकारकी धातुओंसे निर्मित वस्तुओं तथा पाँच वर्णके तिलकोंसे पूजा करने लगा। बले! उसने वासुदेवके मन्दिरमें स्वयं विधिपूर्वक सुगन्धित तैल एवं घीसे भरे दीपकका दान किया। (उसने विष्णुमन्दिरमें) कुसुम्भ मजीठके रंगमें रँगे श्वेत एवं लाल वर्णके तथा नौ रंगोंवाले भाँति-भाँतिके ध्वजोंको आरोपित किया। (उसने) पुष्पों, फलों, लतापल्लवों तथा देवदारु आदि भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे पूर्ण उद्यानोंका निर्माण कराया। पाकशालाके अध्यक्षके विधानको जाननेवाले एवं रत्नोंसे अलंकृत करनेवाले अत्यन्त कुशल पुरुषोंसे अधिष्ठित बड़े-बड़े मञ्चोंका निर्माण करवाया। उनमें प्रतिदिन यतियों, ब्रह्मचारियों, श्रोत्रियों, ज्ञानियों, दीनों, अन्धों एवं विकलांगों—लँगड़े-लूले आदि पुरुषोंका सत्कार होता था। हमलोगोंने सुना है कि ऐसा कार्य करनेसे श्रद्धावान् और जितेन्द्रिय राजा ज्यामघने विष्णुलोकको प्राप्त कर लिया॥ ४४—५१॥ |
| ४७४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ |
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| तमेव चाद्यापि बले मार्गं ज्यामघकारितम्।<br>व्रजन्ति नरशार्दूल विष्णुलोकजिगीषवः॥ ५२<br>तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र कारयस्वालयं हरेः।<br>तमर्चयस्व यत्नेन ब्राह्मणांश्च बहुश्रुतान्।<br>पौराणिकान् विशेषेण सदाचाररताञ् शुचीन् ॥ ५३<br>वासोभिर्भूषणै रत्नैर्गोभिर्भूकनकादिभिः।<br>विभवे सति देवस्य प्रीणनं कुरु चक्रिणः ॥ ५४<br>एवं क्रियायोगरतस्य तेऽद्य<br>नूनं मुरारिः शुभदो भविष्यति।<br>नरा न सीदन्ति बले समाश्रिता<br>विभुं जगन्नाथमनन्तमच्युतम् ॥ ५५ | बले! विष्णुलोककी प्राप्तिकी कामना करनेवाले पुरुष आज भी राजा ज्यामघद्वारा प्रदर्शित उसी मार्गका आश्रय लेते हैं। इसलिये राजेन्द्र! तुम भी हरिका मन्दिर बनवाओ और प्रयत्नपूर्वक उन हरि, बहुश्रुत ब्राह्मणों एवं विशेष रूपसे सदाचारपरायण पवित्र पुराण जानने और प्रवचन करनेवालोंका पूजन करो। ऐश्वर्य रहनेपर वस्त्र, आभूषण, रत्न, गौ, पृथ्वी एवं स्वर्ण आदि (-के दान)-द्वारा चक्रधर विष्णुको प्रसन्न करो। तुम्हारे इस प्रकारकी क्रिया करनेमें तत्पर रहनेपर मुरारि निश्चय ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। बले! विभु जगन्नाथ अनन्त अच्युतका आश्रय ग्रहण करनेवाले व्यक्ति दुःखी नहीं होते॥ ५२—५५॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दितीश्वरो<br>वैरोचनं सत्यमनुत्तमं हि।<br>सम्पूजितस्तेन विमुक्तिमायौ<br>सम्पूर्णकामो हरिपादभक्तः ॥ ५६<br>गते हि तस्मिन् मुदिते पितामहे<br>बलेर्बभौ मन्दिरमिन्दुवर्णम्।<br>महेन्द्रशिल्पिप्रवरोऽथ केशवं<br>स कारयामास महामहीयान् ॥ ५७<br>स्वयं स्वभार्यासहितश्चकार<br>देवालये मार्जनलेपनादिकाः।<br>क्रिया महात्मा यवशर्कराद्या<br>बलिं चकाराप्रतिमां मधुद्रुहः ॥ ५८<br>दीपप्रदानं स्वयमायताक्षी<br>विन्ध्यावली विष्णुगृहे चकार।<br>गेयं स धर्म्यश्रवणं च धीमान्<br>पौराणिकैर्विप्रवरैरकारयत् ॥ ५९ | **पुलस्त्यजी बोले—**बलिसे इस प्रकार सत्य तथा श्रेष्ठ वचन कहनेके बाद विष्णुभगवान्के चरणोंमें अनुराग रखनेवाले सफलमनोरथ दितीश्वर प्रह्लाद बलिद्वारा किये गये सत्कारको ग्रहण कर मोक्षमार्गकी ओर प्रस्थित हो गये। पितामह प्रह्लादके प्रसन्न होकर चले जानेपर बलिका महल चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित होने लगा। महामहिम उस (बलि)-ने विश्वकर्मासे केशवका मन्दिर निर्मित करवाया। बलि स्वयं अपनी पत्नीके साथ उस देवालयमें मार्जन, लेपन आदि क्रियाएँ करने लगा। मधुसूदनके लिये महात्मा बलिने जौ एवं शक्कर आदिका उत्तम नैवेद्य निवेदित किया। विशालनयना विन्ध्यावली स्वयं विष्णुमन्दिरमें दीपदान करने लगी। बुद्धिमान् बलि पुराणवेत्ता श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे धार्मिक प्रवचन करवाने लगा॥ ५६—५९॥ | | तथाविधस्यासुरपुङ्गवस्य<br>धर्म्ये सुमार्गे प्रतिसंस्थितस्य।<br>जगत्पतिर्दिव्यवपुर्जनार्दन-<br>स्तस्थौ महात्मा बलिरक्षणाय ॥ ६० | उस प्रकारके धर्ममार्गमें स्थित रहनेवाले असुरोंमें श्रेष्ठ बलिकी रक्षाके लिये दिव्य शरीर धारण करनेवाले जगत्पति परमात्मा जनार्दन (वहाँ) विराजने लगे। |
| अध्याय ९४ ] | बलिक्रा प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान | ४७५ | | :--- | :--- |
| सूर्यायुताभं मुसलं प्रगृह्य<br> निघ्नन् स दुष्टानरियूथपालान्।<br>द्वारि स्थितो न प्रददौ प्रवेशं<br> प्राकारगुप्ते बलिनो गृहे तु ॥ ६१<br><br>द्वारि स्थिते धातरि रक्षपाले<br> नारायणे सर्वगुणाभिरामे।<br>प्रासादमध्ये हरिमीशितार-<br> मभ्यर्चयामास सुरर्षिमुख्यम् ॥ ६२<br><br>स एवमास्ते सुरराड् बलिस्तु<br> समर्चयन् वै हरिपादपङ्कजौ।<br>सस्मार नित्यं हरिभाषितानि<br> स तस्य जातो विनयाङ्कुशस्तु ॥ ६३ | वे द्वारपर रहते हुए दस हजार सूर्योंके समान तेजवाले मुसलको लेकर दुष्ट शत्रुओंके यूथपतियोंका संहार करते एवं प्राचीर (परकोटा)-से रक्षित बलिके भवनमें किसीको प्रवेश नहीं करने देते थे। सभी गुणोंसे सुन्दर लगनेवाले विधाता नारायणके द्वारपाल होनेपर बलि भी अपने महलके भीतर निरन्तर सुरों एवं ऋषियोंमें सर्वश्रेष्ठ नियमनकर्ता हरिका पूजन करने लगा। असुर-राज बलि इस प्रकार हरिके चरणकमलोंका अर्चन करते हुए नित्य हरिके वचनोंका स्मरण किया करता था। वह (नियम) उसके लिये विनयका अङ्कुश हो गया ॥ ६०-६३॥ | | इदं च वृत्तं स पपाठ दैत्यराद्<br> स्मरन् सुवाक्यानि गुरोः शुभानि।<br>तथ्यानि पथ्यानि परत्र चेह<br> पितामहस्येन्द्रसमस्य वीरः ॥ ६४<br><br>ये वृद्धवाक्यानि समाचरन्ति<br> श्रुत्वा दुरुक्तान्यपि पूर्वतस्तु।<br>स्निग्धानि पश्चान्नवनीतशुद्धा<br> मोदन्ति ते नात्र विचारमस्ति ॥ ६५<br><br>आपद्भुजंगदष्टस्य मन्त्रहीनस्य सर्वदा।<br>वृद्धवाक्यौषधा नूनं कुर्वन्ति किल निर्विषम् ॥ ६६<br><br>वृद्धवाक्यामृतं पीत्वा तदुक्तमनुमान्य च।<br>या तृप्तिर्जायते पुंसां सोमपाने कुतस्तथा ॥ ६७<br><br>आपत्तौ पतितानां येषां वृद्धा न सन्ति शास्तारः।<br>ते शोच्या बन्धूनां जीवन्तोऽपीह मृततुल्याः स्युः ॥ ६८<br><br>आपद्ग्राहगृहीतानां वृद्धाः सन्ति न पण्डिताः।<br>येषां मोक्षयितारो वै तेषां शान्तिर्न विद्यते ॥ ६९<br><br>आपज्जलनिमग्नानां हियतां व्यसनोर्मिभिः।<br>वृद्धवाक्यैर्विना नूनं नैवोत्तारं कथंचन ॥ ७०<br><br>तस्माद् यो वृद्धवाक्यानि शृणुयाद् विदधाति च।<br>स सद्यः सिद्धिमाप्नोति यथा वैरोचनो बलिः ॥ ७१ | इन्द्रके समान श्रेष्ठ अपने पितामहके कल्याणप्रद इस लोक तथा परलोकमें कल्याणकारी एवं सुन्दर तथ्य वचनोंका स्मरण करते हुए वह वीर दैत्यराज इस वृत्तका पाठ (आवृत्ति) करता था। पूर्वमें कठोरतापूर्वक कहे गये और बादमें नवनीतके समान स्निग्ध (कोमल) एवं शुद्ध वृद्धवाक्योंका श्रवण कर तदनुसार आचरण करनेवाले निस्सन्देह आनन्द प्राप्त करते हैं। वृद्धवाक्यरूपी ओषधि आपत्तीरूपी सर्पसे दंशित मन्त्रहीन पुरुषको निस्सन्देह विषसे रहित कर देती है। वृद्धवचनरूपी अमृतको पीने एवं उनके कथनके अनुसार आचरण करनेसे मनुष्योंको जो तृप्ति होती है वैसी तृप्ति सोमपानमें कहाँ है? वृद्धजन आपत्तिमें पड़े हुए जिन मनुष्योंका शासन (मार्गदर्शन) नहीं करते वे बन्धुओंके लिये शोचनीय तथा जीवित ही मरे हुएके समान होते हैं। आपत्तिरूपी ग्राहसे ग्रस्त जिन व्यक्तियोंको वृद्ध ज्ञानी लोग (उससे) मुक्त करानेवाले नहीं होते उन्हें शान्तिकी प्राप्ति नहीं होती। आपत्तिरूपी जलमें डूबे और व्यसनरूपी लहरोंके थपेड़े खानेवाले पुरुषोंका उद्धार वृद्ध वचनके सिवा अन्य किसी भी प्रकार नहीं हो सकता। अतः वृद्धवचनको सुनने एवं तदनुसार आचरण करनेवाला मनुष्य विरोचन-पुत्र बलिके समान शीघ्र सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ६४-७१ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९४॥
| ४७६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९५ |
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पंचानबेवाँ अध्याय
पुराण-वाचन, श्रावण-श्रवण और पठनकी फलश्रुति
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले—नारदजी! मैंने आपसे इस अत्यन्त पावन पुराणका कथन किया है। इसको सुननेसे मनुष्य उत्तम यश और भक्तिसे सम्पन्न होकर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। जैसे गङ्गाजलमें स्नान करनेसे सारे पाप धुल जाते हैं, वैसे ही इस पुराणका श्रवण करनेसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मन्! वामनपुराणका श्रवण करनेवाले मनुष्यके शरीर एवं कुलमें रोग तथा अभिचार-कर्म (मारण, मोहन, उच्चाटन आदि)-से उत्पन्न घातक प्रभाव नहीं होता। विनयपूर्वक विष्णुका अर्चन करते हुए श्रद्धासे विधानके अनुसार नित्य इस पुराणके सुननेवाले मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे दक्षिणाके सहित अश्वमेध-यज्ञ करने तथा सोना, भूमि, अश्व, गौ, हाथी तथा रथके दानका फल प्राप्त होता है। इस (पुराण)-का एक चरण (भाग) भी सुननेवाला पुरुष तथा स्त्री पृथ्वीमें पावन एवं अत्यन्त पुण्यवान् हो जाता है॥ १-५॥ | | एतन्मया पुण्यतमं पुराणं<br>तुभ्यं तथा नारद कीर्तितं वै।<br>श्रुत्वा च कीर्त्या परया समेतो<br>भक्त्या च विष्णोः पदमभ्युपैति॥ १<br>यथा पापानि पूयन्ते गङ्गावारिविगाहनात्।<br>तथा पुराणश्रवणाद् दुरितानां विनाशनम्॥ २<br>न तस्य रोगा जायन्ते न विषं चाभिचारिकम्।<br>शरीरे च कुले ब्रह्मन् यः शृणोति च वामनम्॥ ३<br>शृणोति नित्यं विधिवच्च भक्त्या<br>सम्पूजयन् यः प्रणतश्च विष्णुम्।<br>स चाश्वमेधस्य सदक्षिणस्य<br>फलं समग्रं परिहीनपापः॥ ४<br>प्राप्नोति दत्तस्य सुवर्णभूमे-<br>रश्वस्य गोनागरथस्य चैव।<br>नारी नरश्चापि च पादमेकं<br>शृण्वन् शुचिः पुण्यतमः पृथिव्याम्॥ ५ | | | स्नाने कृते तीर्थवरे सुपुण्ये<br>गङ्गाजले नैमिषपुष्करे वा।<br>कोकामुखे यत् प्रवदन्ति विप्राः<br>प्रयागमासाद्य च माघमासे॥ ६<br>स तत्फलं प्राप्य च वामनस्य<br>संकीर्तयन् नान्यमनाः पदं हि।<br>गच्छेन्मया नारद तेऽद्य चोक्तं<br>यद् राजसूयस्य फलं प्रयच्छेत्॥ ७ | ब्राह्मणलोग अत्यन्त पवित्र श्रेष्ठ तीर्थके जल, गङ्गाजल, नैमिषारण्य, पुष्कर, कोकामुख तथा माघमासमें प्रयागमें जाकर स्नान करनेसे जिस फलकी प्राप्तिका होना बतलाते हैं, एकाग्रमनसे वामनपुराणके एक चरणका कीर्तन करते हुए यात्रा करनेवाले पुरुषको (भी) वही फल प्राप्त होता है। नारदजी! मैंने आज आपसे उस पुराणको कहा है, जो राजसूययज्ञका फल देनेवाला है। | | यद भूमिलोके सुरलोकलभ्ये<br>महत्सुखं प्राप्य नरः समग्रम्।<br>प्राप्नोति चास्य श्रवणान्महर्षे<br>सौत्रामणेर्नास्ति च संशयो मे॥ ८ | महर्षे! मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसको सुननेसे मनुष्य पृथ्वी एवं देवलोकमें प्राप्त होने योग्य सारे महान् सुखोंको प्राप्तकर सौत्रामणि नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है। |