वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ९३ ] | बलि का पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति | ४६९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ये मानवा विगतरागपरावरज्ञा<br>नारायणं सुरगुरुं सततं स्मरन्ति।<br>ते धौतपाण्डुरपुटा इव राजहंसाः<br>संसारसागरजलस्य तरन्ति पारम्॥ ७१<br><br>ध्यायन्ति ये सततमच्युतमीशितारं<br>निष्कल्मषं प्रवरपद्मदलायताक्षम्।<br>ध्यानेन तेन हतकिल्बिषवेदनास्ते<br>मातुः पयोधररसं न पुनः पिबन्ति॥ ७२ | जो आसक्तिहीन एवं पर और अपरके ज्ञाता मनुष्य निरन्तर गुरुदेव नारायणका चिन्तन करते हैं वे धुले हुए श्वेत पंखोंवाले राजहंसोंके समान विषय-रूपी जलसे भरे संसार-सागरको पार कर जाते हैं। जो मनुष्य उत्तम कमलदलके समान विस्तृत नेत्रोंवाले निर्दोष, नियमन करनेवाले अच्युतका निरन्तर चिन्तन करते हैं, वे उस ध्यानसे पाप-कष्टका नाश हो जानेपर फिर माताके पयोधरका रस नहीं पान करते (उनका पुनर्जन्म नहीं होता।)॥ ६८—७२॥ |
| ये कीर्तयन्ति वरदं वरपद्मनाभं<br>शङ्खाब्जचक्रवरचापगदासिहस्तम्।<br>पद्मालयावदनपङ्कजषट्पदाख्यं<br>नूनं प्रयान्ति सदनं मधुघातिनस्ते॥ ७३<br><br>शृण्वन्ति ये भक्तिपरा मनुष्याः<br>संकीर्त्यमानं भगवन्तमाद्यम्।<br>ते मुक्तपापाः सुखिनो भवन्ति<br>यथाऽमृतप्राशनतर्पितास्तु ॥ ७४<br><br>तस्माद् ध्यानं स्मरणं कीर्तनं वा<br>नाम्नां श्रवणं पठतां सज्जनानाम्।<br>कार्यं विष्णोः श्रद्दधानैर्मनुष्यैः<br>पूजातुल्यं तत् प्रशंसन्ति देवाः॥ ७५<br><br>बाह्यैस्तथाऽन्तःकरणैरविकल्र्वै-<br>र्यो नार्चयेत् केशवमीशितारम्।<br>पुष्पैश्च पत्रैर्जलपल्लवादिभि-<br>र्नूनं स मुष्टो विधितस्करेण॥ ७६ | हाथोंमें शङ्ख, कमल, चक्र, श्रेष्ठ धनुष, गदा तथा तलवार धारण करनेवाले, लक्ष्मीके मुखकमलके भ्रमर, वर देनेवाले पद्मनाभका कीर्तन करनेवाले मनुष्य निश्चय ही मधुसूदनका लोक प्राप्त करते हैं। अमृत पीनेसे तृप्त होनेवाले प्राणीके समान भक्तिपरायण मनुष्य आद्य भगवान्का कीर्तन सुनकर पापसे मुक्त एवं सुखी होते हैं। अतः श्रद्धाशील मनुष्यको विष्णुका ध्यान, स्मरण, कीर्तन अथवा पाठ करनेवाले मनुष्योंसे विष्णुके नामोंका श्रवण करना चाहिये। देवगण पूजाके समान उसकी प्रशंसा करते हैं। स्वस्थ, बाह्य तथा आन्तरिक इन्द्रियोंसे जो मनुष्य पुष्प, पत्र, जल एवं पल्लवादिद्वारा शासन करनेवाले केशवका अर्चन नहीं करता, निश्चय ही विधिरूपी तस्करने उसे लूट लिया है॥ ७३—७६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ९३
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