वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४६८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैर्भक्तिर्यस्य जनार्दने।<br>नमो नारायणायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः॥ ५८<br><br>विष्णुरेव गतिर्येषां कुतस्तेषां पराजयः।<br>येषामिन्दीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः॥ ५९<br><br>सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं वरेण्यं वरदं प्रभुम्।<br>नारायणं नमस्कृत्य सर्वकर्माणि कारयेत्॥ ६० | जनार्दनमें श्रद्धा रखनेवालोंको बहुत-से मन्त्रोंसे क्या लाभ? 'ॐ नमो नारायणाय' मन्त्र सभी अर्थोंका सिद्ध करनेवाला है। जिनकी गति विष्णु हैं एवं जिनके हृदयमें नील कमलके समान श्याम वर्णवाले जनार्दन अवस्थित हैं, उनकी हार कहाँ सम्भव है? सभी मङ्गलोंके मङ्गलमूर्ति, वरेण्य, वरदानी प्रभु नारायणको नमस्कार कर समस्त कर्म करना चाहिये॥ ५३-६०॥ |
| विष्टयो व्यतिपाताश्च येऽन्ये दुर्नीति सम्भवाः।<br>ते नामस्मरणाद्विष्णोर्नाशं यान्ति महासुर॥ ६१<br><br>तीर्थकोटिसहस्त्राणि तीर्थकोटिशतानि च।<br>नारायणप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ ६२<br><br>पृथिव्यां यानि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।<br>तानि सर्वाण्यवाप्नोति विष्णोर्नामानुकीर्तनात्॥ ६३<br><br>प्राप्नुवन्ति न तांल्लोकान् व्रतिनो वा तपस्विनः।<br>प्राप्यन्ते ये तु कृष्णस्य नमस्कारपरैर्नरैः॥ ६४<br><br>योऽप्यन्यदेवताभक्तो मिथ्यार्चयति केशवम्।<br>सोऽपि गच्छति साधूनां स्थानं पुण्यकृतां महत्॥ ६५<br><br>सातत्येन हृषीकेशं पूजयित्वा तु यत्फलम्।<br>सुचीर्णतपसां नृणां तत् फलं न कदाचन॥ ६६<br><br>त्रिसन्ध्यं पद्मनाभं तु ये स्मरन्ति सुमेधसः।<br>ते लभन्त्युपवासस्य फलं नास्त्यत्र संशयः॥ ६७ | महासुर! विष्टियाँ, व्यतिपात एवं दुर्नीतिसे उत्पन्न हुई अन्य सभी आपत्तियाँ विष्णुके नामका स्मरण करनेसे विनष्ट हो जाती हैं। सौ करोड़ एवं हजारों करोड़ तीर्थ भी नारायणको प्रणाम करनेकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हैं। मृत्युलोकमें जितने तीर्थ और पवित्र स्थान—देवस्थान हैं, वे सभी विष्णुके नामके संकीर्तनसे प्राप्त होते हैं। श्रीकृष्णको नमन करनेवाले मनुष्य जिन लोकोंको प्राप्त करते हैं, उन्हें व्रत करनेवाले या तपस्या करनेवाले लोग नहीं प्राप्त करते। अन्य देवताका भक्त होते हुए केशवकी आडम्बरपूर्ण अर्चना करनेवाला मनुष्य भी पुण्यकर्म करनेवाले साधुओंके महान् स्थानको प्राप्त करता है। हृषीकेशके निरन्तर पूजनसे जो फल प्राप्त होता है घोर तप करनेवाले मनुष्योंको वह फल कभी नहीं प्राप्त होता। तीनों संध्याओंके समयमें पद्मनाभका स्मरण करनेवाले बुद्धिमान् पुरुषोंको निस्संदेह उपवासका फल प्राप्त होता है॥ ६१-६७॥ |
| सततं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा हरिमर्चय।<br>तत्प्रसादात् परां सिद्धिं बले प्राप्स्यसि शाश्वतीम्॥ ६८ | बले! शास्त्रोंमें वर्णित कर्मद्वारा निरन्तर हरिका अर्चन करो। उनके प्रसादसे निरन्तर स्थिर रहनेवाली उत्तम सिद्धि प्राप्त करोगे। |
| तन्मना भव तद्भक्तस्तद्याजी तं नमस्कुरु।<br>तमेवाश्रित्य देवेशं सुखं प्राप्स्यसि पुत्रक॥ ६९ | पुत्र! तुम तन्मना, तद्भक्त एवं उनका भजन करनेवाला होकर उन्हें नमन करो; उन देवेशका ही आश्रय ग्रहण कर तुम सुख प्राप्त करोगे। |
| आद्यं ह्यनन्तमजरं हरिमव्ययं च<br>ये वै स्मरन्त्यहरहर्नृवरा भुविस्थाः।<br>सर्वत्रगं शुभदं ब्रह्ममयं पुराणं<br>ते यान्ति वैष्णवपदं ध्रुवमक्षयञ्च॥ ७० | आद्य, अनन्त, अजर, सर्वत्रगामी, शुभदाता, ब्रह्ममय, पुराण, अव्यय हरिका दिन-रात स्मरण करनेवाले मृत्युलोकके वासी श्रेष्ठ मनुष्य ध्रुव एवं अक्षय वैष्णव पदको प्राप्त करते हैं। |