भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 480
४७०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९४

चौरानबेवाँ अध्याय

बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान, विष्णु-मन्दिर-निर्माण और विष्णुभक्त एवं वृद्धवाक्यकी महिमाका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
बलिरुवाच<br><br>भवता कथितं सर्वं समाराध्य जनार्दनम्।<br>या गतिः प्राप्यते लोके तां मे वक्तुमिहार्हसि ॥ १<br><br>केणार्चनेन देवस्य प्रीतिः समुपजायते।<br>कानि दानानि शस्तानि प्रीणनाय जगद्गुरोः॥ २<br><br>उपवासादिकं कार्यं कस्यां तिथ्यां महोदयम्।<br>कानि पुण्यानि शस्तानि विष्णोस्तुष्टिप्रदानि वै ॥ ३<br><br>यच्चान्यदपि कर्तव्यं हृष्टरूपैरनालसैः।<br>तदप्यशेषं दैत्येन्द्र ममाख्यातुमिहार्हसि ॥ ४बलिने कहा—(तात!) आपने सब कुछ कह दिया। अब आप जनार्दनकी पूजा करनेसे प्राप्त होनेवाली गतिका कथन करें। किस प्रकारकी आराधना करनेसे वासुदेवको प्रसन्नता होती है? (उन) जगद्गुरुको प्रसन्न करनेके लिये किस प्रकारके दान करने चाहिये (कौन-सी वस्तुएँ प्रशंसित हैं)? किस तिथिमें उपवास आदि करनेसे महान् उन्नति होती है? विष्णुकी प्रीति उत्पन्न करनेवाले कौन-से पवित्र कार्य कहे गये हैं? दैत्येन्द्र! आलस्यसे रहित होकर प्रीतिपूर्वक करने योग्य अन्य कार्योंका भी वर्णन आप भलीभाँति मुझसे कीजिये ॥ १–४ ॥
प्रह्लाद उवाच<br><br>श्रद्धानैर्भक्तिपरैर्यान्युद्दिश्य जनार्दनम्।<br>बले दानानि दीयन्ते तान्यूचुर्मुनयोऽक्षयान्॥ ५<br><br>ता एव तिथयः शस्ता यास्वभ्यर्च्य जगत्पतिम्।<br>तच्चित्तस्तन्मयो भूत्वा उपवासी नरो भवेत्॥ ६<br><br>पूजितेषु द्विजेन्द्रेषु पूजितः स्याज्जनार्दनः।<br>एतान् द्विषन्ति ये मूढास्ते यान्ति नरकं ध्रुवम्॥ ७<br><br>तानर्चयेन्नरो भक्त्या ब्राह्मणान् विष्णुतत्परः।<br>एवमाह हरिः पूर्वं ब्राह्मणा मामकी तनुः॥ ८<br><br>ब्राह्मणो नावमन्तव्यो बुधो वाप्यबुधोऽपि वा।<br>सोऽपि दिव्या तनुर्विष्णोस्तस्मात् तामर्चयेन्नरः॥ ९<br><br>तान्येव च प्रशस्तानि कुसुमानि महासुर।<br>यानि स्युर्वर्णयुक्तानि रसगन्धयुतानि च॥ १०**प्रह्लादने कहा—**बले! श्रद्धासे भरे और भक्तिसे युक्त होकर जनार्दनके उद्देश्यसे जो दान दिये जाते हैं, उन्हें मुनियोंने कभी भी विनाश न होनेवाला (दान) कहा है। वे ही तिथियाँ प्रशंसनीय होती हैं, जिनमें मनुष्य विष्णुकी पूजा करनेके बाद उनमें चित्त एवं मन लगाकर उपवास करता है। ब्राह्मणोंकी पूजा करनेसे जनार्दनकी (ही) पूजा होती है। उनसे वैर करनेवाले मूढ़ व्यक्ति निश्चय ही नरकमें जाते हैं। विष्णुमें अनुराग रखनेवाले भक्तिमान् मनुष्यको श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। पूर्वकालमें विष्णुने यह कहा था कि ब्राह्मण मेरे शरीर हैं। ज्ञानी (हो) अथवा अज्ञानी, (पर) ब्राह्मणका तिरस्कार (कभी) नहीं करना चाहिये। वह विष्णुका शरीर होता है। अतः उसकी पूजा करनी चाहिये। (जहाँतक विष्णुपूजाके लिये पुष्पका प्रश्न है,)
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