भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ९४ ] बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान ४७१


श्लोकअर्थ
विशेषतः प्रवक्ष्यामि पुष्पाणि तिथयस्तथा।<br>दानानि च प्रशस्तानि माधवप्रीणनाय तु॥ ११महासुर! वर्ण, रस एवं गन्धसे युक्त पुष्प ही उत्तम होते हैं। अब मैं माधवकी प्रसन्नताके लिये कहे गये विशेष पुष्पों, तिथियों एवं दानोंका (स्पष्टतासे) वर्णन करता हूँ॥ ५—११॥
जाती शताह्वा सुमनाः कुन्दं बहुपुटं तथा।<br>बाणं च चम्पकाशोकं करवीरं च यूथिका॥ १२<br>पारिभद्रं पाटला च बकुलं गिरिशालिनी।<br>तिलकं च जपाकुसुमं पीतकं नागरं त्वपि॥ १३<br>एतानि हि प्रशस्तानि कुसुमान्यच्युतार्चने।<br>सुरभीणि तथान्यानि वर्जयित्वा तु केतकीम्॥ १४<br>बिल्वपत्रं शमीपत्रं पत्रं भृङ्गमृगाङ्कयोः।<br>तमालामलकीपत्रं शस्तं केशवपूजने॥ १५<br>येषामपि हि पुष्पाणि प्रशस्तान्यच्युतार्चने।<br>पल्लवान्यपि तेषां स्युः पत्राण्यर्चाविधौ हरेः॥ १६<br>वीरूधां च प्रवालेन बर्हिषा चार्चयेत्तथा।<br>नानारूपैश्चाम्बुभवैः कमलेन्दीवरादिभिः॥ १७<br>प्रवालैः शुचिभिः श्लक्ष्णैर्जलप्रक्षालितैर्बले।<br>वनस्पतीनामर्च्येत तथा दूर्वाग्रपल्लवैः॥ १८<br>चन्दनेनानुलिम्पेत कुङ्कुमेन प्रयत्नतः।<br>उशीरपद्मकाभ्यां च तथा कालीयकादिना॥ १९<br>महिषाख्यं कणं दारु सिह्नकं सागरुं सिता।<br>शङ्खं जातीफलं श्रीशे धूपानि स्युः प्रियाणि वै॥ २०अच्युत (श्रीविष्णु)-की अर्चनाके लिये—मालती, शतावरी, चमेली, कुन्द, गुलाब, बहुपुट, बाण, चम्पा, अशोक, कनेर, जूही, पारिभद्र, पाटल, मौलसिरी, गिरिशालिनी, तिलक, अड़हुल, पीतक एवं नागर नामक पुष्प उत्तम हैं। इनके सिवा केतकीको छोड़कर अन्य सुगन्धित पुष्प भी श्रेष्ठ हैं। केशवके पूजनमें बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृङ्ग एवं मृगाङ्कके पत्र, तमाल तथा आमलकीके पत्र प्रशंसनीय हैं। अच्युतके अर्चनमें जिन वृक्षोंके पुष्पोंका प्रयोग होता है उनके पल्लव एवं पत्र भी विष्णुके पूजनके लिये प्रशंसनीय होते हैं। वीरुधोंके किसलय एवं कुश तथा जलमें उत्पन्न होनेवाले अनेक प्रकारके कमल एवं इन्दीवरादिसे विष्णुका पूजन करना चाहिये। बले! वनस्पतियोंके चिकने, पवित्र एवं जलसे धोये हुए कोपलोंसे तथा दूबके अङ्कुरसे (विष्णुका) पूजन करना चाहिये। प्रयत्नपूर्वक चन्दन, कुङ्कुम, उशीर (खश) पद्मक एवं कालीयक आदिसे विष्णुका अनुलेपन करना चाहिये। श्रीविष्णुको महिष नामक कण, दारु, सिह्नक, अगरु, सिता, शङ्ख एवं जातीफलका धूप प्रिय होता है॥ १२—२०॥
हविषा संस्कृता ये तु यवगोधूमशालयः।<br>तिलमुद्गादयो माषा व्रीहयश्च प्रिया हरेः॥ २१<br>गोदानानि पवित्राणि भूमिदानानि चानघ।<br>वस्त्रान्नस्वर्णदानानि प्रीतये मधुघातिनः॥ २२<br>माघमासे तिला देयास्तिलधेनुश्च दानव।<br>इन्धनादीनि च तथा माधवप्रीणनाय तु॥ २३<br>फाल्गुने व्रीहयो मुद्गा वस्त्रकृष्णाजिनादिकम्।<br>गोविन्दप्रीणनार्थाय दातव्यं पुरुषर्षभैः॥ २४<br>चैत्रे चित्राणि वस्त्राणि शयनान्यासनानि च।<br>विष्णोः प्रीत्यर्थमेतानि देयानि ब्राह्मणेध्वथ॥ २५घृतसे संस्कृत जौ, गेहूँ, शालिधान्य, तिल, मूँग, उड़द और अन्न हरिको प्रिय हैं। हे निष्पाप! मधुसूदनको गौ, पवित्र भूमि, वस्त्र, अन्न और सोनेके दान प्रिय होते हैं। दानव! माघमासमें माधवकी प्रसन्नताके लिये तिल, तिलधेनु एवं इन्धनादिका दान करना चाहिये। महान् पुरुषोंको गोविन्दकी प्रीतिके लिये फाल्गुनमासमें चावल, मूँग, वस्त्र तथा कृष्णमृगचर्म दान करना चाहिये। चैत्रमासमें विष्णुकी प्रीतिके लिये ब्राह्मणोंकी भाँति-भाँतिके वस्त्र, शय्या एवं आसनोंका दान करना चाहिये।