वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गन्धमाल्यानि देयानि वैशाखे सुरभीणि वै।<br>देयानि द्विजमुख्येभ्यो मधुसूदनतुष्टये॥ २६<br><br>उदकुम्भाम्बुधेनुं च तालवृन्तं सुचन्दनम्।<br>त्रिविक्रमस्य प्रीत्यर्थं दातव्यं साधुभिः सदा॥ २७<br><br>उपानद्युगलं छत्रं लवणामलकादिकम्।<br>आषाढे वामनप्रीतै दातव्यानि तु भक्तितः॥ २८ | मधुसूदनकी प्रीतिके लिये वैशाखमासमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुगन्धित गन्ध एवं माल्योंका दान करना चाहिये। त्रिविक्रमकी प्रीतिके लिये सज्जन व्यक्तिको ज्येष्ठमासमें जलका घड़ा, जलधेनु, ताड़का पंखा तथा सुन्दर चन्दनका दान करना चाहिये। भगवान् वामनकी प्रीतिके लिये आषाढ़मासमें भक्तिपूर्वक जूतेका जोड़ा, छत्र, लवण एवं आँवले आदिका दान करना चाहिये॥ २१—२८॥ |
| घृतं च क्षीरकुम्भाश्च घृतधेनुफलानि च।<br>श्रावणे श्रीधरप्रीत्यै दातव्यानि विपश्चिता॥ २९<br><br>मासि भाद्रपदे दद्यात् पायसं मधुसर्पिषी।<br>हृषीकेशप्रीणनार्थं लवणं सगुडोदनम्॥ ३०<br><br>तिलास्तुरङ्गं वृषभं दधि ताम्रायसादिकम्।<br>प्रीत्यर्थं पद्मनाभस्य देयमाश्वयुजे नरैः॥ ३१<br><br>रजतं कनकं दीपान् मणिमुक्ताफलादिकम्।<br>दामोदरस्य तुष्ट्यर्थं प्रदद्यात् कार्तिके नरः॥ ३२<br><br>खरोष्ट्राश्वतरान् नागान् यानयुग्ममजाविकम्।<br>दातव्यं केशवप्रीत्यै मासि मार्गशिरे नरैः॥ ३३<br><br>प्रासादनगरादीनि गृहप्रावरणादिकम्।<br>नारायणस्य तुष्ट्यर्थं पौषे देयानि भक्तितः॥ ३४<br><br>दासीदासमलङ्कारमन्नं षड्रससंयुतम्।<br>पुरुषोत्तमस्य तुष्ट्यर्थं प्रदेयं सार्वकालिकम्॥ ३५<br><br>यद्यदिष्टतमं किंचिद्यद्वाप्यस्ति शुचि गृहे।<br>तत्तद्धि देयं प्रीत्यर्थं देवदेवाय चक्रिणे॥ ३६ | बुद्धिमान् मनुष्यको श्रीधरकी प्रसन्नताके लिये श्रावणमासमें घी और दूधसे भरे घड़े, घृत, धेनु एवं फलोंका दान करना चाहिये। भाद्रपदमासमें हृषीकेशकी प्रसन्नताके लिये पायस, मधु, घी, नमक और गुड़से बनाये गये मीठे भातका दान करना चाहिये। मनुष्योंको पद्मनाभकी प्रसन्नताके लिये आश्विनमासमें तिल, घोड़ा, बैल, दही, ताँबा और लोहे आदिका दान करना चाहिये। मनुष्योंको दामोदरकी संतुष्टिके लिये कार्तिक-मासमें चाँदी, सोना, दीप, मणि, मुक्ता और फल आदिका दान करना चाहिये। मनुष्योंको केशवकी प्रीतिके लिये मार्गशीर्ष (अगहन)-मासमें खर, उष्ट्र, खच्चर, हाथी, सामान ढोनेवाला बकरा एवं भेड़्का दान करना चाहिये। नारायणकी संतुष्टिके लिये पौषमासमें श्रद्धापूर्वक प्रासाद, नगर, गृह एवं ओढ़नेके वस्त्र आदिका दान करना चाहिये। पुरुषोत्तमकी संतुष्टिके लिये सभी समय दासी, दास, आभूषण एवं मधुर आदि षट् रसोंसे युक्त अन्नका दान करना चाहिये। चक्र धारण करनेवाले देवाधिदेवकी प्रसन्नताके लिये अपनी जो सबसे अधिक इच्छित वस्तु हो अथवा घरमें जो वस्तु पवित्र हो उसका दान करना चाहिये॥ २९—३६॥ |
| यः कारयेन्मन्दिरं केशवस्य<br>पुण्याँल्लोकान् स जयेच्छाश्वतान् वै।<br>दत्त्वारामान् पुष्पफलाभिपन्नान्<br>भोगान् भुङ्क्ते कामतः श्लाघनीयान्॥ ३७ | केशवभगवान्का मन्दिर-निर्माण करानेवाला मनुष्य सतत स्थायी पुण्यलोकोंको प्राप्त करता है। फूल-फलवाले वाटिकाओंका दान करनेवाला इच्छानुसार प्रशंसनीय भोगोंका उपभोग करता है। |
| पितामहस्य पुरतः कुलान्यष्टौ तु यानि च।<br>तारयेदात्मना सार्धं विष्णोर्मन्दिरकारकः॥ ३८ | विष्णुभगवान्के मन्दिरका निर्माण करानेवाला पुरुष अपने पितामहसे आगेके आठ कुलपुरुषोंका उद्धार करता है। |