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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

| ४७२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १४ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गन्धमाल्यानि देयानि वैशाखे सुरभीणि वै।<br>देयानि द्विजमुख्येभ्यो मधुसूदनतुष्टये॥ २६<br><br>उदकुम्भाम्बुधेनुं च तालवृन्तं सुचन्दनम्।<br>त्रिविक्रमस्य प्रीत्यर्थं दातव्यं साधुभिः सदा॥ २७<br><br>उपानद्युगलं छत्रं लवणामलकादिकम्।<br>आषाढे वामनप्रीतै दातव्यानि तु भक्तितः॥ २८मधुसूदनकी प्रीतिके लिये वैशाखमासमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुगन्धित गन्ध एवं माल्योंका दान करना चाहिये। त्रिविक्रमकी प्रीतिके लिये सज्जन व्यक्तिको ज्येष्ठमासमें जलका घड़ा, जलधेनु, ताड़का पंखा तथा सुन्दर चन्दनका दान करना चाहिये। भगवान् वामनकी प्रीतिके लिये आषाढ़मासमें भक्तिपूर्वक जूतेका जोड़ा, छत्र, लवण एवं आँवले आदिका दान करना चाहिये॥ २१—२८॥
घृतं च क्षीरकुम्भाश्च घृतधेनुफलानि च।<br>श्रावणे श्रीधरप्रीत्यै दातव्यानि विपश्चिता॥ २९<br><br>मासि भाद्रपदे दद्यात् पायसं मधुसर्पिषी।<br>हृषीकेशप्रीणनार्थं लवणं सगुडोदनम्॥ ३०<br><br>तिलास्तुरङ्गं वृषभं दधि ताम्रायसादिकम्।<br>प्रीत्यर्थं पद्मनाभस्य देयमाश्वयुजे नरैः॥ ३१<br><br>रजतं कनकं दीपान् मणिमुक्ताफलादिकम्।<br>दामोदरस्य तुष्ट्यर्थं प्रदद्यात् कार्तिके नरः॥ ३२<br><br>खरोष्ट्राश्वतरान् नागान् यानयुग्ममजाविकम्।<br>दातव्यं केशवप्रीत्यै मासि मार्गशिरे नरैः॥ ३३<br><br>प्रासादनगरादीनि गृहप्रावरणादिकम्।<br>नारायणस्य तुष्ट्यर्थं पौषे देयानि भक्तितः॥ ३४<br><br>दासीदासमलङ्कारमन्नं षड्रससंयुतम्।<br>पुरुषोत्तमस्य तुष्ट्यर्थं प्रदेयं सार्वकालिकम्॥ ३५<br><br>यद्यदिष्टतमं किंचिद्यद्वाप्यस्ति शुचि गृहे।<br>तत्तद्धि देयं प्रीत्यर्थं देवदेवाय चक्रिणे॥ ३६बुद्धिमान् मनुष्यको श्रीधरकी प्रसन्नताके लिये श्रावणमासमें घी और दूधसे भरे घड़े, घृत, धेनु एवं फलोंका दान करना चाहिये। भाद्रपदमासमें हृषीकेशकी प्रसन्नताके लिये पायस, मधु, घी, नमक और गुड़से बनाये गये मीठे भातका दान करना चाहिये। मनुष्योंको पद्मनाभकी प्रसन्नताके लिये आश्विनमासमें तिल, घोड़ा, बैल, दही, ताँबा और लोहे आदिका दान करना चाहिये। मनुष्योंको दामोदरकी संतुष्टिके लिये कार्तिक-मासमें चाँदी, सोना, दीप, मणि, मुक्ता और फल आदिका दान करना चाहिये। मनुष्योंको केशवकी प्रीतिके लिये मार्गशीर्ष (अगहन)-मासमें खर, उष्ट्र, खच्चर, हाथी, सामान ढोनेवाला बकरा एवं भेड़्का दान करना चाहिये। नारायणकी संतुष्टिके लिये पौषमासमें श्रद्धापूर्वक प्रासाद, नगर, गृह एवं ओढ़नेके वस्त्र आदिका दान करना चाहिये। पुरुषोत्तमकी संतुष्टिके लिये सभी समय दासी, दास, आभूषण एवं मधुर आदि षट् रसोंसे युक्त अन्नका दान करना चाहिये। चक्र धारण करनेवाले देवाधिदेवकी प्रसन्नताके लिये अपनी जो सबसे अधिक इच्छित वस्तु हो अथवा घरमें जो वस्तु पवित्र हो उसका दान करना चाहिये॥ २९—३६॥
यः कारयेन्मन्दिरं केशवस्य<br>पुण्याँल्लोकान् स जयेच्छाश्वतान् वै।<br>दत्त्वारामान् पुष्पफलाभिपन्नान्<br>भोगान् भुङ्क्ते कामतः श्लाघनीयान्॥ ३७केशवभगवान्का मन्दिर-निर्माण करानेवाला मनुष्य सतत स्थायी पुण्यलोकोंको प्राप्त करता है। फूल-फलवाले वाटिकाओंका दान करनेवाला इच्छानुसार प्रशंसनीय भोगोंका उपभोग करता है।
पितामहस्य पुरतः कुलान्यष्टौ तु यानि च।<br>तारयेदात्मना सार्धं विष्णोर्मन्दिरकारकः॥ ३८विष्णुभगवान्के मन्दिरका निर्माण करानेवाला पुरुष अपने पितामहसे आगेके आठ कुलपुरुषोंका उद्धार करता है।
अध्याय ९४ ]बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान४७३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इमाश्च पितरो दैत्य गाथा गायन्ति योगिनः।<br>पुरतो यदुसिंहस्य ज्यामघस्य तपस्विनः॥ ३९<br><br>अपि नः स कुले कश्चिद् विष्णुभक्तो भविष्यति।<br>हरिमन्दिरकर्ता यो भविष्यति शुचिव्रतः॥ ४०<br><br>अपि नः सन्ततौ जायेद् विष्ण्वालयविलेपनम्।<br>सम्मार्जनं च धर्मात्मा करिष्यति च भक्तितः॥ ४१<br><br>अपि नः सन्ततौ जातो ध्वजं केशवमन्दिरे।<br>दास्यते देवदेवाय दीपं पुष्पानुलेपनम्॥ ४२<br><br>महापातकयुक्तो वा पातकी चोपपातकी।<br>विमुक्तपापो भवति विष्ण्वायतनचित्रकृत्॥ ४३दैत्य! पितरोंने यदुश्रेष्ठ योगी एवं तपस्वी ज्यामघके सामने इस गाथाका वर्णन किया था। क्या हमारे कुलमें पवित्र व्रत धारण करनेवाला इस प्रकारका कोई विष्णुभक्त उत्पन्न होगा जो हरिका मन्दिर बनवायेगा ? क्या हमारी सन्ततिमें कोई विष्णुमन्दिरमें श्रद्धापूर्वक चूने आदिसे सफाई करानेवाला और झाड़ू देनेवाला धार्मिक उत्पन्न होगा ? क्या हमारी सन्ततियोंमें ऐसा कोई होगा जो केशवके मन्दिरमें ध्वजाका दान करेगा और देवदेवेश्वरको दीप, पुष्प और सुगन्धित चन्दन आदि प्रदान करेगा ? महापातकी, पातकी अथवा उपपातकी व्यक्ति विष्णुमन्दिरको भाँति-भाँतिके रंगोंसे सजाकर अथवा दिव्य चित्र बनाकर पापसे मुक्त हो जाता है॥ ३७—४३॥
इत्थं पितॄणां वचनं श्रुत्वा नृपतिसत्तमः।<br>चकारायतनं भूम्यां स्वयं च लिम्पतासुर॥ ४४<br><br>विभूतिभिः केशवस्य केशवाराधने रतः।<br>नानाधातुविकारैश्च पञ्चवर्णैश्च चित्रकैः॥ ४५<br><br>ददौ दीपानि विधिवद् वासुदेवालये वले।<br>सुगन्धितैलपूर्णानि घृतपूर्णानि च स्वयम्॥ ४६<br><br>नानावर्णा वैजयन्त्यो महारजनरञ्जिताः।<br>मञ्जिष्ठा नवरङ्गीयाः श्वेतपाटलिकाश्रिताः॥ ४७<br><br>आरामा विविधा हृद्याः पुष्पाढ्याः फलशालिनः।<br>लतापल्लवसंछन्ना देवदारुभिरावृताः॥ ४८<br><br>कारिताश्च महामञ्चाधिष्ठिताः कुशलैर्जनैः।<br>पौरोगवविधानज्ञै रत्नसंस्कारिभिर्दृढैः॥ ४९<br><br>तेषु नित्यं प्रपूज्यन्ते यतयो ब्रह्मचारिणः।<br>श्रोत्रिया ज्ञानसम्पन्ना दीनान्धविकलादयः॥ ५०<br><br>इत्थं स नृपतिः कृत्वा श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>ज्यामघो विष्णुनिलयं गत इत्यनुशुश्रुमः॥ ५१असुर! पितृगणके इस प्रकारके वचनको सुनकर उस नृपश्रेष्ठने पृथ्वीपर मन्दिरका निर्माण करवाया। वह स्वयं उसमें चूने आदिसे सफाई तथा धोना-पोंछना आदि करता था। वह केशवकी विभूतियों, नाना प्रकारकी धातुओंसे निर्मित वस्तुओं तथा पाँच वर्णके तिलकोंसे पूजा करने लगा। बले! उसने वासुदेवके मन्दिरमें स्वयं विधिपूर्वक सुगन्धित तैल एवं घीसे भरे दीपकका दान किया। (उसने विष्णुमन्दिरमें) कुसुम्भ मजीठके रंगमें रँगे श्वेत एवं लाल वर्णके तथा नौ रंगोंवाले भाँति-भाँतिके ध्वजोंको आरोपित किया। (उसने) पुष्पों, फलों, लतापल्लवों तथा देवदारु आदि भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे पूर्ण उद्यानोंका निर्माण कराया। पाकशालाके अध्यक्षके विधानको जाननेवाले एवं रत्नोंसे अलंकृत करनेवाले अत्यन्त कुशल पुरुषोंसे अधिष्ठित बड़े-बड़े मञ्चोंका निर्माण करवाया। उनमें प्रतिदिन यतियों, ब्रह्मचारियों, श्रोत्रियों, ज्ञानियों, दीनों, अन्धों एवं विकलांगों—लँगड़े-लूले आदि पुरुषोंका सत्कार होता था। हमलोगोंने सुना है कि ऐसा कार्य करनेसे श्रद्धावान् और जितेन्द्रिय राजा ज्यामघने विष्णुलोकको प्राप्त कर लिया॥ ४४—५१॥
४७४श्रीवामनपुराण[ अध्याय १४

| तमेव चाद्यापि बले मार्गं ज्यामघकारितम्।<br>व्रजन्ति नरशार्दूल विष्णुलोकजिगीषवः॥ ५२<br>तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र कारयस्वालयं हरेः।<br>तमर्चयस्व यत्नेन ब्राह्मणांश्च बहुश्रुतान्।<br>पौराणिकान् विशेषेण सदाचाररताञ् शुचीन् ॥ ५३<br>वासोभिर्भूषणै रत्नैर्गोभिर्भूकनकादिभिः।<br>विभवे सति देवस्य प्रीणनं कुरु चक्रिणः ॥ ५४<br>एवं क्रियायोगरतस्य तेऽद्य<br>नूनं मुरारिः शुभदो भविष्यति।<br>नरा न सीदन्ति बले समाश्रिता<br>विभुं जगन्नाथमनन्तमच्युतम् ॥ ५५ | बले! विष्णुलोककी प्राप्तिकी कामना करनेवाले पुरुष आज भी राजा ज्यामघद्वारा प्रदर्शित उसी मार्गका आश्रय लेते हैं। इसलिये राजेन्द्र! तुम भी हरिका मन्दिर बनवाओ और प्रयत्नपूर्वक उन हरि, बहुश्रुत ब्राह्मणों एवं विशेष रूपसे सदाचारपरायण पवित्र पुराण जानने और प्रवचन करनेवालोंका पूजन करो। ऐश्वर्य रहनेपर वस्त्र, आभूषण, रत्न, गौ, पृथ्वी एवं स्वर्ण आदि (-के दान)-द्वारा चक्रधर विष्णुको प्रसन्न करो। तुम्हारे इस प्रकारकी क्रिया करनेमें तत्पर रहनेपर मुरारि निश्चय ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। बले! विभु जगन्नाथ अनन्त अच्युतका आश्रय ग्रहण करनेवाले व्यक्ति दुःखी नहीं होते॥ ५२—५५॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दितीश्वरो<br>वैरोचनं सत्यमनुत्तमं हि।<br>सम्पूजितस्तेन विमुक्तिमायौ<br>सम्पूर्णकामो हरिपादभक्तः ॥ ५६<br>गते हि तस्मिन् मुदिते पितामहे<br>बलेर्बभौ मन्दिरमिन्दुवर्णम्।<br>महेन्द्रशिल्पिप्रवरोऽथ केशवं<br>स कारयामास महामहीयान् ॥ ५७<br>स्वयं स्वभार्यासहितश्चकार<br>देवालये मार्जनलेपनादिकाः।<br>क्रिया महात्मा यवशर्कराद्या<br>बलिं चकाराप्रतिमां मधुद्रुहः ॥ ५८<br>दीपप्रदानं स्वयमायताक्षी<br>विन्ध्यावली विष्णुगृहे चकार।<br>गेयं स धर्म्यश्रवणं च धीमान्<br>पौराणिकैर्विप्रवरैरकारयत् ॥ ५९ | **पुलस्त्यजी बोले—**बलिसे इस प्रकार सत्य तथा श्रेष्ठ वचन कहनेके बाद विष्णुभगवान्‌के चरणोंमें अनुराग रखनेवाले सफलमनोरथ दितीश्वर प्रह्लाद बलिद्वारा किये गये सत्कारको ग्रहण कर मोक्षमार्गकी ओर प्रस्थित हो गये। पितामह प्रह्लादके प्रसन्न होकर चले जानेपर बलिका महल चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित होने लगा। महामहिम उस (बलि)-ने विश्वकर्मासे केशवका मन्दिर निर्मित करवाया। बलि स्वयं अपनी पत्नीके साथ उस देवालयमें मार्जन, लेपन आदि क्रियाएँ करने लगा। मधुसूदनके लिये महात्मा बलिने जौ एवं शक्कर आदिका उत्तम नैवेद्य निवेदित किया। विशालनयना विन्ध्यावली स्वयं विष्णुमन्दिरमें दीपदान करने लगी। बुद्धिमान् बलि पुराणवेत्ता श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे धार्मिक प्रवचन करवाने लगा॥ ५६—५९॥ | | तथाविधस्यासुरपुङ्गवस्य<br>धर्म्ये सुमार्गे प्रतिसंस्थितस्य।<br>जगत्पतिर्दिव्यवपुर्जनार्दन-<br>स्तस्थौ महात्मा बलिरक्षणाय ॥ ६० | उस प्रकारके धर्ममार्गमें स्थित रहनेवाले असुरोंमें श्रेष्ठ बलिकी रक्षाके लिये दिव्य शरीर धारण करनेवाले जगत्पति परमात्मा जनार्दन (वहाँ) विराजने लगे। |

| अध्याय ९४ ] | बलिक्रा प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान | ४७५ | | :--- | :--- |

| सूर्यायुताभं मुसलं प्रगृह्य<br>  निघ्नन् स दुष्टानरियूथपालान्।<br>द्वारि स्थितो न प्रददौ प्रवेशं<br>  प्राकारगुप्ते बलिनो गृहे तु ॥ ६१<br><br>द्वारि स्थिते धातरि रक्षपाले<br>  नारायणे सर्वगुणाभिरामे।<br>प्रासादमध्ये हरिमीशितार-<br>  मभ्यर्चयामास सुरर्षिमुख्यम् ॥ ६२<br><br>स एवमास्ते सुरराड् बलिस्तु<br>  समर्चयन् वै हरिपादपङ्कजौ।<br>सस्मार नित्यं हरिभाषितानि<br>  स तस्य जातो विनयाङ्कुशस्तु ॥ ६३ | वे द्वारपर रहते हुए दस हजार सूर्योंके समान तेजवाले मुसलको लेकर दुष्ट शत्रुओंके यूथपतियोंका संहार करते एवं प्राचीर (परकोटा)-से रक्षित बलिके भवनमें किसीको प्रवेश नहीं करने देते थे। सभी गुणोंसे सुन्दर लगनेवाले विधाता नारायणके द्वारपाल होनेपर बलि भी अपने महलके भीतर निरन्तर सुरों एवं ऋषियोंमें सर्वश्रेष्ठ नियमनकर्ता हरिका पूजन करने लगा। असुर-राज बलि इस प्रकार हरिके चरणकमलोंका अर्चन करते हुए नित्य हरिके वचनोंका स्मरण किया करता था। वह (नियम) उसके लिये विनयका अङ्कुश हो गया ॥ ६०-६३॥ | | इदं च वृत्तं स पपाठ दैत्यराद्<br>  स्मरन् सुवाक्यानि गुरोः शुभानि।<br>तथ्यानि पथ्यानि परत्र चेह<br>  पितामहस्येन्द्रसमस्य वीरः ॥ ६४<br><br>ये वृद्धवाक्यानि समाचरन्ति<br>  श्रुत्वा दुरुक्तान्यपि पूर्वतस्तु।<br>स्निग्धानि पश्चान्नवनीतशुद्धा<br>  मोदन्ति ते नात्र विचारमस्ति ॥ ६५<br><br>आपद्भुजंगदष्टस्य मन्त्रहीनस्य सर्वदा।<br>वृद्धवाक्यौषधा नूनं कुर्वन्ति किल निर्विषम् ॥ ६६<br><br>वृद्धवाक्यामृतं पीत्वा तदुक्तमनुमान्य च।<br>या तृप्तिर्जायते पुंसां सोमपाने कुतस्तथा ॥ ६७<br><br>आपत्तौ पतितानां येषां वृद्धा न सन्ति शास्तारः।<br>ते शोच्या बन्धूनां जीवन्तोऽपीह मृततुल्याः स्युः ॥ ६८<br><br>आपद्ग्राहगृहीतानां वृद्धाः सन्ति न पण्डिताः।<br>येषां मोक्षयितारो वै तेषां शान्तिर्न विद्यते ॥ ६९<br><br>आपज्जलनिमग्नानां हियतां व्यसनोर्मिभिः।<br>वृद्धवाक्यैर्विना नूनं नैवोत्तारं कथंचन ॥ ७०<br><br>तस्माद् यो वृद्धवाक्यानि शृणुयाद् विदधाति च।<br>स सद्यः सिद्धिमाप्नोति यथा वैरोचनो बलिः ॥ ७१ | इन्द्रके समान श्रेष्ठ अपने पितामहके कल्याणप्रद इस लोक तथा परलोकमें कल्याणकारी एवं सुन्दर तथ्य वचनोंका स्मरण करते हुए वह वीर दैत्यराज इस वृत्तका पाठ (आवृत्ति) करता था। पूर्वमें कठोरतापूर्वक कहे गये और बादमें नवनीतके समान स्निग्ध (कोमल) एवं शुद्ध वृद्धवाक्योंका श्रवण कर तदनुसार आचरण करनेवाले निस्सन्देह आनन्द प्राप्त करते हैं। वृद्धवाक्यरूपी ओषधि आपत्तीरूपी सर्पसे दंशित मन्त्रहीन पुरुषको निस्सन्देह विषसे रहित कर देती है। वृद्धवचनरूपी अमृतको पीने एवं उनके कथनके अनुसार आचरण करनेसे मनुष्योंको जो तृप्ति होती है वैसी तृप्ति सोमपानमें कहाँ है? वृद्धजन आपत्तिमें पड़े हुए जिन मनुष्योंका शासन (मार्गदर्शन) नहीं करते वे बन्धुओंके लिये शोचनीय तथा जीवित ही मरे हुएके समान होते हैं। आपत्तिरूपी ग्राहसे ग्रस्त जिन व्यक्तियोंको वृद्ध ज्ञानी लोग (उससे) मुक्त करानेवाले नहीं होते उन्हें शान्तिकी प्राप्ति नहीं होती। आपत्तिरूपी जलमें डूबे और व्यसनरूपी लहरोंके थपेड़े खानेवाले पुरुषोंका उद्धार वृद्ध वचनके सिवा अन्य किसी भी प्रकार नहीं हो सकता। अतः वृद्धवचनको सुनने एवं तदनुसार आचरण करनेवाला मनुष्य विरोचन-पुत्र बलिके समान शीघ्र सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ६४-७१ ॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९४॥

४७६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९५

पंचानबेवाँ अध्याय

पुराण-वाचन, श्रावण-श्रवण और पठनकी फलश्रुति

| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले—नारदजी! मैंने आपसे इस अत्यन्त पावन पुराणका कथन किया है। इसको सुननेसे मनुष्य उत्तम यश और भक्तिसे सम्पन्न होकर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। जैसे गङ्गाजलमें स्नान करनेसे सारे पाप धुल जाते हैं, वैसे ही इस पुराणका श्रवण करनेसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मन्! वामनपुराणका श्रवण करनेवाले मनुष्यके शरीर एवं कुलमें रोग तथा अभिचार-कर्म (मारण, मोहन, उच्चाटन आदि)-से उत्पन्न घातक प्रभाव नहीं होता। विनयपूर्वक विष्णुका अर्चन करते हुए श्रद्धासे विधानके अनुसार नित्य इस पुराणके सुननेवाले मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे दक्षिणाके सहित अश्वमेध-यज्ञ करने तथा सोना, भूमि, अश्व, गौ, हाथी तथा रथके दानका फल प्राप्त होता है। इस (पुराण)-का एक चरण (भाग) भी सुननेवाला पुरुष तथा स्त्री पृथ्वीमें पावन एवं अत्यन्त पुण्यवान् हो जाता है॥ १-५॥ | | एतन्मया पुण्यतमं पुराणं<br>तुभ्यं तथा नारद कीर्तितं वै।<br>श्रुत्वा च कीर्त्या परया समेतो<br>भक्त्या च विष्णोः पदमभ्युपैति॥ १<br>यथा पापानि पूयन्ते गङ्गावारिविगाहनात्।<br>तथा पुराणश्रवणाद् दुरितानां विनाशनम्॥ २<br>न तस्य रोगा जायन्ते न विषं चाभिचारिकम्।<br>शरीरे च कुले ब्रह्मन् यः शृणोति च वामनम्॥ ३<br>शृणोति नित्यं विधिवच्च भक्त्या<br>सम्पूजयन् यः प्रणतश्च विष्णुम्।<br>स चाश्वमेधस्य सदक्षिणस्य<br>फलं समग्रं परिहीनपापः॥ ४<br>प्राप्नोति दत्तस्य सुवर्णभूमे-<br>रश्वस्य गोनागरथस्य चैव।<br>नारी नरश्चापि च पादमेकं<br>शृण्वन् शुचिः पुण्यतमः पृथिव्याम्॥ ५ | | | स्नाने कृते तीर्थवरे सुपुण्ये<br>गङ्गाजले नैमिषपुष्करे वा।<br>कोकामुखे यत् प्रवदन्ति विप्राः<br>प्रयागमासाद्य च माघमासे॥ ६<br>स तत्फलं प्राप्य च वामनस्य<br>संकीर्तयन् नान्यमनाः पदं हि।<br>गच्छेन्मया नारद तेऽद्य चोक्तं<br>यद् राजसूयस्य फलं प्रयच्छेत्॥ ७ | ब्राह्मणलोग अत्यन्त पवित्र श्रेष्ठ तीर्थके जल, गङ्गाजल, नैमिषारण्य, पुष्कर, कोकामुख तथा माघमासमें प्रयागमें जाकर स्नान करनेसे जिस फलकी प्राप्तिका होना बतलाते हैं, एकाग्रमनसे वामनपुराणके एक चरणका कीर्तन करते हुए यात्रा करनेवाले पुरुषको (भी) वही फल प्राप्त होता है। नारदजी! मैंने आज आपसे उस पुराणको कहा है, जो राजसूययज्ञका फल देनेवाला है। | | यद भूमिलोके सुरलोकलभ्ये<br>महत्सुखं प्राप्य नरः समग्रम्।<br>प्राप्नोति चास्य श्रवणान्महर्षे<br>सौत्रामणेर्नास्ति च संशयो मे॥ ८ | महर्षे! मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसको सुननेसे मनुष्य पृथ्वी एवं देवलोकमें प्राप्त होने योग्य सारे महान् सुखोंको प्राप्तकर सौत्रामणि नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है। |

अध्याय ९५ ] पुराण-वाचन, श्रावण-श्रवण और पठनकी फलश्रुति ४७७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रत्नस्य दानस्य च यत्फलं भवेद्<br>यत्सूर्यस्य चेन्दोर्ग्रहणे च राहोः।<br>अन्नस्य दानेन फलं यथोक्तं<br>बुभुक्षिते विप्रवरे च साग्निके॥ ९<br><br>दुर्भिक्षसम्पीडितपुत्रभार्ये<br>यामी सदा पोषणतत्परे च।<br>देवाग्निविप्रर्षिरते च पित्रोः<br>शुश्रूषके भ्रातरि ज्येष्ठसाम्ग्रे।<br>यत्तत्फलं सम्प्रवदन्ति देवाः<br>स तत् फलं लभते चास्य पाठात्॥ १०देवगण रत्नदान, राहुद्वारा सूर्य एवं चन्द्रके ग्रस्त होनेके समय किये गये दान, भूखे, अग्निहोत्री, उत्तम ब्राह्मणको दिये गये अन्नदान, अकालसे पीडित, पुत्र, पत्नी एवं भाई-बन्धुके पोषणमें तत्पर पुरुषको दिये गये दान, देवता, अग्नि एवं ब्राह्मणकी सेवामें लगे रहनेवाले व्यक्तिको तथा माता-पिता और ज्येष्ठ भाईको दिये गये दानसे जिस फलका प्राप्त होना बतलाते हैं, वह फल मनुष्य इस (वामनपुराण)-का पाठ करनेसे प्राप्त कर लेता है॥ ६-१०॥
चतुर्दशं वामनमाहुरग्र्यं<br>श्रुते च यस्याघचयश्च नाशम्।<br>प्रयान्ति नास्त्यत्र च संशयो मे<br>महान्ति पापान्यापि नारदाशु॥ ११<br><br>पाठात् संश्रवणाद् विप्र श्रावणादपि कस्यचित्।<br>सर्वपापानि नश्यन्ति वामनस्य सदा मुने॥ १२<br><br>इदं रहस्यं परमं तवोक्तं<br>न वाच्यमेतद्धरिभक्तिवर्जिते।<br>द्विजस्य निन्दारतिहीनदक्षिणे<br>सहेतुवाक्यावृतपापसत्त्वे ॥ १३<br><br>नमो नमः कारणवामनाय<br>नाराणायामितविक्रमाय ।<br>श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ १४<br><br>इत्थं वदेद् यो नियतं मनुष्यः कृष्णभावनः।<br>तस्य विष्णुः पदं मोक्षं ददाति सुरपूजितः॥ १५<br><br>वाचकाय प्रदातव्यं गोभूस्वर्णविभूषणम्।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं कुर्वन् श्रवणनाशकम्॥ १६<br><br>त्रिसन्ध्यं च पठन् शृण्वन् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>असूयारहितं विप्र सर्वसम्पत्प्रदायकम्॥ १७नारदजी! वामनपुराण पुराणोंमें चौदहवाँ उत्तम पुराण है। इसमें मुझे सन्देह नहीं है कि इसका श्रवण करनेसे पापोंका समुदाय एवं महापातक भी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। मुने! ब्राह्मणदेव! वामनपुराणका पाठ कहने, सुनने एवं सुनानेसे सर्वदा सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। मैंने आपसे यह परम रहस्य कहा है। इसे भगवान्‌की भक्तिसे रहित व्यक्तिके एवं ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाले आचारहीन तथा तर्कशील पापी मनुष्यके सामने नहीं कहना चाहिये। देवोंके कारण वामनरूप धारण करनेवाले अमित पराक्रमी श्रीनारायण भगवान्‌को नमस्कार है, नमस्कार है और शार्ङ्ग, चक्र, खड्ग तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमभगवान्‌को नमस्कार है। इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णमें अपनी भावनाओंको समर्पित कर इस वामनपुराणका नित्य पाठ करता है, उसे देवताओंसे पूजित भगवान् विष्णु मोक्षपद प्रदान करते हैं। इस पुराणके बाँचनेवालेको (पुराणका पाठ करनेवालेको भी) गौ, पृथ्वी एवं स्वर्णके आभूषण प्रदान करने चाहिये। इसमें धनकी शठता (शक्तिसे कम दक्षिणा देना) नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे सुननेके फलका नाश हो जाता है। विप्रदेव! जलन, ईर्ष्या, रोष आदि दोषोंसे रहित होकर तीनों संध्याओंके समय समस्त पापोंके विनाश करनेवाले इस पुराणका पाठ करने एवं श्रवण करनेसे सभी प्रकारकी सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं॥ ११-१७॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥
॥ श्रीवामनपुराण समाप्त॥

गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण-साहित्य

**श्रीमद्भागवतमहापुराण, व्याख्यासहित (कोड 26, 27) ग्रन्थाकार—**श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मयका मुकुटमणि है। भगवान् शुकदेवद्वारा महाराज परीक्षित्‌को सुनाया गया भक्तिमार्गका तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोकमें श्रीकृष्ण-प्रेमकी सुगन्धि है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थरत्न मूलके साथ हिन्दी-अनुवाद, पूजन-विधि, भागवत-माहात्म्य, आरती, पाठके विभिन्न प्रयोगोंके साथ दो खण्डोंमें उपलब्ध है। पत्राकारकी तरह बेड़िया (कोड 1951, 1552) सचित्र, सजिल्द, (कोड 1552, 1553) गुजराती, (कोड 1678, 1735) सानुवाद, मराठी, (कोड 1739, 1740), कन्नड़, (कोड 1577, 1744) बँगला, (कोड 1966, 1967, 1968) तमिल, (कोड 1831, 1832) ओड़िआ, (कोड 1975, 1976) तेलुगु, (कोड 564, 565) अंग्रेजी-अनुवाद, (कोड 25) केवल हिन्दी बृहदाकार, बड़े टाइपमें, (कोड 1945) (वि० सं०) केवल हिन्दी (कोड 1930) केवल हिन्दी, (कोड 1608) केवल गुजराती, (कोड 29) मूल, मोटा टाइप, संस्कृत, ग्रन्थाकार (कोड 1573) मूल, मोटा टाइप, तेलुगु, ग्रन्थाकार (कोड 124) मूल मझला आकार, (कोड 1855) विशिष्ट सं० मूल, मझला संस्कृतमें भी।

**संक्षिप्त शिवपुराण, मोटा टाइप (कोड 789) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें परात्पर ब्रह्म शिवके कल्याणकारी स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासनाका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द, विशिष्ट संस्करण (कोड 1468) हिन्दी एवं (कोड 1286) गुजरातीमें भी उपलब्ध।

**संक्षिप्त पद्मपुराण (कोड 44) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें भगवान् विष्णुकी विस्तृत महिमाके साथ, भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके चरित्र, विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य, शालग्रामका स्वरूप, तुलसी-महिमा, गीता माहात्म्य, विष्णुसहस्रनाम, उपासना-विधि तथा विभिन्न व्रतोंका सुन्दर वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण (कोड 539) ग्रन्थाकार—**भगवतीकी विस्तृत महिमाका परिचय देनेवाले इस पुराणमें दुर्गासप्तशतीकी कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्रकी कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूयाकी कथा, दत्तात्रेय-चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओंका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

**श्रीविष्णुपुराण, अनुवादसहित (कोड 48) ग्रन्थाकार—**इसके प्रतिपाद्य भगवान् विष्णु हैं, जो सृष्टिके आदिकारण, नित्य, अक्षय, अव्यय तथा एकरस हैं। इसमें आकाश आदि भूतोंका परिमाण, समुद्र, सूर्य आदिका परिमाण, पर्वत, देवतादिकी उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियोंके चरित्रका विशद वर्णन है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1364) केवल हिन्दी अनुवादमें भी उपलब्ध।

**संक्षिप्त नारदपुराण (कोड 1183) ग्रन्थाकार—**इसमें सदाचार-महिमा, वर्णाश्रम धर्म, भक्ति तथा भक्तके लक्षण, देवपूजन, तीर्थ-माहात्म्य, दान-धर्मके माहात्म्य और भगवान् विष्णुकी महिमाके साथ अनेक भक्तिपरक उपाख्यानोंका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त स्कन्दपुराण (कोड 279) ग्रन्थाकार—**यह पुराण कलेवरकी दृष्टिसे सबसे बड़ा है तथा इसमें लौकिक और पारलौकिक ज्ञानके अनन्त उपदेश भरे हैं। इसमें भगवान् शिवकी महिमा, सती-चरित्र, शिव-पार्वती-विवाह, कार्तिकेय-जन्म, तारकासुर-वध एवं धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्तिके सुन्दर विवेचनके साथ-साथ अनेक साधु-महात्माओंके सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त ब्रह्मपुराण (कोड 1111) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें सृष्टिकी उत्पत्ति, पृथुका पावन चरित्र, सूर्य एवं चन्द्रवंशका वर्णन, श्रीकृष्णचरित्र, कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनिका चरित्र, तीर्थोंका माहात्म्य एवं अनेक भक्तिपरक आख्यानोंकी सुन्दर चर्चा की गयी है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त गरुडपुराण—(कोड 1189) ग्रन्थाकार—**इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान् विष्णु हैं। इसमें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्मकी महिमाके साथ यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि शुभ कर्मोंमें सर्व-साधारणको प्रवृत्त करनेके लिये अनेक लौकिक एवं पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त भविष्यपुराण—(कोड 584) ग्रन्थाकार—**यह पुराण विषय-वस्तु एवं वर्णन-शैलीकी दृष्टिसे अत्यन्त उच्च कोटिका है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष एवं आयुर्वेदशास्त्रके विषयोंका अद्भुत संग्रह है। वेताल-विक्रम-संवादके रूपमें कथा-प्रबन्ध इसमें अत्यन्त रमणीय है। इसके अतिरिक्त इसमें नित्यकर्म, सामुद्रिक शास्त्र, शान्ति तथा पौष्टिक कर्मका भी वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त श्रीवराहपुराण (कोड 1361) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें भगवान् श्रीहरिके वराह-अवतारकी मुख्य कथाके साथ-साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दान आदिका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण (कोड 631) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें चार खण्ड हैं—ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, श्रीकृष्णजन्मखण्ड और गणेशखण्ड। इसमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका विस्तृत वर्णन, अनेक रोचक एवं रहस्यमयी कथाएँ, श्रीराधाकी गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**वामनपुराण, अनुवादसहित (कोड 1432) ग्रन्थाकार—**यह पुराण मुख्यरूपसे त्रिविक्रम भगवान् विष्णुके दिव्य माहात्म्यका व्याख्याता है। इसमें भगवान् वामन, नर-नारायण, भगवती दुर्गाके उत्तम चरित्रके साथ-साथ भक्त प्रह्लाद तथा श्रीदामा आदि भक्तोंके बड़े रम्य आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।

**अग्निपुराण, केवल हिन्दी-अनुवाद (कोड 1362) ग्रन्थाकार—**इसमें परा-अपरा विद्याओंका वर्णन, महाभारतके सभी पर्वोंकी संक्षिप्त कथा, रामायणकी संक्षिप्त कथा, मत्स्य, कूर्म आदि अवतारोंकी कथाएँ, वास्तु-पूजा, विभिन्न देवताओंके मन्त्र आदि अनेक उपयोगी विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**मत्स्यमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 557)—**यह पुराण मत्स्यावतारके रूपमें भगवान् विष्णुकी लीलाओंका सुन्दर परिचायक है। इसमें मत्स्यावतारकी कथा, सृष्टि-वर्णन, मन्वन्तर तथा पितृवंश-वर्णन, ययाति-चरित्र, राजनीति, यात्राकाल, स्वप्नशास्त्र, शकुन-शास्त्र आदि अनेक विषयोंका सरल वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**कूर्मपुराण, अनुवादसहित (कोड 1131)—**इस पुराणमें भगवान्‌के कूर्मावतारकी कथाके साथ-साथ सृष्टि वर्णन, वर्ण, आश्रम और उनके कर्तव्यका वर्णन, युगधर्म, मोक्षके साधन, तीर्थ-माहात्म्य, २८ व्यासोंकी कथाएँ, ईश्वर-गीता, व्यास-गीता आदि विविध विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। विभिन्न दृष्टियोंसे इस पुराणका पठन-पाठन सबके लिये कल्याणकारी है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत-मोटा टाइप (कोड 1133) ग्रन्थाकार—**यह पुराण परम पवित्र वेदकी प्रसिद्ध श्रुतियोंके अर्थसे अनुमोदित, अखिल शास्त्रोंके रहस्यका स्रोत तथा आगमोंमें अपना प्रसिद्ध स्थान रखता है। यह सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, वंशानुकीर्ति, मन्वन्तर आदि पाँचों लक्षणोंसे पूर्ण है। पराम्बा भगवतीके पवित्र आख्यानोंसे युक्त इस पुराणका पठन-पाठन तथा अनुष्ठान भक्तोंके त्रितापोंका शमन करनेवाला तथा सिद्धियोंका प्रदाता है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1897, 1898) अनुवादसहित (कोड 1326) गुजराती।

**नरसिंहपुराण, अनुवादसहित (कोड 1113) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें दशावतारकी कथाएँ एवं सात काण्डोंमें भगवान् श्रीरामके पावन चरित्रके साथ-साथ सदाचार, राजनीति, वर्णधर्म, आश्रम-धर्म, योग-साधना आदिका सुन्दर विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवान् नरसिंहकी विस्तृत महिमा, अनेक कल्याणप्रद उपाख्यानोंका वर्णन, भौगोलिक वर्णन, सूर्य-चन्द्रादिसे उत्पन्न राजवंशोंका वर्णन तथा अनेक स्तुतियोंका उल्लेख है। सचित्र, सजिल्द।

महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण, अनुवादसहित (कोड 38) ग्रन्थाकार— हरिवंशपुराण वेदार्थ-प्रकाशक महाभारत ग्रन्थका अन्तिम पर्व है। पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे हरिवंशपुराणके श्रवणकी परम्परा भारतवर्षमें चिरकालसे प्रचलित है। भगवान् श्रीकृष्णसे सम्बन्धित अगणित कथाएँ इसमें ऐसी हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। धार्मिक जन-सामान्यके कल्याणार्थ इसके अन्तमें सन्तानगोपाल-मन्त्र, अनुष्ठान-विधि, सन्तान-गोपाल-यन्त्र तथा संतान-गोपालस्तोत्र भी संगृहीत हैं। सचित्र, सजिल्द। (कोड 1589) केवल हिन्दीमें भी।

**महाभागवत [देवीपुराण], अनुवादसहित (कोड 1610) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें मुख्य रूपसे भगवती महाशक्तिके माहात्म्य एवं उनके विभिन्न चरित्रोंका विस्तृत वर्णन है। इसमें मूल प्रकृति भगवतीके गङ्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, तुलसी आदि रूपोंमें विवर्तित होनेके मनोरम आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।

**लिङ्गमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 1985) संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी टीका—**यह पुराण भगवान् शिवकी उपासना एवं महिमाका विस्तृत परिचायक है। इसमें शैवदर्शन, पाशुपतयोग, लिङ्ग-स्वरूप, लिङ्ग-माहात्म्य, लिङ्गार्चन एवं योगाचार्यों तथा शिव भक्तोंकी कथाओंका सरस वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।