भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४७४श्रीवामनपुराण[ अध्याय १४

| तमेव चाद्यापि बले मार्गं ज्यामघकारितम्।<br>व्रजन्ति नरशार्दूल विष्णुलोकजिगीषवः॥ ५२<br>तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र कारयस्वालयं हरेः।<br>तमर्चयस्व यत्नेन ब्राह्मणांश्च बहुश्रुतान्।<br>पौराणिकान् विशेषेण सदाचाररताञ् शुचीन् ॥ ५३<br>वासोभिर्भूषणै रत्नैर्गोभिर्भूकनकादिभिः।<br>विभवे सति देवस्य प्रीणनं कुरु चक्रिणः ॥ ५४<br>एवं क्रियायोगरतस्य तेऽद्य<br>नूनं मुरारिः शुभदो भविष्यति।<br>नरा न सीदन्ति बले समाश्रिता<br>विभुं जगन्नाथमनन्तमच्युतम् ॥ ५५ | बले! विष्णुलोककी प्राप्तिकी कामना करनेवाले पुरुष आज भी राजा ज्यामघद्वारा प्रदर्शित उसी मार्गका आश्रय लेते हैं। इसलिये राजेन्द्र! तुम भी हरिका मन्दिर बनवाओ और प्रयत्नपूर्वक उन हरि, बहुश्रुत ब्राह्मणों एवं विशेष रूपसे सदाचारपरायण पवित्र पुराण जानने और प्रवचन करनेवालोंका पूजन करो। ऐश्वर्य रहनेपर वस्त्र, आभूषण, रत्न, गौ, पृथ्वी एवं स्वर्ण आदि (-के दान)-द्वारा चक्रधर विष्णुको प्रसन्न करो। तुम्हारे इस प्रकारकी क्रिया करनेमें तत्पर रहनेपर मुरारि निश्चय ही तुम्हारा कल्याण करेंगे। बले! विभु जगन्नाथ अनन्त अच्युतका आश्रय ग्रहण करनेवाले व्यक्ति दुःखी नहीं होते॥ ५२—५५॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं दितीश्वरो<br>वैरोचनं सत्यमनुत्तमं हि।<br>सम्पूजितस्तेन विमुक्तिमायौ<br>सम्पूर्णकामो हरिपादभक्तः ॥ ५६<br>गते हि तस्मिन् मुदिते पितामहे<br>बलेर्बभौ मन्दिरमिन्दुवर्णम्।<br>महेन्द्रशिल्पिप्रवरोऽथ केशवं<br>स कारयामास महामहीयान् ॥ ५७<br>स्वयं स्वभार्यासहितश्चकार<br>देवालये मार्जनलेपनादिकाः।<br>क्रिया महात्मा यवशर्कराद्या<br>बलिं चकाराप्रतिमां मधुद्रुहः ॥ ५८<br>दीपप्रदानं स्वयमायताक्षी<br>विन्ध्यावली विष्णुगृहे चकार।<br>गेयं स धर्म्यश्रवणं च धीमान्<br>पौराणिकैर्विप्रवरैरकारयत् ॥ ५९ | **पुलस्त्यजी बोले—**बलिसे इस प्रकार सत्य तथा श्रेष्ठ वचन कहनेके बाद विष्णुभगवान्‌के चरणोंमें अनुराग रखनेवाले सफलमनोरथ दितीश्वर प्रह्लाद बलिद्वारा किये गये सत्कारको ग्रहण कर मोक्षमार्गकी ओर प्रस्थित हो गये। पितामह प्रह्लादके प्रसन्न होकर चले जानेपर बलिका महल चन्द्रमाकी भाँति प्रकाशित होने लगा। महामहिम उस (बलि)-ने विश्वकर्मासे केशवका मन्दिर निर्मित करवाया। बलि स्वयं अपनी पत्नीके साथ उस देवालयमें मार्जन, लेपन आदि क्रियाएँ करने लगा। मधुसूदनके लिये महात्मा बलिने जौ एवं शक्कर आदिका उत्तम नैवेद्य निवेदित किया। विशालनयना विन्ध्यावली स्वयं विष्णुमन्दिरमें दीपदान करने लगी। बुद्धिमान् बलि पुराणवेत्ता श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे धार्मिक प्रवचन करवाने लगा॥ ५६—५९॥ | | तथाविधस्यासुरपुङ्गवस्य<br>धर्म्ये सुमार्गे प्रतिसंस्थितस्य।<br>जगत्पतिर्दिव्यवपुर्जनार्दन-<br>स्तस्थौ महात्मा बलिरक्षणाय ॥ ६० | उस प्रकारके धर्ममार्गमें स्थित रहनेवाले असुरोंमें श्रेष्ठ बलिकी रक्षाके लिये दिव्य शरीर धारण करनेवाले जगत्पति परमात्मा जनार्दन (वहाँ) विराजने लगे। |

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