वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ९४ ] | बलिक्रा प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान | ४७५ | | :--- | :--- |
| सूर्यायुताभं मुसलं प्रगृह्य<br> निघ्नन् स दुष्टानरियूथपालान्।<br>द्वारि स्थितो न प्रददौ प्रवेशं<br> प्राकारगुप्ते बलिनो गृहे तु ॥ ६१<br><br>द्वारि स्थिते धातरि रक्षपाले<br> नारायणे सर्वगुणाभिरामे।<br>प्रासादमध्ये हरिमीशितार-<br> मभ्यर्चयामास सुरर्षिमुख्यम् ॥ ६२<br><br>स एवमास्ते सुरराड् बलिस्तु<br> समर्चयन् वै हरिपादपङ्कजौ।<br>सस्मार नित्यं हरिभाषितानि<br> स तस्य जातो विनयाङ्कुशस्तु ॥ ६३ | वे द्वारपर रहते हुए दस हजार सूर्योंके समान तेजवाले मुसलको लेकर दुष्ट शत्रुओंके यूथपतियोंका संहार करते एवं प्राचीर (परकोटा)-से रक्षित बलिके भवनमें किसीको प्रवेश नहीं करने देते थे। सभी गुणोंसे सुन्दर लगनेवाले विधाता नारायणके द्वारपाल होनेपर बलि भी अपने महलके भीतर निरन्तर सुरों एवं ऋषियोंमें सर्वश्रेष्ठ नियमनकर्ता हरिका पूजन करने लगा। असुर-राज बलि इस प्रकार हरिके चरणकमलोंका अर्चन करते हुए नित्य हरिके वचनोंका स्मरण किया करता था। वह (नियम) उसके लिये विनयका अङ्कुश हो गया ॥ ६०-६३॥ | | इदं च वृत्तं स पपाठ दैत्यराद्<br> स्मरन् सुवाक्यानि गुरोः शुभानि।<br>तथ्यानि पथ्यानि परत्र चेह<br> पितामहस्येन्द्रसमस्य वीरः ॥ ६४<br><br>ये वृद्धवाक्यानि समाचरन्ति<br> श्रुत्वा दुरुक्तान्यपि पूर्वतस्तु।<br>स्निग्धानि पश्चान्नवनीतशुद्धा<br> मोदन्ति ते नात्र विचारमस्ति ॥ ६५<br><br>आपद्भुजंगदष्टस्य मन्त्रहीनस्य सर्वदा।<br>वृद्धवाक्यौषधा नूनं कुर्वन्ति किल निर्विषम् ॥ ६६<br><br>वृद्धवाक्यामृतं पीत्वा तदुक्तमनुमान्य च।<br>या तृप्तिर्जायते पुंसां सोमपाने कुतस्तथा ॥ ६७<br><br>आपत्तौ पतितानां येषां वृद्धा न सन्ति शास्तारः।<br>ते शोच्या बन्धूनां जीवन्तोऽपीह मृततुल्याः स्युः ॥ ६८<br><br>आपद्ग्राहगृहीतानां वृद्धाः सन्ति न पण्डिताः।<br>येषां मोक्षयितारो वै तेषां शान्तिर्न विद्यते ॥ ६९<br><br>आपज्जलनिमग्नानां हियतां व्यसनोर्मिभिः।<br>वृद्धवाक्यैर्विना नूनं नैवोत्तारं कथंचन ॥ ७०<br><br>तस्माद् यो वृद्धवाक्यानि शृणुयाद् विदधाति च।<br>स सद्यः सिद्धिमाप्नोति यथा वैरोचनो बलिः ॥ ७१ | इन्द्रके समान श्रेष्ठ अपने पितामहके कल्याणप्रद इस लोक तथा परलोकमें कल्याणकारी एवं सुन्दर तथ्य वचनोंका स्मरण करते हुए वह वीर दैत्यराज इस वृत्तका पाठ (आवृत्ति) करता था। पूर्वमें कठोरतापूर्वक कहे गये और बादमें नवनीतके समान स्निग्ध (कोमल) एवं शुद्ध वृद्धवाक्योंका श्रवण कर तदनुसार आचरण करनेवाले निस्सन्देह आनन्द प्राप्त करते हैं। वृद्धवाक्यरूपी ओषधि आपत्तीरूपी सर्पसे दंशित मन्त्रहीन पुरुषको निस्सन्देह विषसे रहित कर देती है। वृद्धवचनरूपी अमृतको पीने एवं उनके कथनके अनुसार आचरण करनेसे मनुष्योंको जो तृप्ति होती है वैसी तृप्ति सोमपानमें कहाँ है? वृद्धजन आपत्तिमें पड़े हुए जिन मनुष्योंका शासन (मार्गदर्शन) नहीं करते वे बन्धुओंके लिये शोचनीय तथा जीवित ही मरे हुएके समान होते हैं। आपत्तिरूपी ग्राहसे ग्रस्त जिन व्यक्तियोंको वृद्ध ज्ञानी लोग (उससे) मुक्त करानेवाले नहीं होते उन्हें शान्तिकी प्राप्ति नहीं होती। आपत्तिरूपी जलमें डूबे और व्यसनरूपी लहरोंके थपेड़े खानेवाले पुरुषोंका उद्धार वृद्ध वचनके सिवा अन्य किसी भी प्रकार नहीं हो सकता। अतः वृद्धवचनको सुनने एवं तदनुसार आचरण करनेवाला मनुष्य विरोचन-पुत्र बलिके समान शीघ्र सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ६४-७१ ॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९४॥