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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

| अध्याय ९४ ] | बलिक्रा प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान | ४७५ | | :--- | :--- |

| सूर्यायुताभं मुसलं प्रगृह्य<br>  निघ्नन् स दुष्टानरियूथपालान्।<br>द्वारि स्थितो न प्रददौ प्रवेशं<br>  प्राकारगुप्ते बलिनो गृहे तु ॥ ६१<br><br>द्वारि स्थिते धातरि रक्षपाले<br>  नारायणे सर्वगुणाभिरामे।<br>प्रासादमध्ये हरिमीशितार-<br>  मभ्यर्चयामास सुरर्षिमुख्यम् ॥ ६२<br><br>स एवमास्ते सुरराड् बलिस्तु<br>  समर्चयन् वै हरिपादपङ्कजौ।<br>सस्मार नित्यं हरिभाषितानि<br>  स तस्य जातो विनयाङ्कुशस्तु ॥ ६३ | वे द्वारपर रहते हुए दस हजार सूर्योंके समान तेजवाले मुसलको लेकर दुष्ट शत्रुओंके यूथपतियोंका संहार करते एवं प्राचीर (परकोटा)-से रक्षित बलिके भवनमें किसीको प्रवेश नहीं करने देते थे। सभी गुणोंसे सुन्दर लगनेवाले विधाता नारायणके द्वारपाल होनेपर बलि भी अपने महलके भीतर निरन्तर सुरों एवं ऋषियोंमें सर्वश्रेष्ठ नियमनकर्ता हरिका पूजन करने लगा। असुर-राज बलि इस प्रकार हरिके चरणकमलोंका अर्चन करते हुए नित्य हरिके वचनोंका स्मरण किया करता था। वह (नियम) उसके लिये विनयका अङ्कुश हो गया ॥ ६०-६३॥ | | इदं च वृत्तं स पपाठ दैत्यराद्<br>  स्मरन् सुवाक्यानि गुरोः शुभानि।<br>तथ्यानि पथ्यानि परत्र चेह<br>  पितामहस्येन्द्रसमस्य वीरः ॥ ६४<br><br>ये वृद्धवाक्यानि समाचरन्ति<br>  श्रुत्वा दुरुक्तान्यपि पूर्वतस्तु।<br>स्निग्धानि पश्चान्नवनीतशुद्धा<br>  मोदन्ति ते नात्र विचारमस्ति ॥ ६५<br><br>आपद्भुजंगदष्टस्य मन्त्रहीनस्य सर्वदा।<br>वृद्धवाक्यौषधा नूनं कुर्वन्ति किल निर्विषम् ॥ ६६<br><br>वृद्धवाक्यामृतं पीत्वा तदुक्तमनुमान्य च।<br>या तृप्तिर्जायते पुंसां सोमपाने कुतस्तथा ॥ ६७<br><br>आपत्तौ पतितानां येषां वृद्धा न सन्ति शास्तारः।<br>ते शोच्या बन्धूनां जीवन्तोऽपीह मृततुल्याः स्युः ॥ ६८<br><br>आपद्ग्राहगृहीतानां वृद्धाः सन्ति न पण्डिताः।<br>येषां मोक्षयितारो वै तेषां शान्तिर्न विद्यते ॥ ६९<br><br>आपज्जलनिमग्नानां हियतां व्यसनोर्मिभिः।<br>वृद्धवाक्यैर्विना नूनं नैवोत्तारं कथंचन ॥ ७०<br><br>तस्माद् यो वृद्धवाक्यानि शृणुयाद् विदधाति च।<br>स सद्यः सिद्धिमाप्नोति यथा वैरोचनो बलिः ॥ ७१ | इन्द्रके समान श्रेष्ठ अपने पितामहके कल्याणप्रद इस लोक तथा परलोकमें कल्याणकारी एवं सुन्दर तथ्य वचनोंका स्मरण करते हुए वह वीर दैत्यराज इस वृत्तका पाठ (आवृत्ति) करता था। पूर्वमें कठोरतापूर्वक कहे गये और बादमें नवनीतके समान स्निग्ध (कोमल) एवं शुद्ध वृद्धवाक्योंका श्रवण कर तदनुसार आचरण करनेवाले निस्सन्देह आनन्द प्राप्त करते हैं। वृद्धवाक्यरूपी ओषधि आपत्तीरूपी सर्पसे दंशित मन्त्रहीन पुरुषको निस्सन्देह विषसे रहित कर देती है। वृद्धवचनरूपी अमृतको पीने एवं उनके कथनके अनुसार आचरण करनेसे मनुष्योंको जो तृप्ति होती है वैसी तृप्ति सोमपानमें कहाँ है? वृद्धजन आपत्तिमें पड़े हुए जिन मनुष्योंका शासन (मार्गदर्शन) नहीं करते वे बन्धुओंके लिये शोचनीय तथा जीवित ही मरे हुएके समान होते हैं। आपत्तिरूपी ग्राहसे ग्रस्त जिन व्यक्तियोंको वृद्ध ज्ञानी लोग (उससे) मुक्त करानेवाले नहीं होते उन्हें शान्तिकी प्राप्ति नहीं होती। आपत्तिरूपी जलमें डूबे और व्यसनरूपी लहरोंके थपेड़े खानेवाले पुरुषोंका उद्धार वृद्ध वचनके सिवा अन्य किसी भी प्रकार नहीं हो सकता। अतः वृद्धवचनको सुनने एवं तदनुसार आचरण करनेवाला मनुष्य विरोचन-पुत्र बलिके समान शीघ्र सिद्धि प्राप्त करता है ॥ ६४-७१ ॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौरानबेवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ९४॥

४७६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९५

पंचानबेवाँ अध्याय

पुराण-वाचन, श्रावण-श्रवण और पठनकी फलश्रुति

| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले—नारदजी! मैंने आपसे इस अत्यन्त पावन पुराणका कथन किया है। इसको सुननेसे मनुष्य उत्तम यश और भक्तिसे सम्पन्न होकर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। जैसे गङ्गाजलमें स्नान करनेसे सारे पाप धुल जाते हैं, वैसे ही इस पुराणका श्रवण करनेसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मन्! वामनपुराणका श्रवण करनेवाले मनुष्यके शरीर एवं कुलमें रोग तथा अभिचार-कर्म (मारण, मोहन, उच्चाटन आदि)-से उत्पन्न घातक प्रभाव नहीं होता। विनयपूर्वक विष्णुका अर्चन करते हुए श्रद्धासे विधानके अनुसार नित्य इस पुराणके सुननेवाले मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे दक्षिणाके सहित अश्वमेध-यज्ञ करने तथा सोना, भूमि, अश्व, गौ, हाथी तथा रथके दानका फल प्राप्त होता है। इस (पुराण)-का एक चरण (भाग) भी सुननेवाला पुरुष तथा स्त्री पृथ्वीमें पावन एवं अत्यन्त पुण्यवान् हो जाता है॥ १-५॥ | | एतन्मया पुण्यतमं पुराणं<br>तुभ्यं तथा नारद कीर्तितं वै।<br>श्रुत्वा च कीर्त्या परया समेतो<br>भक्त्या च विष्णोः पदमभ्युपैति॥ १<br>यथा पापानि पूयन्ते गङ्गावारिविगाहनात्।<br>तथा पुराणश्रवणाद् दुरितानां विनाशनम्॥ २<br>न तस्य रोगा जायन्ते न विषं चाभिचारिकम्।<br>शरीरे च कुले ब्रह्मन् यः शृणोति च वामनम्॥ ३<br>शृणोति नित्यं विधिवच्च भक्त्या<br>सम्पूजयन् यः प्रणतश्च विष्णुम्।<br>स चाश्वमेधस्य सदक्षिणस्य<br>फलं समग्रं परिहीनपापः॥ ४<br>प्राप्नोति दत्तस्य सुवर्णभूमे-<br>रश्वस्य गोनागरथस्य चैव।<br>नारी नरश्चापि च पादमेकं<br>शृण्वन् शुचिः पुण्यतमः पृथिव्याम्॥ ५ | | | स्नाने कृते तीर्थवरे सुपुण्ये<br>गङ्गाजले नैमिषपुष्करे वा।<br>कोकामुखे यत् प्रवदन्ति विप्राः<br>प्रयागमासाद्य च माघमासे॥ ६<br>स तत्फलं प्राप्य च वामनस्य<br>संकीर्तयन् नान्यमनाः पदं हि।<br>गच्छेन्मया नारद तेऽद्य चोक्तं<br>यद् राजसूयस्य फलं प्रयच्छेत्॥ ७ | ब्राह्मणलोग अत्यन्त पवित्र श्रेष्ठ तीर्थके जल, गङ्गाजल, नैमिषारण्य, पुष्कर, कोकामुख तथा माघमासमें प्रयागमें जाकर स्नान करनेसे जिस फलकी प्राप्तिका होना बतलाते हैं, एकाग्रमनसे वामनपुराणके एक चरणका कीर्तन करते हुए यात्रा करनेवाले पुरुषको (भी) वही फल प्राप्त होता है। नारदजी! मैंने आज आपसे उस पुराणको कहा है, जो राजसूययज्ञका फल देनेवाला है। | | यद भूमिलोके सुरलोकलभ्ये<br>महत्सुखं प्राप्य नरः समग्रम्।<br>प्राप्नोति चास्य श्रवणान्महर्षे<br>सौत्रामणेर्नास्ति च संशयो मे॥ ८ | महर्षे! मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि इसको सुननेसे मनुष्य पृथ्वी एवं देवलोकमें प्राप्त होने योग्य सारे महान् सुखोंको प्राप्तकर सौत्रामणि नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है। |

अध्याय ९५ ] पुराण-वाचन, श्रावण-श्रवण और पठनकी फलश्रुति ४७७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रत्नस्य दानस्य च यत्फलं भवेद्<br>यत्सूर्यस्य चेन्दोर्ग्रहणे च राहोः।<br>अन्नस्य दानेन फलं यथोक्तं<br>बुभुक्षिते विप्रवरे च साग्निके॥ ९<br><br>दुर्भिक्षसम्पीडितपुत्रभार्ये<br>यामी सदा पोषणतत्परे च।<br>देवाग्निविप्रर्षिरते च पित्रोः<br>शुश्रूषके भ्रातरि ज्येष्ठसाम्ग्रे।<br>यत्तत्फलं सम्प्रवदन्ति देवाः<br>स तत् फलं लभते चास्य पाठात्॥ १०देवगण रत्नदान, राहुद्वारा सूर्य एवं चन्द्रके ग्रस्त होनेके समय किये गये दान, भूखे, अग्निहोत्री, उत्तम ब्राह्मणको दिये गये अन्नदान, अकालसे पीडित, पुत्र, पत्नी एवं भाई-बन्धुके पोषणमें तत्पर पुरुषको दिये गये दान, देवता, अग्नि एवं ब्राह्मणकी सेवामें लगे रहनेवाले व्यक्तिको तथा माता-पिता और ज्येष्ठ भाईको दिये गये दानसे जिस फलका प्राप्त होना बतलाते हैं, वह फल मनुष्य इस (वामनपुराण)-का पाठ करनेसे प्राप्त कर लेता है॥ ६-१०॥
चतुर्दशं वामनमाहुरग्र्यं<br>श्रुते च यस्याघचयश्च नाशम्।<br>प्रयान्ति नास्त्यत्र च संशयो मे<br>महान्ति पापान्यापि नारदाशु॥ ११<br><br>पाठात् संश्रवणाद् विप्र श्रावणादपि कस्यचित्।<br>सर्वपापानि नश्यन्ति वामनस्य सदा मुने॥ १२<br><br>इदं रहस्यं परमं तवोक्तं<br>न वाच्यमेतद्धरिभक्तिवर्जिते।<br>द्विजस्य निन्दारतिहीनदक्षिणे<br>सहेतुवाक्यावृतपापसत्त्वे ॥ १३<br><br>नमो नमः कारणवामनाय<br>नाराणायामितविक्रमाय ।<br>श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ १४<br><br>इत्थं वदेद् यो नियतं मनुष्यः कृष्णभावनः।<br>तस्य विष्णुः पदं मोक्षं ददाति सुरपूजितः॥ १५<br><br>वाचकाय प्रदातव्यं गोभूस्वर्णविभूषणम्।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं कुर्वन् श्रवणनाशकम्॥ १६<br><br>त्रिसन्ध्यं च पठन् शृण्वन् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>असूयारहितं विप्र सर्वसम्पत्प्रदायकम्॥ १७नारदजी! वामनपुराण पुराणोंमें चौदहवाँ उत्तम पुराण है। इसमें मुझे सन्देह नहीं है कि इसका श्रवण करनेसे पापोंका समुदाय एवं महापातक भी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। मुने! ब्राह्मणदेव! वामनपुराणका पाठ कहने, सुनने एवं सुनानेसे सर्वदा सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। मैंने आपसे यह परम रहस्य कहा है। इसे भगवान्‌की भक्तिसे रहित व्यक्तिके एवं ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाले आचारहीन तथा तर्कशील पापी मनुष्यके सामने नहीं कहना चाहिये। देवोंके कारण वामनरूप धारण करनेवाले अमित पराक्रमी श्रीनारायण भगवान्‌को नमस्कार है, नमस्कार है और शार्ङ्ग, चक्र, खड्ग तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमभगवान्‌को नमस्कार है। इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णमें अपनी भावनाओंको समर्पित कर इस वामनपुराणका नित्य पाठ करता है, उसे देवताओंसे पूजित भगवान् विष्णु मोक्षपद प्रदान करते हैं। इस पुराणके बाँचनेवालेको (पुराणका पाठ करनेवालेको भी) गौ, पृथ्वी एवं स्वर्णके आभूषण प्रदान करने चाहिये। इसमें धनकी शठता (शक्तिसे कम दक्षिणा देना) नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे सुननेके फलका नाश हो जाता है। विप्रदेव! जलन, ईर्ष्या, रोष आदि दोषोंसे रहित होकर तीनों संध्याओंके समय समस्त पापोंके विनाश करनेवाले इस पुराणका पाठ करने एवं श्रवण करनेसे सभी प्रकारकी सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं॥ ११-१७॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥
॥ श्रीवामनपुराण समाप्त॥

गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण-साहित्य

**श्रीमद्भागवतमहापुराण, व्याख्यासहित (कोड 26, 27) ग्रन्थाकार—**श्रीमद्भागवत भारतीय वाङ्मयका मुकुटमणि है। भगवान् शुकदेवद्वारा महाराज परीक्षित्‌को सुनाया गया भक्तिमार्गका तो मानो सोपान ही है। इसके प्रत्येक श्लोकमें श्रीकृष्ण-प्रेमकी सुगन्धि है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थरत्न मूलके साथ हिन्दी-अनुवाद, पूजन-विधि, भागवत-माहात्म्य, आरती, पाठके विभिन्न प्रयोगोंके साथ दो खण्डोंमें उपलब्ध है। पत्राकारकी तरह बेड़िया (कोड 1951, 1552) सचित्र, सजिल्द, (कोड 1552, 1553) गुजराती, (कोड 1678, 1735) सानुवाद, मराठी, (कोड 1739, 1740), कन्नड़, (कोड 1577, 1744) बँगला, (कोड 1966, 1967, 1968) तमिल, (कोड 1831, 1832) ओड़िआ, (कोड 1975, 1976) तेलुगु, (कोड 564, 565) अंग्रेजी-अनुवाद, (कोड 25) केवल हिन्दी बृहदाकार, बड़े टाइपमें, (कोड 1945) (वि० सं०) केवल हिन्दी (कोड 1930) केवल हिन्दी, (कोड 1608) केवल गुजराती, (कोड 29) मूल, मोटा टाइप, संस्कृत, ग्रन्थाकार (कोड 1573) मूल, मोटा टाइप, तेलुगु, ग्रन्थाकार (कोड 124) मूल मझला आकार, (कोड 1855) विशिष्ट सं० मूल, मझला संस्कृतमें भी।

**संक्षिप्त शिवपुराण, मोटा टाइप (कोड 789) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें परात्पर ब्रह्म शिवके कल्याणकारी स्वरूपका तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासनाका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द, विशिष्ट संस्करण (कोड 1468) हिन्दी एवं (कोड 1286) गुजरातीमें भी उपलब्ध।

**संक्षिप्त पद्मपुराण (कोड 44) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें भगवान् विष्णुकी विस्तृत महिमाके साथ, भगवान् श्रीराम तथा श्रीकृष्णके चरित्र, विभिन्न तीर्थोंका माहात्म्य, शालग्रामका स्वरूप, तुलसी-महिमा, गीता माहात्म्य, विष्णुसहस्रनाम, उपासना-विधि तथा विभिन्न व्रतोंका सुन्दर वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त मार्कण्डेयपुराण (कोड 539) ग्रन्थाकार—**भगवतीकी विस्तृत महिमाका परिचय देनेवाले इस पुराणमें दुर्गासप्तशतीकी कथा एवं माहात्म्य, हरिश्चन्द्रकी कथा, मदालसा-चरित्र, अत्रि-अनसूयाकी कथा, दत्तात्रेय-चरित्र आदि अनेक सुन्दर कथाओंका विस्तृत वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

**श्रीविष्णुपुराण, अनुवादसहित (कोड 48) ग्रन्थाकार—**इसके प्रतिपाद्य भगवान् विष्णु हैं, जो सृष्टिके आदिकारण, नित्य, अक्षय, अव्यय तथा एकरस हैं। इसमें आकाश आदि भूतोंका परिमाण, समुद्र, सूर्य आदिका परिमाण, पर्वत, देवतादिकी उत्पत्ति, मन्वन्तर, कल्प-विभाग, सम्पूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियोंके चरित्रका विशद वर्णन है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1364) केवल हिन्दी अनुवादमें भी उपलब्ध।

**संक्षिप्त नारदपुराण (कोड 1183) ग्रन्थाकार—**इसमें सदाचार-महिमा, वर्णाश्रम धर्म, भक्ति तथा भक्तके लक्षण, देवपूजन, तीर्थ-माहात्म्य, दान-धर्मके माहात्म्य और भगवान् विष्णुकी महिमाके साथ अनेक भक्तिपरक उपाख्यानोंका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त स्कन्दपुराण (कोड 279) ग्रन्थाकार—**यह पुराण कलेवरकी दृष्टिसे सबसे बड़ा है तथा इसमें लौकिक और पारलौकिक ज्ञानके अनन्त उपदेश भरे हैं। इसमें भगवान् शिवकी महिमा, सती-चरित्र, शिव-पार्वती-विवाह, कार्तिकेय-जन्म, तारकासुर-वध एवं धर्म, सदाचार, योग, ज्ञान तथा भक्तिके सुन्दर विवेचनके साथ-साथ अनेक साधु-महात्माओंके सुन्दर चरित्र पिरोये गये हैं। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त ब्रह्मपुराण (कोड 1111) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें सृष्टिकी उत्पत्ति, पृथुका पावन चरित्र, सूर्य एवं चन्द्रवंशका वर्णन, श्रीकृष्णचरित्र, कल्पान्तजीवी मार्कण्डेय मुनिका चरित्र, तीर्थोंका माहात्म्य एवं अनेक भक्तिपरक आख्यानोंकी सुन्दर चर्चा की गयी है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त गरुडपुराण—(कोड 1189) ग्रन्थाकार—**इस पुराणके अधिष्ठातृ देव भगवान् विष्णु हैं। इसमें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, सदाचार, निष्काम कर्मकी महिमाके साथ यज्ञ, दान, तप, तीर्थ आदि शुभ कर्मोंमें सर्व-साधारणको प्रवृत्त करनेके लिये अनेक लौकिक एवं पारलौकिक फलोंका वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त भविष्यपुराण—(कोड 584) ग्रन्थाकार—**यह पुराण विषय-वस्तु एवं वर्णन-शैलीकी दृष्टिसे अत्यन्त उच्च कोटिका है। इसमें धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष एवं आयुर्वेदशास्त्रके विषयोंका अद्भुत संग्रह है। वेताल-विक्रम-संवादके रूपमें कथा-प्रबन्ध इसमें अत्यन्त रमणीय है। इसके अतिरिक्त इसमें नित्यकर्म, सामुद्रिक शास्त्र, शान्ति तथा पौष्टिक कर्मका भी वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त श्रीवराहपुराण (कोड 1361) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें भगवान् श्रीहरिके वराह-अवतारकी मुख्य कथाके साथ-साथ अनेक तीर्थ, व्रत, यज्ञ, दान आदिका विस्तृत वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण (कोड 631) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें चार खण्ड हैं—ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, श्रीकृष्णजन्मखण्ड और गणेशखण्ड। इसमें भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाओंका विस्तृत वर्णन, अनेक रोचक एवं रहस्यमयी कथाएँ, श्रीराधाकी गोलोक-लीला तथा अवतार-लीलाका सुन्दर विवेचन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**वामनपुराण, अनुवादसहित (कोड 1432) ग्रन्थाकार—**यह पुराण मुख्यरूपसे त्रिविक्रम भगवान् विष्णुके दिव्य माहात्म्यका व्याख्याता है। इसमें भगवान् वामन, नर-नारायण, भगवती दुर्गाके उत्तम चरित्रके साथ-साथ भक्त प्रह्लाद तथा श्रीदामा आदि भक्तोंके बड़े रम्य आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।

**अग्निपुराण, केवल हिन्दी-अनुवाद (कोड 1362) ग्रन्थाकार—**इसमें परा-अपरा विद्याओंका वर्णन, महाभारतके सभी पर्वोंकी संक्षिप्त कथा, रामायणकी संक्षिप्त कथा, मत्स्य, कूर्म आदि अवतारोंकी कथाएँ, वास्तु-पूजा, विभिन्न देवताओंके मन्त्र आदि अनेक उपयोगी विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**मत्स्यमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 557)—**यह पुराण मत्स्यावतारके रूपमें भगवान् विष्णुकी लीलाओंका सुन्दर परिचायक है। इसमें मत्स्यावतारकी कथा, सृष्टि-वर्णन, मन्वन्तर तथा पितृवंश-वर्णन, ययाति-चरित्र, राजनीति, यात्राकाल, स्वप्नशास्त्र, शकुन-शास्त्र आदि अनेक विषयोंका सरल वर्णन किया गया है। सचित्र, सजिल्द।

**कूर्मपुराण, अनुवादसहित (कोड 1131)—**इस पुराणमें भगवान्‌के कूर्मावतारकी कथाके साथ-साथ सृष्टि वर्णन, वर्ण, आश्रम और उनके कर्तव्यका वर्णन, युगधर्म, मोक्षके साधन, तीर्थ-माहात्म्य, २८ व्यासोंकी कथाएँ, ईश्वर-गीता, व्यास-गीता आदि विविध विषयोंका अत्यन्त सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। विभिन्न दृष्टियोंसे इस पुराणका पठन-पाठन सबके लिये कल्याणकारी है। सचित्र, सजिल्द।

**संक्षिप्त श्रीमद्देवीभागवत-मोटा टाइप (कोड 1133) ग्रन्थाकार—**यह पुराण परम पवित्र वेदकी प्रसिद्ध श्रुतियोंके अर्थसे अनुमोदित, अखिल शास्त्रोंके रहस्यका स्रोत तथा आगमोंमें अपना प्रसिद्ध स्थान रखता है। यह सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, वंशानुकीर्ति, मन्वन्तर आदि पाँचों लक्षणोंसे पूर्ण है। पराम्बा भगवतीके पवित्र आख्यानोंसे युक्त इस पुराणका पठन-पाठन तथा अनुष्ठान भक्तोंके त्रितापोंका शमन करनेवाला तथा सिद्धियोंका प्रदाता है। सचित्र, सजिल्द (कोड 1897, 1898) अनुवादसहित (कोड 1326) गुजराती।

**नरसिंहपुराण, अनुवादसहित (कोड 1113) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें दशावतारकी कथाएँ एवं सात काण्डोंमें भगवान् श्रीरामके पावन चरित्रके साथ-साथ सदाचार, राजनीति, वर्णधर्म, आश्रम-धर्म, योग-साधना आदिका सुन्दर विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त इसमें भगवान् नरसिंहकी विस्तृत महिमा, अनेक कल्याणप्रद उपाख्यानोंका वर्णन, भौगोलिक वर्णन, सूर्य-चन्द्रादिसे उत्पन्न राजवंशोंका वर्णन तथा अनेक स्तुतियोंका उल्लेख है। सचित्र, सजिल्द।

महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण, अनुवादसहित (कोड 38) ग्रन्थाकार— हरिवंशपुराण वेदार्थ-प्रकाशक महाभारत ग्रन्थका अन्तिम पर्व है। पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे हरिवंशपुराणके श्रवणकी परम्परा भारतवर्षमें चिरकालसे प्रचलित है। भगवान् श्रीकृष्णसे सम्बन्धित अगणित कथाएँ इसमें ऐसी हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं। धार्मिक जन-सामान्यके कल्याणार्थ इसके अन्तमें सन्तानगोपाल-मन्त्र, अनुष्ठान-विधि, सन्तान-गोपाल-यन्त्र तथा संतान-गोपालस्तोत्र भी संगृहीत हैं। सचित्र, सजिल्द। (कोड 1589) केवल हिन्दीमें भी।

**महाभागवत [देवीपुराण], अनुवादसहित (कोड 1610) ग्रन्थाकार—**इस पुराणमें मुख्य रूपसे भगवती महाशक्तिके माहात्म्य एवं उनके विभिन्न चरित्रोंका विस्तृत वर्णन है। इसमें मूल प्रकृति भगवतीके गङ्गा, पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती, तुलसी आदि रूपोंमें विवर्तित होनेके मनोरम आख्यान हैं। सचित्र, सजिल्द।

**लिङ्गमहापुराण, अनुवादसहित (कोड 1985) संस्कृत श्लोक एवं हिन्दी टीका—**यह पुराण भगवान् शिवकी उपासना एवं महिमाका विस्तृत परिचायक है। इसमें शैवदर्शन, पाशुपतयोग, लिङ्ग-स्वरूप, लिङ्ग-माहात्म्य, लिङ्गार्चन एवं योगाचार्यों तथा शिव भक्तोंकी कथाओंका सरस वर्णन है। सचित्र, सजिल्द।