वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ९४ ] | बलिका प्रह्लादसे प्रश्न, विष्णुकी पूजनादि-विधि, मासानुसार विविध दान-विधान | ४७३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इमाश्च पितरो दैत्य गाथा गायन्ति योगिनः।<br>पुरतो यदुसिंहस्य ज्यामघस्य तपस्विनः॥ ३९<br><br>अपि नः स कुले कश्चिद् विष्णुभक्तो भविष्यति।<br>हरिमन्दिरकर्ता यो भविष्यति शुचिव्रतः॥ ४०<br><br>अपि नः सन्ततौ जायेद् विष्ण्वालयविलेपनम्।<br>सम्मार्जनं च धर्मात्मा करिष्यति च भक्तितः॥ ४१<br><br>अपि नः सन्ततौ जातो ध्वजं केशवमन्दिरे।<br>दास्यते देवदेवाय दीपं पुष्पानुलेपनम्॥ ४२<br><br>महापातकयुक्तो वा पातकी चोपपातकी।<br>विमुक्तपापो भवति विष्ण्वायतनचित्रकृत्॥ ४३ | दैत्य! पितरोंने यदुश्रेष्ठ योगी एवं तपस्वी ज्यामघके सामने इस गाथाका वर्णन किया था। क्या हमारे कुलमें पवित्र व्रत धारण करनेवाला इस प्रकारका कोई विष्णुभक्त उत्पन्न होगा जो हरिका मन्दिर बनवायेगा ? क्या हमारी सन्ततिमें कोई विष्णुमन्दिरमें श्रद्धापूर्वक चूने आदिसे सफाई करानेवाला और झाड़ू देनेवाला धार्मिक उत्पन्न होगा ? क्या हमारी सन्ततियोंमें ऐसा कोई होगा जो केशवके मन्दिरमें ध्वजाका दान करेगा और देवदेवेश्वरको दीप, पुष्प और सुगन्धित चन्दन आदि प्रदान करेगा ? महापातकी, पातकी अथवा उपपातकी व्यक्ति विष्णुमन्दिरको भाँति-भाँतिके रंगोंसे सजाकर अथवा दिव्य चित्र बनाकर पापसे मुक्त हो जाता है॥ ३७—४३॥ |
| इत्थं पितॄणां वचनं श्रुत्वा नृपतिसत्तमः।<br>चकारायतनं भूम्यां स्वयं च लिम्पतासुर॥ ४४<br><br>विभूतिभिः केशवस्य केशवाराधने रतः।<br>नानाधातुविकारैश्च पञ्चवर्णैश्च चित्रकैः॥ ४५<br><br>ददौ दीपानि विधिवद् वासुदेवालये वले।<br>सुगन्धितैलपूर्णानि घृतपूर्णानि च स्वयम्॥ ४६<br><br>नानावर्णा वैजयन्त्यो महारजनरञ्जिताः।<br>मञ्जिष्ठा नवरङ्गीयाः श्वेतपाटलिकाश्रिताः॥ ४७<br><br>आरामा विविधा हृद्याः पुष्पाढ्याः फलशालिनः।<br>लतापल्लवसंछन्ना देवदारुभिरावृताः॥ ४८<br><br>कारिताश्च महामञ्चाधिष्ठिताः कुशलैर्जनैः।<br>पौरोगवविधानज्ञै रत्नसंस्कारिभिर्दृढैः॥ ४९<br><br>तेषु नित्यं प्रपूज्यन्ते यतयो ब्रह्मचारिणः।<br>श्रोत्रिया ज्ञानसम्पन्ना दीनान्धविकलादयः॥ ५०<br><br>इत्थं स नृपतिः कृत्वा श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।<br>ज्यामघो विष्णुनिलयं गत इत्यनुशुश्रुमः॥ ५१ | असुर! पितृगणके इस प्रकारके वचनको सुनकर उस नृपश्रेष्ठने पृथ्वीपर मन्दिरका निर्माण करवाया। वह स्वयं उसमें चूने आदिसे सफाई तथा धोना-पोंछना आदि करता था। वह केशवकी विभूतियों, नाना प्रकारकी धातुओंसे निर्मित वस्तुओं तथा पाँच वर्णके तिलकोंसे पूजा करने लगा। बले! उसने वासुदेवके मन्दिरमें स्वयं विधिपूर्वक सुगन्धित तैल एवं घीसे भरे दीपकका दान किया। (उसने विष्णुमन्दिरमें) कुसुम्भ मजीठके रंगमें रँगे श्वेत एवं लाल वर्णके तथा नौ रंगोंवाले भाँति-भाँतिके ध्वजोंको आरोपित किया। (उसने) पुष्पों, फलों, लतापल्लवों तथा देवदारु आदि भाँति-भाँतिके वृक्षोंसे पूर्ण उद्यानोंका निर्माण कराया। पाकशालाके अध्यक्षके विधानको जाननेवाले एवं रत्नोंसे अलंकृत करनेवाले अत्यन्त कुशल पुरुषोंसे अधिष्ठित बड़े-बड़े मञ्चोंका निर्माण करवाया। उनमें प्रतिदिन यतियों, ब्रह्मचारियों, श्रोत्रियों, ज्ञानियों, दीनों, अन्धों एवं विकलांगों—लँगड़े-लूले आदि पुरुषोंका सत्कार होता था। हमलोगोंने सुना है कि ऐसा कार्य करनेसे श्रद्धावान् और जितेन्द्रिय राजा ज्यामघने विष्णुलोकको प्राप्त कर लिया॥ ४४—५१॥ |