भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ९३ ]बलिका पातालमें वास, सुदर्शनचक्रका वहाँ प्रवेश, बलिद्वारा सुदर्शनचक्रकी स्तुति४६५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स चापि संस्मृतः प्राप्तः सुतलं दानवेश्वरः।<br>दृष्ट्वा तस्थौ महातेजाः सार्घपात्रो बलिस्तदा॥ २१<br>तमर्च्य विधिना ब्रह्मन् पितुः पितरमीश्वरम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ २२<br>संस्मृतोऽसि मया तात सुविषण्णेन चेतसा।<br>तन्मे हितं च पथ्यं च श्रेयोऽद्यं वद तात मे॥ २३<br>किं कार्यं तात संसारे वसता पुरुषेण हि।<br>कृतेन येन वै नास्य बन्धः समुपजायते॥ २४<br>संसारार्णवमग्नानां नराणामल्पचेतसाम्।<br>तरणे यो भवेत् पोतस्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ २५स्मरण करते ही दैत्येश्वर (प्रह्लाद) सुतलमें आ गये। (उन्हें) देखते ही महातेजस्वी बलि तुरंत हाथमें अर्घ्य लिये उठ खड़ा हुआ। ब्रह्मन्! अपने समर्थ पितामहकी विधिपूर्वक पूजा करनेके बाद बलिने हाथ जोड़कर यह वचन कहा—तात! अत्यन्त शोकमग्न-चित्तसे मैंने आपका स्मरण किया है। अतः तात! मुझे हितकर, पथ्य एवं कल्याणकारी उत्तम उपदेश दें। तात! मनुष्योंको संसारमें रहते हुए क्या करना चाहिये, जिसके करनेसे उसे बन्धन न हो। संसार-समुद्रमें निमग्न हुए अल्पमति मनुष्योंको तरनेके लिये पोतस्वरूप क्या है, आप मुझसे इसे बतावें॥ १९—२५॥
पुलस्त्य उवाच<br>एतद्वचनमाकर्ण्य तत्पौत्राद् दानवेश्वरः।<br>विचिन्त्य प्राह वचनं संसारे यद्धितं परम्॥ २६**पुलस्त्यजी बोले—**अपने उस पौत्रके वचनको सुननेके बाद दानवेश्वर (प्रह्लाद)-ने विचारकर संसारमें कल्याणकर श्रेष्ठ वचन कहा—॥ २६॥
प्रह्लाद उवाच<br>साधु दानवशार्दूल यत्ते जाता मतिस्त्वियम्।<br>प्रवक्ष्यामि हितं तेऽद्य तथाऽन्येषां हितं बले॥ २७<br>भवजलधिगतानां द्वन्द्ववाताहतानां<br>सुतदुहितृकलत्रत्राणभारार्दितानाम् ।<br>विषमविषयतोये मज्जतामप्लवानां<br>भवति शरणमेको विष्णुपोतो नराणाम्॥ २८<br>ये संश्रिता हरिमनन्तमनादिमध्यं<br>नारायणं सुरगुरुं शुभदं वरेण्यम्।<br>शुद्धं खगेन्द्रगमनं कमलालयेशं<br>ते धर्मराजकरणं न विशन्ति धीराः॥ २९<br>स्वपुरुषमभिवीक्ष्य पाशहस्तं<br>वदति यमः किल तस्य कर्णमूले।<br>परिहर मधुसूदनप्रपन्नान्<br>प्रभुरहमन्यनृणां न वैष्णवानाम्॥ ३०**प्रह्लादने कहा—**दानवश्रेष्ठ! तुम धन्य हो, जो तुम्हें ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई। बले! अब मैं तुम्हारे और दूसरोंके लिये कल्याणकारी वचन कहता हूँ। संसाररूपी अगाध समुद्रमें डूबे हुए, द्वन्द्वरूपी वायुसे आहत, पुत्र, कन्या, पत्नी आदिकी रक्षाके भारसे दुःखी, नौकाके बिना भयंकर विषयरूपी जलमें डूबते हुए मनुष्योंके लिये विष्णुरूप नौका ही एकमात्र सहारा होता है। आदि, मध्य और अन्तसे रहित कल्याणप्रद, वरणीय, गरुड़वाहन, लक्ष्मीकान्त, पवित्र, देवगुरु, नारायण हरिका आश्रय ग्रहण करनेवाले धैर्यशाली मनुष्य यमराजके शासनमें नहीं पड़ते। यमराज हाथमें पाश लिये खड़े अपने दूतको देखकर उसके कानमें कहते हैं कि मधुसूदनकी शरणमें गये हुए मनुष्योंको छोड़ देना; क्योंकि मैं अन्य मनुष्योंका ही शासक हूँ, वैष्णवोंका नहीं॥ २७—३०॥
तथाऽन्यदुक्तं नरसत्तमेन<br>इक्ष्वाकुणा भक्तियुतेन नूनम्।<br>ये विष्णुभक्ताः पुरुषाः पृथिव्यां<br>यमस्य ते निर्विषया भवन्ति॥ ३१इसके सिवा श्रद्धायुक्त नरश्रेष्ठ इक्ष्वाकुने कहा था कि मृत्युलोकमें विष्णुभक्त व्यक्ति यमके शासन-विषयसे बाहर हैं।
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