भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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४६६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सा जिह्वा या हरिं स्तौति तच्चित्तं यत्तदर्पितम्।<br>तावेव केवलं श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ ॥ ३२<br><br>नूनं न तौ करौ प्रोक्तौ वृक्षशाखाग्रपल्लवौ।<br>न यौ पूजयितुं शक्तौ हरिपादाम्बुजद्वयम् ॥ ३३<br><br>नूनं तत्कण्ठशालूकमथवा प्रतिजिह्विका।<br>रोगो वाऽन्यो न सा जिह्वा या न वक्ति हरेर्गुणान् ॥ ३४<br><br>शोचनीयः स बन्धूनां जीवन्नपि मृतो नरः।<br>यः पादपङ्कजं विष्णोर्न पूजयति भक्तितः ॥ ३५<br><br>ये नरा वासुदेवस्य सततं पूजने रताः।<br>मृता अपि न शोच्यास्ते सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥ ३६<br><br>शारीरं मानसं वाग्जं मूर्तामूर्तं चराचरम्।<br>दृश्यं स्पृश्यमदृश्यं च तत्सर्वं केशवात्मकम् ॥ ३७वही जिह्वा है जो हरिका गुणगान करती है, वही चित्त है जो उनमें लीन है, वे ही हाथ प्रशंसाके योग्य हैं जो उनकी अर्चना करते हैं। जो हाथ श्रीहरिके दोनों चरण-कमलोंकी अर्चना नहीं करते, वे हाथ नहीं हैं, अपितु वृक्षकी शाखामें लगे हुए आगेके पल्लव हैं। जो जिह्वा हरिके गुणोंका वर्णन नहीं करती, वह जिह्वा नहीं, अपितु कण्ठशालूक—जिह्वासे युक्त मेढकका कण्ठ (केवल दिखावेके लिये लगी हुई निकम्मी जीभ) अथवा अन्य कोई रोग है। श्रद्धापूर्वक विष्णुके चरण-कमलका अर्चन न करनेवाला मनुष्य जीता हुआ ही मरे हुएके समान है और बन्धुजनोंके लिये शोचनीय है। मैं यह सत्य कहता हूँ कि वासुदेवके पूजनमें सर्वदा रत रहनेवाले मनुष्य मरनेपर भी शोचनीय नहीं होते। समस्त शारीरिक, मानसिक, वाचिक, मूर्त, अमूर्त, जङ्गम, स्थावर, दृश्य, स्पृश्य एवं अदृश्य समस्त पदार्थ विष्णु-स्वरूप हैं॥ ३१—३७॥
येनार्चितो हि भगवान् चतुर्धा वै त्रिविक्रमः।<br>तेनार्चिता न संदेहो लोकाः सामरदानवाः ॥ ३८<br><br>यथा रत्नानि जलधेरसंख्येयानि पुत्रक।<br>तथा गुणा हि देवस्य त्वसंख्यातास्तु चक्रिणः ॥ ३९<br><br>ये शङ्खचक्राब्जकरं सशार्ङ्गिणं<br>खगेन्द्रकेतुं वरदं श्रियः पतिम्।<br>समाश्रयन्ते भवभीतिनाशनं<br>संसारगर्ते न पतन्ति ते पुनः ॥ ४०<br><br>येषां मनसि गोविन्दो निवासी सततं बले।<br>न ते परिभवं यान्ति न मृत्योरुद्विजन्ति च ॥ ४१<br><br>देवं शार्ङ्गधरं विष्णुं ये प्रपन्नाः परायणम्।<br>न तेषां यमसालोक्यं न च ते नरकौकसः ॥ ४२<br><br>न तां गतिं प्राप्नुवन्ति श्रुतिशास्त्रविशारदाः।<br>विप्रा दानवशार्दूल विष्णुभक्ता व्रजन्ति याम् ॥ ४३<br><br>या गतिर्दैत्यशार्दूल हतानां तु महाहवे।<br>ततोऽधिकां गतिं यान्ति विष्णुभक्ता नरोत्तमाः ॥ ४४त्रिविक्रम भगवान्‌की चार प्रकारसे अर्चना करनेवाले मनुष्योंने निःसन्देह सुर और असुरसहित सम्पूर्ण लोकोंका पूजन कर लिया है। पुत्र! जिस प्रकार समुद्रके रत्न अनगिनत हैं, उसी प्रकार चक्र धारण करनेवाले विष्णुके गुण भी असंख्य हैं। हाथोंमें शङ्ख, चक्र, कमल एवं शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले गरुडध्वज, भवभीतिके नाश करनेवाले वरदानी लक्ष्मीपतिका आश्रय ग्रहण करनेवाले मनुष्य फिर संसाररूपी गड्ढेमें नहीं पड़ते। बले! जिनके मनमें गोविन्द निरन्तर निवास करते हैं, उनका अनादर नहीं होता और वे मृत्युसे आतङ्कित नहीं होते। मोक्ष-प्राप्ति करनेके श्रेष्ठ शरणस्थान शार्ङ्गधरदेव विष्णुकी शरणमें पहुँचे मनुष्योंको यमलोक या नरकमें नहीं जाना पड़ता। दानवश्रेष्ठ! वेदशास्त्रमें कुशल ब्राह्मणोंको वह गति नहीं प्राप्त होती जो गति विष्णुभक्त प्राप्त करते हैं। दैत्यश्रेष्ठ! महान् युद्धमें मारे गये व्यक्ति जो गति प्राप्त करते हैं, उस नरश्रेष्ठ विष्णुभक्तको उससे भी उत्तम गति प्राप्त होती है॥ ३८—४४॥
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