वराह पुराण

वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| क्रम | पृष्ठ-संख्या | क्रम | पृष्ठ-संख्या |
|---|---|---|---|
| ९७- विविध धर्मोंकी उत्पत्ति | १८४ | १२३- शालग्रामक्षेत्रका माहात्म्य | २७० |
| ९८- सुख और दुःखका निरूपण | १८६ | १२४- रुरुक्षेत्र एवं हृषीकेशके माहात्म्यका वर्णन | २७३ |
| ९९- भगवान्की सेवामें परिहार्य बत्तीस अपराध | १८८ | १२५- 'गोनिष्क्रमण'-तीर्थ और उसका माहात्म्य | २७५ |
| १००- पूजाके उपचार | १९० | १२६- स्तुतस्वामीका माहात्म्य | २७७ |
| १०१- श्रीहरिके भोज्य पदार्थ एवं भजन-ध्यानके नियम | १९४ | १२७- द्वारका-माहात्म्य | २७८ |
| १०२- मुक्तिके साधन | १९५ | १२८- सानन्दूर-माहात्म्य | २८० |
| १०३- कोकामुखतीर्थ (वराहक्षेत्र) का माहात्म्य | १९७ | १२९- लोहार्गल-क्षेत्रका माहात्म्य | २८१ |
| १०४- पुष्पादिका माहात्म्य | २०१ | १३०- मथुरातीर्थकी प्रशंसा | २८३ |
| १०५- वसन्त आदि ऋतुओंमें भगवान्की पूजा करनेकी विधि और माहात्म्य | २०३ | १३१- मथुरा, यमुना और अक्रूरतीर्थोंके माहात्म्य | २८५ |
| १०६- माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार) का माहात्म्य | २०५ | १३२- मथुरा-मण्डलके 'वृन्दावन' आदि तीर्थ और उनमें स्नान-दानादिका महत्त्व | २८९ |
| १०७- कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश) का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा | २१३ | १३३- मथुरा-तीर्थका प्रादुर्भाव, इसकी प्रदक्षिणाकी विधि एवं माहात्म्य | २९१ |
| १०८- दीक्षासूत्रका वर्णन | २२१ | १३४- देववन और 'चक्रतीर्थ' का प्रभाव | २९५ |
| १०९- क्षत्रियादि-दीक्षा एवं गणान्तिकादीक्षाकी विधि तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य | २२३ | १३५- 'कपिल-वराह' का माहात्म्य | २९७ |
| ११०- पूजाविधि और ताम्रधातुकी महिमा | २२६ | १३६- अन्नकूट (गोवर्धन) पर्वतकी परिक्रमाका प्रभाव | ३०० |
| १११- राजाके अन्न-भक्षणका प्रायश्चित्त | २२९ | १३७- असिकुण्ड-तीर्थ तथा विश्रान्तिका माहात्म्य | ३०३ |
| ११२- दातुन न करने तथा मृतक एवं रजस्वलाके स्पर्शका प्रायश्चित्त | २२९ | १३८- मथुरा तथा उसके अवान्तरके तीर्थोंका माहात्म्य | ३०५ |
| ११३- भगवान्की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त | २३० | १३९- गोकर्णतीर्थ और सरस्वतीकी महिमा | ३०७ |
| ११४- सेवापराध और प्रायश्चित्त-कर्मसूत्र | २३३ | १४०- सुगेका मथुरा जाना और वसुकर्णसे वार्तालाप | ३०९ |
| ११५- वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृंगालका वृत्तान्त तथा आदित्यको वरदान | २३८ | १४१- गोकर्णका दिव्य देवियोंसे वार्तालाप तथा मथुरामें जाना | ३११ |
| ११६- वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव (खञ्जरीटकी कथा) | २४७ | १४२- ब्राह्मण-प्रेत-संवाद, सङ्गम-महिमा तथा वामन-पूजाकी विधि | ३१३ |
| ११७- भगवान्के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य | २५१ | १४३- ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति | ३१६ |
| ११८- कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य | २५६ | १४४- साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन व्रत | ३१९ |
| ११९- 'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य | २५९ | १४५- शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरा माहात्म्य | ३२१ |
| १२०- उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन | २६१ | १४६- श्राद्धसे अगस्तिका उद्धार, श्राद्ध-विधि तथा 'ध्रुवतीर्थ' की महिमा | ३२३ |
| १२१- मन्दारकी महिमाका निरूपण | २६२ | १४७- काष्ठ-पाषाण प्रतिमाके निर्माण, प्रतिष्ठा एवं पूजाकी विधि | ३२७ |
| १२२- सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य | २६४ | १४८- मृन्मयी एवं ताम्र-प्रतिमाओंकी प्रतिष्ठा-विधि | ३३० |
| १४९- कांस्य-प्रतिमा-स्थापनकी विधि | ३३३ | ||
| १५०- रजत-स्वर्णप्रतिमाके स्थापन तथा शालग्राम |