वासवदत्ता (महाकवि सुबन्धु - श्लेष-प्रधान शास्त्रीय गद्यकाव्य सान्वय सटीक)
Vasavadatta of Mahakavi Subandhu with Commentary
महाकवि सुबन्धु द्वारा
पृष्ठ 187, कुल 244 में से
संदर्भ में पढ़ेंसहर्षं न कुर्वन्तं महामेघम् इव विलसत्करकं (स- मुद्रम् इव महासत्वतेजोयुक्तं मालिन्या कबरिकया तुङ्ग- भद्रया नासिकया शोणेना ऽधरेण नर्मदया वाचा गोदया भुजया स्वर्वाहिन्या कीर्त्या च पुण्यसरिन्मयम् इव) आदिकं- दं (शृङ्गार¹]पादपस्य [आ²]रोहणगिरिं (सकलगुणरत्न³- समूहस्य⁴) प्रभव(शैलं) सुन्दर(कन्दर्प)कथानदीनां सुरभिमासं वैदग्ध्यसहकारस्य आदर्शnavigation/तलं (सौन्दर्य- स्य प्रथममूलं) [151] विद्यालतानां स्वयंवरपतिं (स- रस्वत्याः⁵) स्पर्धा(ग्रहं कीर्तिलक्ष्म्योः⁵ मूल)गृहं शील- सम्पदां कोश(गृहं) महासौन्दर्य(धनस्य) त्रिभुवन- (रमणीया)कृतिं (कञ्चिद्) युवानं ददर्श। स [च] चिन्तामणि- नाम्नो राज्ञस् तनयः कन्दर्पकेतुर् (इति) स्वप्न एव (तन्)ना- मादिकम् (अशृणोत्)। अनन्तरम् अहो प्रजापते रूप(62)निर्माण- कौशलं [इदं] मन्ये स्वस्यै ऽव [152] नैपुण्यस्यै (ऽकत्र) दर्शनोत्सुकमनसा (वेधसा) जगत्त्रयसम(वाय)रूपपर- माणून् आदाय विरचितो ऽयम् (इति) अन्यथा कथम् इवा ऽस्य कान्ति- विशेष ईदृशो भवति। वृथै ऽव दमयन्ती नलस्य कृते [153] (वने) [वास]वैशसं [अव्]आप। मुधै ऽवे ऽन्दुमती महिष्य् अप्य् अजानुरागिणी बभूव। (वि)फलम् एव दुष्यन्तस्य कृते (दुर्वाससश् शापम् अनुबभूव शकुन्तला)। निरर्थकम् (एव⁶) मदनमञ्जरी⁷ नरवाहनदत्तं चकमे। [154] निष्कारणम् एव (मेरुगिरिनितम्बे ऊरुगरिम⁸निर्जित)रम्भा रम्भा नलकू- बरम् अचीकमत⁹। (व्यर्थम्) एव धूमोर्णा (स्वयं)स्वयं- वरार्थम् (आगतेषु देवगणेषु) [155] धर्मराजम् (आचकाङ्क्षे¹⁰। ऋद्धिस तु निष्प्रयोजनम् एव गन्धर्वयक्षेषु कुबेरम् आस- साद। अहेतुकम् एव पुलोमतनया देवेन्द्रासक्तचित्ता बभू- व)। इति बहुविधं (चिन्तयित्वा) विरह(63)मुर्मुर्(अग्नि)म- ध्यम् अधिरूढे ऽव (मदनदावा)ग्निशिखाकबलिते ऽव (व-
Footnotes
¹ So also Hall's manuscripts A, B, C, D, F, G, H. ² Hall's manuscripts A, B, C, D, F, H also omit ā. ³ So also Hall's manuscripts A, B, C, D, F, G, H. ⁴ So also Hall's manuscript D. ⁵ So also Hall's manuscripts A, B, C, D, E, F, G, H. ⁶ So also Hall's manuscript D. ⁷ Trichinopoly ed., madanamañjukā. ⁸ So also Hall's manuscripts C, D, G, H. ⁹ Tel. ed. 61, Grantha ed., and Hall's manuscript E have acakamata. ¹⁰ Srirangam text, Trichinopoly ed., Hall's manuscripts A, E, F, G, H, and the commentator Jagaddhara have ācakāṅkṣa.