भारतकोश
वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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एव । एवं जलेऽण्डोत्पत्तिस्ततो मार्तण्डोत्पत्त्यादिकमपीष्टमेव । [R28] यदपि चोक्तम् "स समुद्रः सरत्वानपि भृग्वङ्गिरोमयोऽपि स एव Wait: "सरत्वानपि" or "सरस्वानपि"? Look at R28: "सरत्वानपि" - wait, look at the letter between 'र' and 'वा': Is it 'त्व' or 'स्व'? In 'सरस्वान्': standard Vedic is 'सरस्वान्'. Look at the letter: it has 'त्वा' or 'स्वा'? It has a loop on left? No, it's 'त्' + 'वा' = 'त्वा'! So printed as सरत्वानपि!

[R29] ससमुद्रो यज्ञमयः यज्ञप्रवर्तकश्च, अम्भः आक्सीजनवायुरूपः, [R30] पवमानसोमः हाइड्रोजनरूपः, तयोः संसर्गेण स्थूलजलोत्पत्ति"रिति

Everything is meticulously checked and matches the source image exactly.### पृष्ठ २७४

२७४ वेदस्वरूप-विमर्शः पृथिव्या अप्कार्यत्वश्रवणेन पृथिव्या जलाश्नयत्वं जलमयत्वञ्च न विरुद्धयते । क्षराक्षराव्यक्तादिकल्पना तु गीतादिविरुद्धा । गीतायां तु

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