वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)
Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्वमात्रव्याप्तत्वे" Let's compare the word in line 19 with line 20: Line 20 clearly has "व्याप्तत्वे" (व्य + ा + प्त + त् + वे). Wait, in line 19, look at: "करणमात्राधीनत्वव्याप्तत्वे": व + ्य + ा + प्त + ल् + वे? Wait, look at the letters after प्त: It looks like 'व्याप्तौ' or 'व्याप्तत्वे'? Wait, look at the top: no double matra for 'ौ'. There is a single e-matra 'े'! And the consonant under it: 'त्वे' or 'ल्वे'? 'त्वे'! Wait, is there a 'त्व'? Yes, "व्याप्तत्वे" or "व्याप्तौ"? Actually, wait, look at line 19: करणमात्राधीनत्वव्याप्तत्वे.
Line 20: सिद्धिर्भवति तथैवोत्पत्तिमत्त्वस्याचेतनोपादानत्वस्य चौपादानोपकरण- Wait, "चौपादानोपकरण-" -> च + औपादानोपकरण-.
Line 21: सम्प्रदानप्रयोजनज्ञकर्तृ त्वमात्रव्याप्तत्वे विवादाध्यासितेषु तनुभुवनादिषु Wait, "ज्ञकर्तृ त्वमात्रव्याप्तत्वे" - notice the small space or joined: "