भारतकोश
वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

वेद स्वरूप विमर्श (स्वामी करपात्री जी महाराज - अपौरुषेय वेद-प्रामाण्य एवं वैदिक समन्वय)

Veda Swaroop Vimarsha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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िरधिकदेशं व्याप्नोति। Wait, "ध्वनिरधिकदेशं": look at 'नि' in "ध्वनिरधिकदेशं". There is a small ink smudge, but it's clearly ध्वनिरधिकदेशं.

अकारस्तु न भिद्यते। द्रव्याभिघातात् ध्वनिकारणवायुसंयोगप्रचयात् दीर्घप्लुतयोः प्रचयः। अधिककालं वादितायां घण्टायां कम्बोऽनुवर्तते। स्पन्दे उपरते Wait, "कम्बोऽनुवर्तते" or "कम्पोऽनुवर्तते"? Look at the letter: 'म्प'! In 'कम्पो', 'म्' + 'प' = 'म्प'. It is clearly "कम्पोऽनुवर्तते।"

सञ्जाता नादा वैकृतध्वनयः। तैरेव द्रुतादिव्यवस्था भवति। शब्दानित्य- त्वपक्षे तु ह्रस्वत्वादयोऽकारादिधर्मा एव। अन्येषां रीत्या तु कम्पेऽनिवृत्तेऽपि ज्वालान्तराद्वज्ज्वाला इव स्फोटा- देव वैकृतध्वनयो जायन्ते। केषाञ्चित् वायोरन्येषाणमुत्परेषां ज्ञानस्य शब्दत्वापत्ति- Wait, "वायोरन्ये

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