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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
पृष्ठ 474स्थायी लिंक
४१६ | वेदान्तपरिभाषा
( पृष्ठ : ३८२ )
मोक्ष
┌────────┴────────┐
आनन्दात्मक ब्रह्मावाप्ति शोकनिवृत्ति
( पृष्ठ : ३८४ )
तत्त्वमसि ( महावाक्य )
│
( पद्मपादाचार्य ) अहं ब्रह्मास्मि ( अपरोक्षज्ञान )
│
मोक्ष
( पृष्ठ : ३९० )
( वाचस्पतिमिश्र )
कर्म
│
पापक्षय तत्त्वमसिका मनन-निदिध्यासन
└────────┬────────┘
सुसंस्कृत-अन्तःकरण ( मन )
│
ब्रह्मसाक्षात्कार ( ब्रह्मज्ञान )
│
मोक्ष
( पृष्ठ : ४०५ )
कर्म
┌─────────────────────┼─────────────────────┐
सञ्चित क्रियमाण प्रारब्ध
┌────┴────┐ ┌────┴────┐ ┌────┴────┐
सुकृत दुष्कृत सुकृत दुष्कृत सुकृत दुष्कृत
( पृष्ठ : ४०५ )
ज्ञान
┌────────────────────┴────────────────────┐
प्रतिबद्धफलक अप्रतिबद्धफलक
│ │
प्रारब्धभोग अज्ञाननिवृत्ति
│ ┌──────┴──────┐
प्रारब्धकर्मनाश सञ्चितकर्मनाश क्रियमाणकर्मनाश
पृष्ठ 475स्थायी लिंक
चित्रपट-तालिका
४१७
वेदान्त का प्रयोजन
( पृष्ठ : ४०८ )
ब्रह्मज्ञान
↓
मोक्ष (शोक-मोह-जरा-मरणात्मक अनर्थनिवृत्ति)
तथा
( निरतिशय ब्रह्मानन्द की प्राप्ति )
पुरुषार्थ पट्ट
पुरुषार्थ : १
- धर्म
- अर्थ
- काम
- मोक्ष
प्रमाण : २
-
प्रत्यक्ष
- (पहला प्रकार)
- सविकल्पक
- निर्विकल्पक
- (दूसरा प्रकार)
- जीवसाक्षी
- ईश्वरसाक्षी
- (पहला प्रकार)
-
अनुमान
- स्वार्थ
- परार्थ
-
उपमान
-
आगम
-
अर्थापत्ति
- दृष्टार्थापत्ति
- श्रुतार्थापत्ति
- अभिधानानुपपत्ति
- अभिहितानुपपत्ति
-
अनुपलब्धि
- प्रागभाव
- प्रध्वंसाभाव
- अत्यन्ताभाव
- अन्योन्याभाव
- सोपाधिक
- निरुपाधिक
२७ वे० प०
पृष्ठ 476स्थायी लिंक
४१८ | वेदान्तपरिभाषा
कार्यविनाश : ३
- बाध
- निवृत्ति
अविद्या : ४
- तूलाविद्या
- मूलाविद्या
सत्ता : ५
- पारमार्थिक
- व्यावहारिक
- प्रातिभासिक
अन्तःकरण : ६
- मन
- बुद्धि
- अहंकार
- चित्त
प्रवृत्ति : ७
- संवादि
- विसंवादि
पदनिष्ठशक्ति : ८
- अभिधा
- लक्षणा
- ( एक प्रकार )
- केवललक्षणा
- लक्षितलक्षणा
- ( दूसरा प्रकार )
- जहल्लक्षणा
- अजहल्लक्षणा
- जहदजहल्लक्षणा
- ( एक प्रकार )
एकवाक्यता : ९
- पदैकवाक्यता
- वाक्यैकवाक्यता
पृष्ठ 477स्थायी लिंक
चित्रपट-तालिका
४१९
वाक्यजन्यज्ञान में सहायक : १०
- आकांक्षा
- योग्यता
- आसत्ति
- तात्पर्यं
लक्षण : ११
- स्वरूपलक्षण
- तटस्थलक्षण
प्रलय : १२
- नित्य
- प्राकृत
- नैमित्तिक
- आत्यन्तिक
जीव की अवस्थाएँ : १३
- जाग्रत्
- स्वप्न
- सुषुप्ति
प्रयोजन : १४
- गौण
- मुख्य
सुख : १५
- सातिशय
- निरतिशय
कर्म : १६
- सुकृत
- दुष्कृत
(सुकृत और दुष्कृत के भेद)
- प्रारब्ध
- संचित
- क्रियमाण
पृष्ठ 478स्थायी लिंक
४२० | वेदान्तपरिभाषा
ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन : १७
ब्रह्मसाक्षात्कार के साधन : १७
│
┌─────────────────────────┼─────────────────────────┐
श्रवण मनन निदिध्यासन
└─────────────────────────┬─────────────────────────┘
साधन
┌───────┬─────────┬───────┴────────┬──────────┬────────┐
शम दम उपरति तितिक्षा समाधान श्रद्धा
अन्तःकरणवृत्ति का उपयोग : १८
अन्तःकरणवृत्ति का उपयोग : १८
│
┌─────────────────────────┼─────────────────────────┐
आवरणभङ्गार्थं सम्बन्धार्थं चिदुपरागार्थं
वेदान्त-सम्मत-सृष्टि-क्रम
माया से उपहित परमेश्वर
↓
शब्द-गुणक-आकाशतन्मात्र
↓
शब्द स्पर्श. गु. वायुतन्मात्र
↓
श. स्प. रूप. गु. अग्नितन्मात्र
↓
श. स्प. रू. रस. गु. जलतन्मात्र
↓
श. स्प. रू. रं. गन्ध. गु. पृथ्वीतन्मात्र
तन्मात्र
│
┌───────────────────────┴───────────────────────┐
व्यष्टिरूपतन्मात्र समष्टिरूपतन्मात्र
│ │
┌───────┼───────┐ ┌───────┴───────┐
सात्त्विक अंश राजस अंश तामस अंश सात्त्विक अंश राजस अंश
│ │ │ │
ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ अन्तःकरण वायु
│ │ │ │
├─श्रोत्र ├─वाक् ├─मन ├─प्राण
├─त्वक् ├─पाणि ├─बुद्धि ├─अपान
├─चक्षु ├─पाद ├─अहंकार ├─व्यान
├─जिह्वा ├─पायु └─चित्त ├─उदान
└─नासिका └─उपस्थ └─समान
पृष्ठ 479स्थायी लिंक
चित्रपट-तालिका ४२१
पञ्चीकृतभूत (स्थूल भूत)
- पञ्चीकृतभूत (स्थूल भूत)
- आकाश
- वायु
- अग्नि
- जल
- पृथ्वी
१. लोक
-
ऊर्ध्वलोक
- भूमि
- आकाश (अन्तरिक्ष)
- स्वर्ग
- महः
- जन
- तप
- सत्य
-
अधोलोक
- अतल
- वितल
- सुतल
- तलातल
- रसातल
- महातल
- पाताल
२. स्थूलशरीर
- जरायुज
- अण्डज
- स्वेदज
- उद्भिज
पृष्ठ 480स्थायी लिंक
वेदान्तपरिभाषागत-उद्धरण-संकेत-सूची
( वे० परि० )
| उद्धरण | आकर ग्रन्थ | पृ० सं० |
|---|---|---|
| अंशिनः स्वांश० | चित्सुखी ८ | १७२ |
| अक्षमा भवतः केयं० | सुरेश्वरवार्तिक | ३११ |
| अजामेकां० | श्वेताश्वतर ४।५ | ६० |
| अत्रायं पुरुषः | बृहदारण्यक ४।३।८ | ३७२ |
| अथ रथान् रथयोगान् | ” ४।३।१० | १२२ |
| अधिष्ठानावशेषो हि नाशः | सुरेश्वरवार्तिक सूतसंहिता-म.वे.सं.२-४ P 270. | ३०४ |
| अनन्यलभ्यो हि शब्दार्थः | श्लो. वा. | २१६ |
| अन्तःकरणं···आपादयतीति | विवरण | ३६६ |
| अन्तःकरणवृत्तौ | विवरण | २४ |
| अपि संराधने० | ब्र० सू० ३।२।२४ | ३८६ |
| अभयं वै जनकप्राप्तोऽसि० | बृहदारण्यक ४।२।४ | ३८४ |
| अस्ति भाति० | दृग्-दृश्यविवेक ६ | ३३३ |
| अस्य महतो भूतस्य० | बृहदारण्यक २।४।१० | २४६ |
| आत्मा वा अरे० | ” २।४।४ | ३६१ |
| आनन्दो ब्रह्मेति० | तैत्तिरीय ३।६ | ३८१ |
| आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् | ” ३।६ | ३२७ |
| आनन्दो विषयानुभवो नित्यत्वं० | पद्मपादाचार्य पंचपादिका | ३२८ |
| इदं सर्वं यदयमात्मा० | बृहदारण्यक २।४।६; ४।२।७ | ३३२ |
| इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था० | कठोपनिषद् १।३।१० | ३२ |
| इन्द्रो मायाभिः | बृहदारण्यक २।५।१९ | ८६ |
| इषे त्वा० | शुक्लयजुर्वेद १।१ | २०४ |
| उपासनादि० | वाचस्पतिमिश्र-भामती | |
| एकधा बहुधा | ब्र. वि. १।२ | ३५६ |
| एतस्यैवानन्दस्य० | बृहदारण्यक ४।३।२ | ३८१ |
| एष नैमित्तिक० | पुराण | ३४८ |
| कषाये कर्मभिः | स्मृति | ३६० |
| कामः सङ्कल्पो विचिकित्सा० | बृहदारण्यक १।५।३ | २७ |
| कार्योपाधिरयं जीवः० | शुकरहस्योपनिषत् ३।१२ | ३५५ |
| क्षारः सर्वाणि० | भगवद्गीता १५।१६ | ३७३ |
| क्षीयन्ते चास्य० | मुण्डक २।२।८ | १२३ |
| चतुर्युगसहस्राणि | त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषत् ३।४ | ३४८ |
| जगत्प्रतिष्ठा | विष्णुपुराण | ३५१ |
| तत्सत्यं स आत्मा | छान्दोग्य ६।८।७ | ८३ |
पृष्ठ 481स्थायी लिंक
उद्धरण-संकेत-सूची
४२३
| उद्धरण | आकर ग्रन्थ | पृ० सं० |
|---|---|---|
| तत्त्वमसि | छां. उ. ६।८।१ | ३२६ |
| तद्यथेह कर्मचितो लोकः | ,, ८।१।६ | ६ |
| तदात्मानम् | बृहदारण्यक १।४।१० | ३८४ |
| तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय | छान्दोग्य ६।२।१ | ६४ |
| तन्मनोऽकुरुत | बृहदारण्यक १।२।१ | ३३० |
| तन्मनोऽसृजत | २७ | |
| तमेतं वेदानुवचनेन | बृहदारण्यक ४।४।२२ | ३६० |
| तमेव विदित्वा | श्वेताश्वतर ३।८ | ३८४ |
| तरति शोकमात्मवित् | छान्दोग्य- ७।१।३ | ३८२ |
| तरत्यविद्यां वितताम् | पराशरस्मृति | ६१ |
| तस्य तावदेव | ,, ६।१४।२ | |
| तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति | भगवद्गीता, ब्रह्मानन्दभिर्याख्यान अ. प. १८ श्लोक १० | |
| तासां त्रिवृतं | छान्दोग्य ६।३।३ | ३३६ |
| ते ध्यानयोगानुगता | श्वेताश्वतर १।३ | ३६५ |
| दध्ना जुहोति | मी. न्या. | ३६४ |
| दशमस्त्वमसि | ४८ | |
| दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत | मी. न्या. | ३६४ |
| द्वाविमौ पुरुषौ | भगवद्गीता १५।१६ | ३७३ |
| द्वा सुपर्णा | ऋग्वेद २।३।१७ | ३७३ |
| द्विपरार्द्धे | पुराण | ३४८ |
| देहात्मप्रत्ययो | वार्तिक-सुरेश्वराचार्य | १७ |
| न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति | ||
| न स पुनरावर्त्तते | छान्दोग्य ८।१५।१ | ६ |
| नाभुक्तं क्षीयते कर्म | स्मृति | |
| निर्विशेषं परं ब्रह्म | कल्पतरु | ३६६ |
| पञ्चप्राणमनो बुद्धि | मै. उ. | ३४० |
| प्रज्ञानघनः | मां. उ. ५ | ३७२ |
| प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्मा० | कौ. उ. ३।२ | ३८५ |
| बर्हिर्देवसदनं दामि | मै. सं. १।१।४ | ३६४ |
| बहु स्यां प्रजायेय | तैतरीय २।६ | ३३२ |
| बुद्धेर्गुणेन | श्वेताश्वतर ५।८ | |
| ब्रह्मणा सह ते | ३४६ | |
| ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति | मु. ३।२।६ | ३८२ |
| व्रीहिभिर्यजेत | आप. श्रौ. ६।३१।१३ | ३६४ |
| मनः षष्ठानीन्द्रियाणि | गीता | ३२ |
| मनसैवानुद्रष्टव्यः | बृहदारण्यक ४।४।१६ | ३८८ |
पृष्ठ 482स्थायी लिंक
४२४ वेदान्तपरिभाषा
| उद्धरण | आकर ग्रन्थ | पृ० सं० |
|---|---|---|
| मनोबुद्धिरहङ्कारश्चित्तं | शारीरकोपनिषद् २ | ७४ |
| मायां तु प्रकृतिं विद्यात् | श्वेताश्वतर ४।१० | ६१ |
| यः सर्वज्ञः | मुं. उ. १।१।६ | ३२६ |
| यजमानपञ्चमा इडां भक्षयन्ति | ३३ | |
| यतो वा इमानि | तै. उ. ३।१ | ३३१ |
| यत्र त्वस्य सर्वम् | बृहदारण्यक ४।४।१२ | १७ |
| यत्र हि द्वैतमिव | ” ४।२।१२ | १७ |
| यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा | ३२६ | |
| यदा सुप्तः | कौ. उ. ३।२ | ३४५ |
| यावदधिकारमवस्थिति | ब्रह्मसूत्र ३।२।३२ | |
| रमणीयचरणा | छान्दोग्य | ३४४ |
| विज्ञानमानन्दं ब्रह्म | बृहदारण्यक ३।१८ | ३८१ |
| विश्वजिता यजेत | तां. म. ब्रा. १६।४।२ | २७१ |
| वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान् | ३२ | |
| वैशेष्यात्तु तद्वादस्तद्वादः | ब्रह्मसूत्र २।४।२३ | ३३६ |
| शक्तितात्पर्यं ⋯ अङ्गीक्रियते | विवरण | ३६७ |
| शास्त्रदृष्ट्या | ब्रह्मसूत्र १।१।३१ | ३८५ |
| संसर्गासङ्गि | चित्सुखी | ८४ |
| स प्रजापतिरात्मनो | सं. २।१।२ | २०२ |
| सच्च त्यच्चाभवत् | तै. उ. २।६ | ३३२ |
| सता सोम्य | छान्दोग्य ६।८।१ | ३४५ |
| सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म | तै. उ. २।१।१ | ३२७ |
| सदेव सौम्येदमग्र | छान्दोग्य ६।२।१ | ८३ |
| समिधो यजति | तै. सं. २।६।१ | २४३ |
| सर्वं एकीभवन्ति | ३४६ | |
| सर्वेषामेव | चित्सुखी ७ | १७० |
| स वै शरीरी प्रथमः | ३४२ | |
| सा वैश्वदेव्यामिक्षा | मै. सं. १.१०।१ | १६५ |
| सूर्याय जुष्टं निर्वपामि | २०४ | |
| सोऽकामयत | तै. २।६ | ३३० |
| सोऽरोदीत् | तै. सं. २।२।२ | २४० |
| स्वर्गकामो 'ज्योतिष्टोमेन यजेत' | आ. श्रौ. १०।२।१ | २४४ |
| स्वार्थबोधे समासानाम् | तं. वा. पृ० ३६६ | २४३ |
| हन्ताहमिमास्तिस्रो | छान्दोग्य ६।३।२ | ३४२ |
| हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे | यजुर्वेद १३।४ | ३४३ |