वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 254, कुल 314 में से
संदर्भ में पढ़ें२४० वेदान्तसार अत्र तु परोक्ष-अपरोक्ष चैतन्य-एकत्व लक्षणस्य वाक्यार्थस्य भागमात्रे विरोधाद् भागान्तरम् अपि परित्यज्य अन्य लक्षणायाः अयुक्तत्वात् ‘जहत् लक्षणा’ न सङ्गच्छते। न च गङ्गापदम् स्वार्थपरित्यागेन तीरपदार्थम् यथा लक्षयति तथा तत् पदम् त्वम् पदम् वा स्वार्थपरित्यागेन त्वम् पदार्थम् तत् पदार्थम् वा लक्षयतु अतः कुतः जहल्लक्षणा न सङ्गच्छते इति वाच्यम्। तत्र तीरपद-अश्रवणेन तद् अर्थ-अप्रतीतौ लक्षणया तत् प्रतीति-अपेक्षायाम् अपि तत् त्वम् पदयोः श्रूयमाणत्वेन तद् अर्थप्रतीतौ लक्षणया पुनः अन्यतरपदेन अन्यतरपदार्थप्रतीति-अपेक्षा-अभावात्॥25॥ अनुवाद-यहाँ ‘गङ्गा में अहीरों की बस्ती रहती है’ इत्यादि वाक्य के समान ‘जहत् लक्षणा’ भी सङ्गत नहीं है। वहाँ तो गङ्गा एवं घोष के आधार-आधेयभावरूप सम्बन्ध का लक्षण होने से सम्पूर्णवाक्य का अर्थ विरुद्ध होने के कारण, सम्पूर्णवाक्य के अर्थ को छोड़कर, उससे सम्बद्ध तट रूप अर्थ में लक्षणा होने से ‘जहत् लक्षणा’ ठीक बैठ जाती है। यहाँ तो परोक्ष एवं अपरोक्षरूप चैतन्यों की एकता का सूचक वाक्यार्थ एक अंशमात्र में विरुद्ध होने से, (अविरुद्धरूप), दूसरे भाग के अर्थ को छोड़ देने पर भी अन्य में लक्षणा के असम्भव होने से ‘जहत् लक्षणा’ असङ्गत हो जाती है और यदि जिसप्रकार (गंगायां घोषः में) गंगा पद अपने अर्थ का परित्याग करके तटरूप अर्थ को लक्षित करता है, ठीक उसीप्रकार तत् एवं त्वम् पद अपने (सर्वज्ञत्व एवं अल्पज्ञत्व रूप) अर्थ का परित्याग करके, तत् अथवा त्वम् पद के (चैतन्यरूप) अर्थ को लक्षित करता है तो फिर यहाँ ‘जहत् लक्षणा’ सङ्गत क्यों नहीं हो सकती? यह कहा जाए तो (यह भी ठीक नहीं है।) क्योंकि वहाँ (गंगायां घोषः में) तट पद के सुनायी न देने से उसके अर्थ की प्रतीति नहीं होती है। अतः लक्षणा से उसकी प्रतीति हो जाती है। जबकि तत् एवं त्वम् दोनों पदों के श्रूयमान होने के कारण दोनों के अर्थ की प्रतीति भी (सहज ही) हो जाती है। इसलिए यहाँ एक पद द्वारा दूसरे के अर्थ की प्रतीति की अपेक्षा ही नहीं रह जाती है। (इसलिए यहाँ जहत् लक्षणा करना उचित नहीं है) ‘चन्द्रिका’—तत्त्वमसि महावाक्य का वर्णन करते हुए ग्रन्थकार ने खण्ड-23 में समानाधिकरण्य, विशेषणविशेष्यभाव तथा लक्ष्यलक्षणभाव