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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 314 में से

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महावाक्यार्थ-निरूपण २४१ सम्बन्धों का उल्लेख करते हुए 'भागलक्षणा' द्वारा तत्त्वमसि वाक्य के अर्थ को स्पष्ट किया था। तत्पश्चात् उन्होंने 'नीलमुत्पलम्' में प्रयुक्त होने वाले विशेषणविशेष्य- भाव का तथा यहाँ 'तत्त्वमसि' वाक्य में इसका तर्कपूर्वक निषेध किया तथा यहाँ प्रयुक्त होने वाले विशेषणविशेष्यभाव को गुणगुणी के विशेषणविशेष्य- भाव से भिन्न 'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त होने वाले विशेषणविशेष्यभाव के समान बताया। पुनः लक्ष्यलक्षणभावसम्बन्ध द्वारा लक्षणा शब्दशक्ति से 'तत्त्वमसि' वाक्य में प्रतीत होने वाले अर्थ को बताने से पूर्व 'जहल्लक्षणा' और 'अजहल्लक्षणा' द्वारा यहाँ अर्थप्रतीति का निषेध करते हुए, सर्वप्रथम 'गंगायां घोषः प्रतिवसति' के समान 'जहत् लक्षणा' का तर्कपूर्वक निषेध करते हुए कहते हैं- 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य में 'गंगा के जलप्रवाह में अहीरों का गाँव निवास करता है' (गंगायां घोषः प्रतिवसति') इत्यादि वाक्य के समान 'जहत् लक्षणा' द्वारा वाक्यार्थ संगत नहीं हो सकता है, क्योंकि 'गंगायां घोषः' इत्यादि वाक्य में जलप्रवाह में किसी बस्ती का निवास असम्भव है। अतः वहाँ मुख्य अर्थ अर्थात् जलप्रवाहरूप अर्थ का बाध हो जाता है। तत्पश्चात् लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा उससे सम्बद्ध 'तट' रूप अर्थ की प्रतीति होती है। उस स्थिति में वाक्य का लक्ष्यार्थ होता है- 'गंगा के तट पर बस्ती'। इस सम्पूर्णप्रक्रिया में 'गंगा' शब्द के मुख्य अर्थ रूप 'जलप्रवाह' का बाध होने से यहाँ लक्षणा शब्दशक्ति के प्रयोग के कारण उसका परित्याग किया गया, साथ ही इसी शक्ति द्वारा तत् सम्बद्ध 'तट' रूप अर्थ प्रतीत कराने में सहयोग प्रदान किया है। अतः अपने 'जलप्रवाह' रूप मुख्यार्थ का पूर्णतया त्याग करने के कारण, यहाँ प्रयुक्त होने वाली इस लक्षणा को साहित्यशास्त्र के विद्वानों द्वारा 'लक्षणलक्षणा' अथवा 'जहल्लक्षणा' इन नामों से पुकारा गया है, जो उचित भी है। तत्पश्चात् इसी प्रक्रिया को 'तत्त्वमसि' वाक्य में प्रदर्शित करते हुए ग्रन्थकार 'जहल्लक्षणा' के अनौचित्य का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि यहाँ यह लक्षणा संगत नहीं हो सकती, क्योंकि इस वाक्य में प्रयुक्त 'तत्' शब्द का अभिधा शब्दशक्ति द्वारा प्रतीत होने वाला वाच्यार्थ-परोक्षतादि गुणों