वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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से युक्त चैतन्य तथा ‘त्वम्’ शब्द का अभिधेयार्थ अपरोक्षतादि विशिष्ट चैतन्य है। ये दोनों अर्थ पूर्णतया विरुद्ध हैं तथा यह विरोध वस्तुतः परोक्षता एवं अपरोक्षतारूपवैशिष्ट्य वाले अंश में विद्यमान है, शेष चैतन्यरूप अंश दोनों में समानरूप से स्थित हैं, जिसमें किसीप्रकार का कोई विरोध नहीं है। इसलिए यदि हम यहाँ ‘जहत्-लक्षणा’ करके अर्थ करना चाहते हैं तो वह उचित नहीं होगा, क्योंकि ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि वाक्य के तत् एवं त्वम् पदों द्वारा प्रतीत होने वाले अर्थों में हमें परोक्षता एवं अपरोक्षतारूप अर्थ छोड़ना तो अभिप्रेत है, किन्तु उन दोनों में समानरूप से विद्यमान सामान्य चैतन्यांश का परित्याग हमें वाञ्छनीय नहीं है। अतः यहाँ जहल्लक्षणा संगत नहीं होगी। इसी प्रसङ्ग में ग्रन्थकार प्रतिपक्षी द्वारा उठायी गयी शङ्का को प्रस्तुत करते हैं-जिसप्रकार ‘गङ्गा’ यह शब्द अपने ‘जलप्रवाह’ रूप वाच्यार्थ को छोड़कर ‘तट’ रूप लक्ष्यार्थ की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति ‘जहल्लक्षणा’ से कराता है। ठीक उसीप्रकार ‘तत्त्वमसि’ इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त ‘तत्’ अथवा ‘त्वम्’ पदों में से कोई एक अपने परोक्षता अथवा अपरोक्षता रूप अर्थ का परित्याग करके अपरोक्षतादिविशिष्ट चैतन्य अथवा परोक्षतादि विशिष्ट चैतन्यरूप अर्थ को लक्षित करे, तो इस स्थिति में जहल्लक्षणा द्वारा ही दोनों पदों का एकत्व सिद्ध हो सकेगा, फिर आप इस प्रसङ्ग में ‘जहल्लक्षणा’ की उपादेयता का निषेध भला क्यों कर रहे हैं? प्रतिपक्षी द्वारा इसप्रकार की शङ्का अभिव्यक्त करने पर ग्रन्थकार उत्तर प्रस्तुत करते हैं-‘गंगायां घोषः' इत्यादि वाक्य में 'तट' रूप अर्थ का प्रयोग न करने तथा मुख्यार्थ का बाध होने की स्थिति में ही ‘तट’ रूप अर्थ की प्रतीति के लिए लक्षणा शब्दशक्ति का सहयोग लिया गया था, किन्तु 'तत्' एवं ‘त्वम्' इन दोनों पदों के सुनने के पश्चात्, इन दोनों द्वारा प्रतिपादित अर्थों की प्रतीति भी सहज ही हो जाती है-अर्थात् तत् से अभिप्राय है-परोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्य तथा ‘त्वम्’ से अभिप्राय है-अपरोक्षतादि विशिष्ट चैतन्य। साथ ही यहाँ दोनों ही पदों का प्रयोग भी हुआ है। अतः लक्षणा द्वारा एक पद से दूसरे पद के अर्थ का बोध कराने की आवश्यकता भी नहीं है। इसलिए ‘गंगायां घोषः' इत्यादि वाक्य के समान इस ‘तत्त्वमसि’ वाक्य की स्थिति न होने से 'जहल्लक्षणा' का औचित्य ही यहाँ संदिग्ध है। विशेष-(1) ग्रन्थकार ने ‘तत्त्वमसि’ वाक्य में ‘जहल्लक्षणा’ का अनौचित्य सिद्ध किया है।