वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमहावाक्यार्थ-निरूपण २४३
(२) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-५२ गङ्गायां घोषः (बस्ती) घोषः ← जलप्रवाह ← वाच्यार्थ, मुख्यार्थ बाध होने पर ↓ तटरूप अर्थ की प्रतीति लक्षणा शब्दशक्ति द्वारा (गङ्गायाः तटे घोषः-लक्ष्यार्थ) जल प्रवाह ← रूप वाच्यार्थ का परित्याग करने से जहल्लक्षणा (चित्र-५३) तत्त्वमसि तत् त्वम् (परोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य) (अपरोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य) तुरीय (शुद्ध चैतन्य) प्राज्ञ (जीव) जहल्लक्षणा का अनौचित्य दोनों पदों का प्रयोग दोनों पदों द्वारा स्वतन्त्र अर्थ की प्रतीति अतः मुख्यार्थबाध का अभाव अवतरणिका-इसप्रकार जहल्लक्षणा का अनौचित्य 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य में प्रदर्शित करने के पश्चात् ग्रन्थकार 'शोणो धावति' लाल (घोड़ा) दौड़ रहा है, इत्यादि वाक्य के समान 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्य में अजहल्लक्षणा के अनौचित्य को भी सिद्ध करते हैं- अत्र शोणो धावतीतिवाक्यवदजहल्लक्षणापि न सम्भवति। तत्र शोणगुणगमनलक्षणस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात्तदपरित्यागेन तदाश्रया श्वादिलक्षणया तद्विरोधपरिहारसम्भवादजहल्लक्षणा सम्भवति। अत्र तु परोक्षत्वापरोक्षत्वादिविशिष्टचैतन्यैकत्वस्य वाक्यार्थस्य विरुद्धत्वात्तद- परित्यागेन तत्सम्बन्धिनो यस्य कस्यचिदर्थस्य लक्षितत्वेऽपि तद्विरोधपरिहारासम्भवादजहल्लक्षणा न सम्भवत्येव। न च तत्पदं त्वम्पदं वा स्वार्थविरुद्धांशपरित्यागेनांशान्तरसहितं त्वम्पदार्थं तत्पदार्थं वा लक्षयत्वतः कथं प्रकारान्तरेण भागलक्षणाङ्गीकरणमिति वाच्यम्। एकेन पदेन स्वांशांशपदार्थान्तरोभयलक्षणाया असम्भवात्पदान्तरेण तदर्थप्रतीतौ लक्षणाया पुनस्तत्प्रतीत्यपेक्षाभावाच्च॥२६॥