वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९० वेदान्तसार (३) अभिमान एवं द्वेष का अभाव ज्ञान के लिए आवश्यक बताया गया है। यद्यपि आरम्भ में यह ज्ञान के साधनरूप में स्वीकार किया जाता है, किन्तु बाद में ये ब्रह्मज्ञानी के स्वभाव में ही विराजमान हो जाते हैं। इनके लिए उसे कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता है। (४) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-६५ ┌─────────────┐ ┌───────────────────────┐ ┌─────────────────────────┐ │अहंकार न करना│ < │ पूर्व में ज्ञान के साधन │ > │(द्वेष न करना (अद्वेष्टृत्व)│ │(अमानित्व) │ └──────────┬────────────┘ └────────────┬────────────┘ └──────┬──────┘ │ │ └────────────────────> ┌─────────────┐ <────────────┘ │ आदिगुण │ └──────┬──────┘ ↓ ┌─────────────┐ ┌───────────────────────────┐ ┌─────────────────────────┐ │एतदर्थ उसे कोई│ < │ जीवन्मुक्तावस्था में आभूषण │ > │ अब वे गुण साधन न │ │प्रयत्न नहीं करना │ │ के समान उसके स्वभाव में │ │ होकर लक्षण बन जाते हैं। │ │पड़ता है। │ │ ही विद्यमान रहते हैं। │ └─────────────────────────┘ └─────────────┘ └───────────────────────────┘ अवतरणिका-तत्पश्चात् ग्रन्थ का उपसंहार करते हुए शरीरपात के पश्चात् जीवन्मुक्त के ब्रह्मलीन होने की बात का प्रतिपादन करते हैं- किं बहुनायं देहयात्रामात्रार्थमिच्छानिच्छापरेच्छाप्रापितानि सुखदुःख- लक्षणान्यारब्धफलान्यनुभवन्नन्तःकरणाभासादीनामवभासकः संस्तदवसाने प्रत्यगानन्दपरब्रह्मणि प्राणे लीने सत्यज्ञानतत्कार्यसंस्काराणामपि विनाशात्परमकैवल्यमानन्दैकरसमखिलभेदप्रतिभासरहितमखण्डब्रह्मावतिष्ठ ते। “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति”, “अत्रैव समवलीयन्ते”, “विमुक्तश्च विमुच्यत” इत्यादिश्रुतेः॥३८॥ पदच्छेद-किम् बहुना अयम् देह-यात्रामात्रार्थम् इच्छा-अनिच्छा-परेच्छा- प्रापितानि सुखदुःख-लक्षणानि आरब्धफलानि अनुभवन् अन्तःकरण- आभास-आदीनाम् अवभासकः सन् तद् अवसाने प्रत्यक्-आनन्द-परब्रह्मणि प्राणे लीने सति अज्ञान तत् कार्य-संस्काराणाम् अपि विनाशात् परम-कैवल्यम् आनन्द-एकरसम् अखिल-भेदप्रतिभास-रहितम् अखण्डब्रह्म-अवतिष्ठते। “न तस्य प्राणाः उत्क्रामन्ति”, “अत्र एव समवलीयन्ते”, “विमुक्तः च विमुच्यते” इत्यादिश्रुतेः॥३८॥ अनुवाद-अधिक क्या, देहयात्रामात्र के लिए इच्छा, अनिच्छा अथवा दूसरों की इच्छा से प्राप्त कराए गए, सुखदुःखरूप प्रारब्धकर्मों के फलों का अनुभव करते हुए, इन्द्रियों के आभास आदि को प्रकाशित करते