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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 314 में से

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जीवन्मुक्त-निरूपण २९१ हुए, उन (प्रारब्धकर्मों) की समाप्ति पर, आन्तरिक आत्मानन्दस्वरूप परब्रह्म में प्राणों के लीन होने पर, अज्ञान एवं उसके कार्यरूप संस्कारों के भी विनष्ट होने से, परमकैवल्य, आनन्दैकरस, सभीप्रकार के भेदों के आभास से रहित, यह (जीवन्मुक्त) अखण्डब्रह्मरूप में ही स्थित हो जाता है। “उसके प्राण उत्क्रमण नहीं करते हैं", "वे यहीं पर विलीन हो जाते हैं", (अतः वह) "मुक्त हुआ भी पुनः मुक्त हो जाता है।" इत्यादि श्रुति का वचन (भी इसमें प्रमाण है।) 'चन्द्रिका'-तत्पश्चात् जीवन्मुक्त की देहमुक्ति के सम्बन्ध में ग्रन्थकार आचार्य सदानन्द कहते हैं कि इस विषय में और अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है। शरीर की यात्रा के हेतुरूप स्वेच्छा, अनिच्छा अथवा परेच्छारूप प्रारब्धकर्मों द्वारा प्राप्त कराए गए, सुख एवं दुःखस्वरूप फलों का अनुभव करते हुए, अन्तर्वृत्तियों के आभास अर्थात् ज्ञान को उत्तरोत्तर प्रकाशित करते हुए, प्रारब्धकर्मों की समाप्ति के पश्चात् आनन्दस्वरूप आन्तरिक आत्मारूप परब्रह्म में प्राणों के लीन होने पर, सृष्टि के कारण अज्ञान तथा उसके कार्यरूप संस्कारों के पूर्णतया नष्ट होने के बाद उसे सभीप्रकार के भेदों का आभास होना बन्द हो जाता है। इस अवस्था में जीवन्मुक्त का शरीरपात हो जाता है तथा परमकैवल्य एकमात्र आनन्दरूप में स्थित हुआ, वह अखण्डब्रह्मरूप में ही स्थित हो जाता है। इस संदर्भ में अपने कथन की पुष्टि हेतु ग्रन्थकार श्रुतिवचनप्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं। श्रुतियों की मान्यता है कि जीवन्मुक्त के शरीरपात के पश्चात् प्राण एक शरीर का त्यागकर दूसरे शरीर में नहीं जाते हैं, अपितु अपने कारणरूप सूक्ष्मतन्मात्राओं में विलीन हो जाते हैं। इसप्रकार एक बार मुक्ति को प्राप्त हुआ, जीवन्मुक्त शरीरपात के साथ पुनः मुक्त होता है। प्रथम मुक्ति ज्ञान होने के बाद प्रारब्धकर्मों के क्षय से पूर्व होती है, जब वह ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार कर लेता है तथा द्वितीय-मुक्ति प्रारब्धकर्मों के फलभोग के परिणामस्वरूप उनका क्षय होने के बाद शरीरपात के साथ होती है, जब उसके प्राण इसीसंसार की तन्मात्रास्वरूप आकाशादि में विलीन हो जाते हैं तथा आत्मा ब्रह्म के साथ एकाकार हो जाता है। इस अवस्था में

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