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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

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२९२ वेदान्तसार जीवन्मुक्त का पुनर्जन्म नहीं होता है। इसीको मोक्ष अथवा कैवल्य कहा जाता है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में तीन प्रकार के प्रारब्धकर्मों का उल्लेख हुआ है, जो व्याख्या की अपेक्षा रखते हैं- (क) स्वेच्छा-प्रारब्ध-न्यायपूर्ण आजीविका अर्जन आदि में स्वेच्छापूर्वक कष्ट को स्वीकार करना ही स्वेच्छाप्रारब्ध है, क्योंकि ऐसा करने की अन्तःप्रेरणा का कारण प्रारब्धकर्म ही होते हैं। (ख) अनिच्छा-प्रारब्ध-मार्ग में जाते समय कांटा लगना, मूल्यवान वस्तु की अनायास प्राप्ति होना, जिसे प्राप्त करने की पहले से कोई सम्भावना अथवा इच्छा नहीं थी, ईशकृपा से अनायास प्राप्त हो जाना ही अनिच्छा- प्रारब्ध है। (ग) परेच्छा-प्रारब्ध-सर्पदंश, दुष्ट द्वारा सताया जाना अथवा किसी सज्जन द्वारा कष्ट को दूर करना आदि बिना अभिलाषा के सुख-दुःखादि भोग, जो दूसरे की इच्छा से प्राप्त होते हैं, परेच्छाप्रारब्ध कहलाते हैं। जीवन्मुक्त भी इन तीनों प्रकार के प्रारब्धभोगों को भोगकर उनका क्षय करता है। जैसे-भिक्षाप्राप्ति हेतु घूमना, कष्ट उठाना स्वेच्छाप्रारब्ध, रोगादि से ग्रस्त होने पर अन्यों द्वारा अन्नादि प्रदान करना परेच्छाप्रारब्ध, पैर में कांटा आदि लगना अनिच्छाप्रारब्ध है। (2) जीवन्मुक्त के प्रारब्धफलभोग के पश्चात् वह ब्रह्म में लीन हो जाता है, किन्तु यहाँ जीवन्मुक्त एवं विदेहमुक्ति की भिन्नता को समझना आवश्यक है। जीवन्मुक्त की अवस्था में प्रारब्धकर्मों का पूर्ण नाश न होने के कारण अज्ञान की अंशमात्रसत्ता विद्यमान रहती है, किन्तु विदेहमुक्ति की स्थिति में अज्ञान का वह अंश भी समाप्त हो जाता है। परिणामस्वरूप उसके कार्यरूप संस्कार भी विनष्ट हो जाते हैं। इसप्रकार कैवल्य की अवस्था से एक क्षण पूर्व उसका शरीररूप अज्ञान, लिङ्गशरीररूप प्राण तथा स्थूलशरीर आदि सभी आत्यन्तिकदृष्टि से सदैव के लिए नष्ट हो जाते हैं। (3) यहाँ प्रयुक्त परमकैवल्य से अभिप्राय मुक्तपुरुष का ब्रह्मभाव को प्राप्त होना है।