वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( १०१ ) त्तिरावरणनिवृत्त्यर्थमज्ञानावच्छिन्नं चैतन्यं व्याप्नोतीत्येतद्वृ- त्तिव्याप्यत्वमंगीक्रियते आवरणभंगानंतरंस्वयं प्रकाशमानं चै- तन्यं फलचैतन्यमित्युच्यते तस्मिन्फलचैतन्ये निष्फल का- चिद्वृत्तिर्न व्याप्नोति आवरणभंगस्य प्रागेव ज्ञातत्वेन प्रयोज- नाभावादित्यर्थः । अस्मिन् ग्रन्थे ग्रंथांतरं संवादयति । तदु- क्तमिति । वृत्तिप्रतिबिंबितचैतन्याभासस्यापि फलचैतन्य- प्रकाशकत्वं नेत्यत्रापि संमतिमाह । स्वयमिति ॥ ८७ ॥ (भा०टी०) पूर्वोक्त अनुभव प्रकार सिद्ध होनेपर “ब्र- ह्म मन करके धारण किया जाता है । ब्रह्म मनसे धारण नहीं किया जाताहै । ” इन परस्पर विरुद्ध दोनों श्रुतियोंका विरोध भी दूर होगया । क्योंकि मनोवृत्तिद्वारा ब्रह्म विषयक अज्ञानका नाश होताहै किन्तु अन्तःकरणवृत्तिमें प्रतिबिं- म्बित चैतन्य परब्रह्मका प्रकाश नहीं करसक्ता । इस विषय में प्रमाण भी है शास्त्रकारोंने अन्तःकरणप्रतिबिम्बित चैतन्य- के द्वारा परब्रह्म चैतन्यके प्रकाशके निषेध पूर्वक अन्तःकरण- वृत्तिके द्वारा तद्विषयक अज्ञानका नाश होना स्वीकार कि- याहै क्योंकि परम ब्रह्म स्वप्रकाश स्वरूप है । इसी कारण उ- सका प्रकाश दूसरेका कराहुआ नहीं होसक्ता है ॥ ८७ ॥ जडपदार्थाकाराकारितचित्तवृत्तेर्विशेषोऽस्ति । त- थाहि अयं घट इति घटाकाराकारितचित्तवृत्तिर- ज्ञातं घटं विषयीकृत्य तद्गताज्ञातनिरसनपुरःसरं स्वगतचिदाभासेन जलमपि घटं भासयति । त-