वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ११ ) यण) आदि व्रत करनेसे ब्राह्मणगण परमात्माके जाननेकी इच्छा करते हैं” । इस विषयमें स्मृतिभी प्रमाण है—“तप करनेसे अनेक पापोंका नाश होता है” । और नित्य, नैमि- त्तिक, उपासनाका कुछ प्रासङ्गिक फल होताहै । क्योंकि श्रुतिने कहा है—“कर्म्मद्वारा पितृलोकप्राप्ति होतीहै और तपस्या, और उपासनाद्वारा देवलोककी प्राप्ति होतीहै”॥७॥ साधनानि नित्यानित्यवस्तुविवेकेहामुत्रफल- भोगविरागशमदमादिसम्पत्तिमुमुक्षुत्वानि॥८॥ (भा०टी०) पूर्वोक्त साधनचतुष्टयको दिखलातेहैं। नित्य और अनित्य वस्तुका विचार । इस लोकमें और पर- लोकमें फल भोगनेकी इच्छा न करना । शम दम आदि सा- धनसम्पत्ति । मुमुक्षुत्व (मोक्ष होनेकी इच्छा होना) । यही साधनचतुष्टय कहाते हैं ॥ ८ ॥ नित्यानित्यवस्तुविवेकस्तावद्ब्रह्मैव नित्यं वस्तु ततोऽन्यदखिलमनित्यमिति विवेचनम् ॥ ९ ॥ (भा०टी०) इस संसारमें केवल ब्रह्मही नित्य है उससे भिन्न समस्त वस्तु अनित्य हैं । इस प्रकार विचारको नि- त्यानित्यवस्तुविवेक कहतेहैं ॥ ९ ॥ ऐहिकानां स्रक्चन्दनादिविषयभोगानांकर्म्मजन्य- तया अनित्यत्ववदामुष्मिकाणामप्यमृतादिविषय- भोगानामनित्यतया तेभ्यो नितरां विरतिरिहामु- त्रफलभोगविरागः ॥ १० ॥