वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 145 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३० ) वेदान्तसार । है. परंतु तत्त्वज्ञान होनेके पश्चात् अशुभ वासनाकी प्रवृत्ति बिलकुल होती नहीं. केवल शुभवासनाओंकाही अनुवर्तन कि- या जाता है. अथवा शुभवासना तथा अशुभवासना इन दो- नोंमेंभी उदासीनभाव रहता है इससे जीवन्मुक्त हुआ पुरुष यथेच्छ आचरण करता नहीं, यह सिद्ध हुआ. इस विषयमें ग्रंथांतरका यह प्रमाण है कि,–“जो कोई पुरुष एक ब्रह्मत- त्त्वको जानले, और यथेच्छ आचरण करे, तौ फिर अपवित्र पदार्थके भक्षणमें लगाहुआ कुत्ता, और वह ब्रह्मतत्त्ववेत्ता इन दोनोंमें भेद कौनसा रहा ? ” और जो जीवन्मुक्त है उसको अपने ब्रह्मज्ञपनेका अभिमानही रहता नहीं. इसमें प्रमाण यह है कि,–“ब्रह्मवेत्तापनाको प्राप्त होकरभी जीवन्मुक्त पुरुष अपने आत्माको केवल जानता है. दूसरा कुछ जानता नहीं. अभिमानभी करता नहीं.” इति ॥ ९८ ॥ तदानीममानित्वादीनि ज्ञानसाधनानि अद्वेष्टृत्वा- दयश्चालंकारवदनुवर्तन्ते । तदुक्तं–“उत्पन्नात्मा- वबोधस्य ह्यद्वेष्टृत्वादयो गुणाः ॥ अयत्नतो भव- न्त्यस्य न तु साधनरूपिणः” इति ॥ ९९ ॥ ( सं०टी० ) नन्वेवं “अमानित्वमदंभित्वमहिंसा क्षां- तिरार्जवम्” इत्यादिस्मृत्युक्तसाधनस्य 'अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्' इ- त्यादिवचनैः प्रतिपाद्यमानाद्वेष्टृत्वादिगुणसमूहस्य च विदुषां सं- पाद्यमानत्वश्रवणेन सह विरोधमाशंक्य अमानित्वादिसंपाद-