भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

पृष्ठ 131, कुल 145 में से

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( १३१ ) नस्य विविदिषासंन्यासविषयत्वाद्विदुषां तु लक्षणत्वेनालं- कारवदनुवर्तमानान्न विरोध इत्याह । तदानीमिति । जीव- न्मुक्तावस्थायामित्यर्थः । अस्मिन्नर्थे वार्तिकसंमतिमाह । तदु- क्तमिति । अस्य विद्वत्संन्यासिनो जीवन्मुक्तस्याद्वेष्टृत्वादयो गुणाः अप्रयत्नेन स्वत एव भवंति, । न तु साधनरूपिणः, तं प्र- ति ते साधनरूपा न भवंति तत्र हेतुमाह । उत्पन्नेति । यत उत्पन्नात्मावबोधो ब्रह्मात्मैकत्वनिश्चयरूपः ततः तस्य ते गु- णाः लक्षणत्वेनैव भवतीत्यन्वयः ॥ ९९ ॥ ( भा०टी० ) उस जीवन्मुक्त अवस्थामें अमानीपना- अदंभीपना आदिक ज्ञानसाधन, अद्वेष्टृत्व, निर्लोभत्व, अमा- त्सर्य, अहिंसा आदिक सद्गुण, अलंकार सरीखे उस तत्त्वज्ञा- नीके पीछे पीछे चले आते हैं. इस विषयमें वार्तिकग्रंथमें यह प्रमाण है कि,—“जिसको आत्मबोध उत्पन्न हुआ है,उस पुरुषको अद्वेष्टृत्व, अदंभित्व, अहिंसा आदिक गुण विना यत्नसेही होजाते हैं, परंतु वे गुण उसके साधनरूपी हात नहीं. ” इति ॥ ९९ ॥ किं बहुना अयं देहयात्रामात्रार्थमिच्छानिच्छापरे- च्छाप्रापितानि सुखदुःखलक्षणान्यारब्धफलान्य- नुभवन्नन्तःकरणाभासादीनामवभासकः सन् तद- वसाने प्रत्यगानंदपरब्रह्मणि प्राणे लीने सति अज्ञा- नतत्त्कार्य्यसंस्काराणामपि विनाशात् परमकैव-

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