भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( २१ ) समानत्वेन संसारानिवृत्तिरित्याशंक्याह॥ज्ञानविरोधीति । ए- तादृशमप्यज्ञानमात्मसाक्षात्कारेण निवर्तत इत्यर्थः । तदु- क्तं भगवता “दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामे- व ये प्रपद्यंते मायामेतां तरंति ते”इति।ज्ञानाभाव एवाज्ञानमि- ति तार्किकमतं निराकरोति । भावरूपमिति । त्रिगुणात्मक- भावरूपत्वेपि इदमित्थमेवेति पिंडीकृत्य प्रदर्शयितुं न शक्य- त इत्याह । यत्किंचिदिति । किमप्यघटितघटनापटीयसीत्य- र्थः । अनिर्वचनीयभावरूपाज्ञानसद्भावेनुभवमेवोदाहृत्य दर्श- यति । अहमज्ञ इति । अहमज्ञो मामहं न जानामीत्यपरो- क्षावभास एव प्रमाणमित्यर्थः । तस्यैवोपष्टंभकत्वेन श्रुतिमु- दाहरति । देवात्मशक्तिमिति ॥ २५ ॥ (भा०टी०) उपरोक्त न्यायके विषयमें लौकिक दृष्टान्त दिखावैंहैं । रज्जु किसी समयभी वस्तुतः सर्प नहीं होती है परन्तु जिस समय उसी रज्जुमें सर्पका भ्रम होयहै उसी अव- स्तु में वस्तुके भ्रम को अज्ञान कहते हैं यही उपरोक्त अ- ध्यारोप कहाता है । सच्चिदानन्दमय, अद्वितीय पूर्णब्रह्म वस्तु है और अज्ञानादि सकल जड़ पदार्थ समूह अवस्तु है । सत् और असत् से भिन्न सत्त्वगुण रजोगुण तमोगुणरूप ज्ञानका प्रतिबन्धक भावरूप जो कुछ पदार्थ है उसको अज्ञान कहैं- हैं । इस विषयमें अनुभवही प्रमाण है जैसे मैं अज्ञ हूँ मैं आ- पको नहीं जानताहूँ यही अज्ञानका स्वरूप है । श्रुतिमेंभी