भारतकोश
वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara by Sadananda Yogindra

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished145 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( २३ ) मेकांलोहितशुक्लकृष्णां बह्वीं प्रजां जनयंतीं सरूपाम्” इत्या- दिश्रुतेः। नानाजीवगतनिकृष्टांतःकरणव्यष्ट्युपाध्यपेक्षया सम- ष्ट्युपाधेरस्य वैलक्षण्यं दर्शयति ।विगतरागादिदोषसकलकार्य- प्रपंचस्य जगत्कारणभूतस्याज्ञानस्य समष्टिभूतोत्कृष्टोपाधित्वे- न विशुद्धसत्वप्राधान्यमितिभावः। एतत्समष्ट्युपाधिद्वारेण ईश्व- रचैतन्यं लक्षयति । एतदुपहितचैतन्यमिति । एतत्समष्ट्यज्ञा- नोपलक्षितं चैतन्यं सर्वस्य चराचरात्मकप्रपंचस्य साक्षित्वेन सर्वज्ञ इत्युच्यते ।सर्वेषां जीवानां कर्म्मानुरूपेशितृत्वेनफलदा- तृत्वेनेश्वर इत्युच्यते ।तथा सर्वेषां जीवानामंतर्हृदये स्थित्वा बुद्धिनियामकत्वेनांतर्यामीत्युच्यते प्रमाणागोचरत्वादव्यक्त- मित्युच्यते।सर्वस्य चराचरात्मप्रपंचस्य विवर्ताधिष्ठानत्वेन ज- गत्कारणमिति व्यपदिश्यत इत्यर्थः । उक्तेऽर्थे युक्तिमाह । सकलेति । अत्र प्रमाणमाह । य इति ॥ २६ ॥ ( भा०टी० ) इस अज्ञानको समष्टिरूप ( एक ) व्यष्टि- रूप ( अनेक ) बोलकर व्यवहार किया जाताहै। जिस वृक्षों- के समूहको समष्टिरूप ( एक ) वन ऐसा बोलते हैं तथा जल- के समूहोंको समष्टिरूप ( एक ) जलाशय ( तलाब ) बोलते हैं। इसी प्रकार विभक्त और विराजित जीवोंके अज्ञानके समूहोंको समष्टिरूप ( एक ) अज्ञान शब्दसे बोलते हैं। श्रु- तिमेंभी कहाहै "एकही अज्ञान जन्मरहित और त्रिगुणमय- है।” यही अज्ञान समष्टिरूप उत्कृष्ट उपाधिविशिष्ट है इसी कारण इसमें विशुद्ध सत्त्वगुण प्रधान है इसी अज्ञानसे उपहित