वेदान्तसार (नृसिंहसरस्वती टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara by Sadananda Yogindra
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासमेत । ( ४३ ) चित्तकी वृत्ति है उसका नाम अहंकार है । बुद्धि और मन यह दोनों मिलकर आकाशादि पञ्चभूतके सात्विक अंशसे उ- त्पन्न होते हैं । पञ्चज्ञानेन्द्रिय बुद्धि और मन यह सब स्व- प्रकाशक स्वभाव हैं।इसी कारण इनका पञ्चभूतके सात्विक अंशसे उत्पन्न होना अनुमान किया जाता है ॥ ४२ ॥ इयं बुद्धिर्ज्ञानेन्द्रियैः सहिता सती विज्ञान- मयकोशोभवति। अयं कर्तृत्वभोक्तृत्वाभि- मानित्वेन इहलोकपरलोकगामी व्याव- हारिको जीव इत्युच्यते ॥ ४३ ॥ (सं०टी० ) बुद्धेर्विज्ञानमयकोशत्वं दर्शयति। इयमि- ति। बुद्धेः सत्वकार्यत्वाज्ज्ञानेन्द्रियसाहित्येन प्रकाशाधिक्या- द्विज्ञानमयत्वं आत्माच्छादकत्वाच्च कोशत्वमित्यर्थः।विशुद्ध- बुद्धिप्रतिबिंबितचिदात्मनो जीवत्वं दर्शयति। अयमिति।त- प्तायःपिंडवद्बुद्ध्यारोपितं चैतन्यं वस्तुतोऽकर्तृभोक्तृनित्यानंदा- परिच्छिन्नमक्रियमपि भोक्तृत्वकर्तृत्वसुखित्वदुःखित्वपरि- च्छिन्नत्वक्रियावत्त्वाद्यभिमानेन स्वर्गादिलोकांतरगामित्वं व्यावहारिकजीवत्वं च लभत इत्यर्थः ॥ ४३ ॥ (भा०टी० ) सम्पूर्ण ज्ञानेन्द्रियोंके सहित मिलकर बु- द्धिको विज्ञानमयकोष कहते हैं। यही विज्ञानमयकोष मैं कर्त्ताहूँ मैं भोक्ता हूँ मैं सुखी हूँ मैं दुःखी हूँ इत्यादि अभि- मानयुक्त इसलोकमें रहनेवाला और परलोकमें जानेवाला,इ- सप्रकार व्यवहारसे इसको जीवकहते हैं ॥ ४३ ॥